Datia by-election: अवधेश नायक ‘जरूरी’ हैं या दोनों दलों की ‘मजबूरी’?
मध्य प्रदेश की राजनीति का केंद्र इस वक्त दतिया बना हुआ है। आगामी उपचुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछ चुकी है, लेकिन इस पूरे चुनावी दंगल के केंद्र में इस समय एक ही नाम चर्चा में है अवधेश नायक।
2023 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा का खुलकर विरोध करते हुए भाजपा छोड़ कांग्रेस का दामन थामने वाले अवधेश नायक एक बार फिर सुर्खियों में हैं। तब कांग्रेस ने उन्हें टिकट दिया, फिर काट दिया। उम्मीद थी कि इस उपचुनाव में कांग्रेस उन पर भरोसा जताएगी, लेकिन पार्टी ऐसा नहीं कर सकी। टिकट न मिलने से नाराज नायक अब असमंजस में हैं, और यही असमंजस भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर बन गया है। दोनों ही प्रमुख दल उन्हें अपने पाले में करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं।
बंद कमरों की मुलाकातें और ‘घर वापसी’ के संकेत
दतिया का राजनीतिक पारा तब और चढ़ गया जब डैमेज कंट्रोल के लिए खुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी, अवधेश नायक के घर पहुंचे। लेकिन इसके ठीक अगले ही दिन, भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी सुबह-सुबह नाश्ते पर नायक के निवास जा पहुंचे। बंद कमरे में हुई इस मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच चुनावी समीकरणों पर लंबी चर्चा हुई। इस मुलाकात को अवधेश नायक की भाजपा में ‘घर वापसी’ के प्रयासों से जोड़कर देखा जा रहा है।
वादे बनाम विकल्प किसके पास क्या है?
कांग्रेस के पास फिलहाल नायक को देने के लिए साल 2028 के विधानसभा चुनाव में टिकट के वादे के अलावा कुछ नहीं बचा है एक ऐसा वादा जो अतीत में भी पूरा नहीं हो सका।
सत्ताधारी दल भाजपा के पास इस वक्त नायक को देने के लिए निगम-मंडल के पदों से लेकर राजनीतिक पुनर्वास के कई बड़े विकल्प मौजूद हैं। अब देखना यह है कि यह ‘डील’ कब और किस शर्त पर तय होती है।
नरोत्तम मिश्रा फैक्टर: क्या खत्म हो गया ‘समंदर’ का असर?
दरअसल, अवधेश नायक का कांग्रेस में जाना विशुद्ध रूप से नरोत्तम मिश्रा के विरोध पर टिका था। नायक के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की पृष्ठभूमि से जुड़े कई अन्य भाजपा नेताओं ने भी तब पार्टी छोड़ी थी। अब यदि नायक वापस भाजपा का रुख कर रहे हैं, तो इसके पीछे एक बड़ा कयास यह है कि वे मान चुके हैं कि भाजपा के भीतर अब नरोत्तम मिश्रा का प्रभाव कम हो गया है।
लेकिन राजनीति के जानकार इसे जल्दबाजी मानते हैं। नरोत्तम मिश्रा इतनी ‘कच्ची गोलियां’ नहीं खेले हैं। विधानसभा चुनाव में हार और टिकट कटने की रात जब उनके समर्थकों ने हंगामा किया था, तब नरोत्तम ने अगली ही सुबह स्थिति को पूरी तरह संभाल लिया था। उन्होंने कांग्रेस में गए नेताओं के लिए तंज कसते हुए कहा था “वे अपना घर बना लें, यह समंदर अब वापस नहीं आएगा।”
हालांकि यह बयान उन्होंने बीजेपी छोड़ने वालों के लिए नहीं दिया था। जो लोग यह मानकर चल रहे हैं कि भाजपा की राजनीति में नरोत्तम का दौर समाप्त हो गया है, वे शायद बड़ा धोखा खा सकते हैं।
कांग्रेस की रणनीति पर खड़े होते सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस की चुनावी रणनीति को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि कांग्रेस अपनी नीतियों और शीर्ष नेतृत्व के बजाय बार-बार व्यक्तिगत नेताओं के रसूख पर इतनी निर्भर क्यों हो जाती है?
प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी कांग्रेस प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह का नामांकन दाखिल कराने दतिया आए थे। लेकिन उन्हें अपना अधिकांश समय रूठे हुए नेताओं के घर-घर जाकर डैमेज कंट्रोल करने में बिताना पड़ा। जीतू पटवारी जहां अवधेश नायक को मनाने पहुंचे, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ वे राजेंद्र भारती के घर भी गए, जिनकी सदस्यता रद्द होने के कारण ही यह उपचुनाव हो रहा है।
जमीनी नेता का अगला कदम क्या?
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि अवधेश नायक दतिया के एक कद्दावर जमीनी नेता हैं। साल 2023 के चुनाव में राजेंद्र भारती की जीत सुनिश्चित करने में उनकी बैकस्टेज भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी
फिलहाल, नायक ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। उन्होंने अपने समर्थकों को संयम बरतने के लिए कहा है और स्पष्ट किया है कि अगले दो दिनों के भीतर वे अपनी राजनीतिक दिशा तय करेंगे कि वे कांग्रेस में रहेंगे या फिर कमल का दामन थामेंगे। दतिया के इस सियासी दंगल का ऊँट किस करवट बैठेगा, यह नायक के इसी फैसले पर निर्भर करता है।
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