क्यों रो पड़े नरोत्तम मिश्रा…!?

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रो पड़े नरोत्तम मिश्रा…! दतिया के मंच पर छलका टिकट कटने का दर्द या पार्टी के लिए दिखा समर्पण?

राजनीति में नेताओं को अक्सर सख्त, बेबाक और हर परिस्थिति को संभालने वाला माना जाता है। लेकिन कभी-कभी राजनीति के सबसे मजबूत चेहरों के पीछे छिपा एक आम इंसान और उसका दर्द सबके सामने आ ही जाता है। कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला मध्य प्रदेश के दतिया में, जहां बीजेपी के सबसे कद्दावर और मुखर नेताओं में शुमार पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा भरे मंच पर फूट-फूटकर रो पड़े। जिस नेता की कड़क आवाज कभी पूरे सूबे की सियासत में गूंजती थी, आज उसी नेता की भर्राई आवाज और बहते आंसुओं ने हर किसी को सन्न कर दिया।

मौका था टिकट कटने के बाद पहली बड़ी चुनावी जनसभा का। नरोत्तम मिश्रा जब मंच पर पहुंचे, तो कार्यकर्ताओं का हुजूम उन्हें देख रहा था। जैसे ही उन्होंने माइक संभाला और बोलना शुरू किया, माहौल बेहद भावुक हो गया। नरोत्तम मिश्रा ने कहा— “आशुतोष तिवारी को जिताने के लिए मैं एक-एक घर के सामने शीश नवाऊंगा… हम सब मिलकर उन्हें जिताएंगे।” लेकिन ये शब्द अभी पूरे भी नहीं हो पाए थे कि उनका गला रुंध गया, आवाज कांपने लगी और वे अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए। मंच पर ही नरोत्तम मिश्रा की आंखों से आंसू छलक पड़े।

आंसुओं के पीछे समर्पण या टिकट कटने का दर्द?

ये सिर्फ एक नेता के आंसू नहीं थे, बल्कि उस सियासी सफर की दास्तान थे जिसने वर्षों तक दतिया और मध्य प्रदेश की राजनीति को एक नई दिशा दी। कल तक जो नेता खुद के लिए तालियां बजवाता था, खुद चुनाव लड़ता था और सरकार का संकटमोचक कहलाता था, आज वो किसी दूसरे उम्मीदवार के लिए वोट मांग रहा है।

इस वाकये के बाद सूबे की राजनीति में सवालों का बाजार गर्म हो गया है। राजनीतिक गलियारों में लोग पूछ रहे हैं कि क्या ये सिर्फ पार्टी के प्रति उनका अटूट समर्पण था, जिसके चलते वे अपने सारे दर्द भूलकर नए प्रत्याशी को जिताने की कसम खा रहे हैं? या फिर सालों तक दतिया की सेवा करने के बाद ऐन वक्त पर टिकट कट जाने का वो गहरा दर्द था, जो चाहकर भी वे छिपा नहीं पाए और मंच पर आंसुओं के रूप में बह निकला?

क्या कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का था यह सियासी दांव?

कुछ सियासी जानकारों का यह भी मानना है कि नरोत्तम मिश्रा एक मझे हुए राजनेता हैं। इन आंसुओं के जरिए कहीं न कहीं उन्होंने दतिया के उन कार्यकर्ताओं को संदेश दिया है जो उनके टिकट कटने से नाराज या मायूस बैठे थे। आंसुओं ने कार्यकर्ताओं के दिलों को छू लिया है और अब जो चुनाव बेहद मुश्किल लग रहा था, उसमें नरोत्तम के इस भावुक रूप ने नई जान फूंक दी है

वजह चाहे जो भी हो पार्टी के प्रति वफादारी, टिकट कटने की टीस या फिर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की कोशिश लेकिन यह तय है कि दतिया की राजनीति के इतिहास में यह सबसे भावुक और याद रखा जाने वाला पल बन गया है। नरोत्तम मिश्रा के इन आंसुओं ने साबित कर दिया है कि सत्ता की इस बिसात पर मोहरे भले ही बदल जाएं, लेकिन सालों का कमाया हुआ जनाधार और जज्बात कभी नहीं बदलते।

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