क्या मध्य प्रदेश का गृह मंत्रालय पद किसी अदृश्य अभिशाप की जद में है?
एमपी की सियासत का इतिहास गवाह है कि बीजेपी हो या कांग्रेस, जो भी नेता इस कुर्सी पर बैठा, उसका राजनीतिक करियर हमेशा के लिए तबाह हो गया।
नरोत्तम मिश्रा से लेकर बाबूलाल गौर तक, जानिए कैसे इस पद ने गृहमंत्री की कुर्सी पर बैठे दिग्गजों को सीधे गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया!
मध्य प्रदेश की राजनीति में कई ऐसे दिलचस्प और हैरान करने वाले किस्से हैं, जिन पर यकीन करना मुश्किल होता है। लेकिन सूबे में एक ऐसा सच भी है, जो शायद आपने आज से पहले न सुना हो, जिसे ‘कुर्सी का अभिशाप’ कहा जा सकता है। हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के गृह मंत्रालय की। एमपी का इतिहास गवाह है कि चाहे भाजपा का नेता हो या कांग्रेस का, जो भी इस जिम्मेदार समझी जाने वाली कुर्सी पर बैठा, उसका राजनीतिक करियर ढलते सूरज सा अस्त हो गया। इस पद से हटने के बाद नेता या तो चुनाव हार गए, या फिर सियासत के पटल से ऐसे गायब हुए कि आज उनका नाम लेने वाला कोई नहीं है।
आइए, सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं कि आखिर कौन-कौन से दिग्गज इस कुर्सी पर बैठे, किसके राज में रहे और फिर राजनीति के किस अंधेरे कोने में खो गए! एक तरह से गृहमंत्री की कुर्सी से सीधे नेपथ्य में चले गए….
सबसे पहले बात करते हैं भारत सिंह की पटवा सरकार में गृहमंत्री रहे हैं। साल 1990 से 1992 के बीच, जब सुंदरलाल पटवा की सरकार थी, तब भारत सिंह राज्य के गृहमंत्री बने। लेकिन इस पद से हटने के बाद वे दोबारा कभी अपनी पुरानी राजनीतिक ताकत हासिल नहीं कर पाए और धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीति से पूरी तरह बाहर हो गए।
दूसरे हैं चरणदास महंत और महेंद्र बौद्ध, दिग्विजय सिंह की सरकार में। दिग्विजय सिंह के 10 साल के शासनकाल (1993-2003) में चरणदास महंत और फिर महेंद्र बौद्ध जैसे बड़े चेहरों ने गृह मंत्रालय संभाला। सरकार जाने के बाद महेंद्र बौद्ध अपनी पारंपरिक सीट से विधानसभा चुनाव तक हार गए और हाशिए पर चले गए। वहीं, महंत जी को एमपी की सियासत से पूरी तरह पत्ता कटने के बाद छत्तीसगढ़ का रुख करना पड़ा।
तीसरे नंबर पर हैं बाबूलाल गौर (भाजपा) से: उमा भारती की सरकार में गृहमंत्री रहे बाबूलाल गौर बाद में खुद मुख्यमंत्री भी बने। लेकिन जब शिवराज सरकार (2013-2016) में उन्हें दोबारा गृहमंत्री बनाया गया, तो उनका अंत अच्छा नहीं रहा। उम्र का हवाला देकर उन्हें जबरन पद से हटाया गया और बाद में उनका टिकट भी कट गया, जिससे उनका लंबा राजनीतिक सफर बेहद ग़मगीन तरीके से खत्म हुआ।
नंबर चार पर हैं उमाशंकर गुप्ता (शिवराज सरकार – भाजपा) में रहे: भोपाल के कद्दावर नेता माने जाने वाले उमाशंकर गुप्ता साल 2010 से 2013 तक गृहमंत्री रहे। इस कुर्सी से हटते ही उनका बुरा वक्त शुरू हो गया। पहले उनका मंत्रालय बदला गया और फिर 2018 के विधानसभा चुनाव में जनता ने उन्हें बुरी तरह हरा दिया। तब से वे संगठन और सत्ता, दोनों में किनारे लगा दिए गए हैं।
नंबर पांच पर हैं भूपेंद्र सिंह, सरकार शिवराज की ही: साल 2016 से 2018 के बीच भूपेंद्र सिंह शिवराज सरकार के सबसे भरोसेमंद और ताकतवर गृहमंत्री माने जाते थे। लेकिन 2018 में उनकी सरकार गिर गई। जब 2020 में दोबारा भाजपा सत्ता में आई, तो उनसे यह मंत्रालय छीन लिया गया। हद तो तब हो गई, जब दिसंबर 2023 में मोहन यादव की नई सरकार बनी और भूपेंद्र सिंह को कैबिनेट में जगह तक नहीं मिली।
अब नंबर छह पर आते हैं बाला बच्चन (कमलनाथ सरकार – कांग्रेस) में: 15 महीने की कमलनाथ सरकार (2018-2020) में बाला बच्चन को गृहमंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली थी। मार्च 2020 में सरकार क्या गिरी, बाला बच्चन का राजनीतिक रसूख भी साथ में ही ढह गया। आज वे लगभग गायब ही हैं।
अंत में आते हैं नरोत्तम मिश्रा। 15 महीने की कांग्रेस के बाद भाजपा की वापसी हुई, शिवराज मुख्यमंत्री बने। और एमपी के इतिहास के सबसे हाई-प्रोफाइल, मुखर और चर्चित गृहमंत्री बने नरोत्तम मिश्रा। और जो इस गृहमंत्री की कुर्सी के इस अभिशाप का सबसे ताजा उदाहरण हैं। हर छोटे-बड़े मुद्दे पर बयान देने वाले और सरकार के संकटमोचक कहे जाने वाले नरोत्तम मिश्रा को इस कुर्सी का ऐसा श्राप लगा कि वे दिसंबर 2023 का विधानसभा चुनाव अपनी ही सीट दतिया हार गए। इसके बाद हाल में चल रहे दतिया उपचुनाव में उनका टिकट काट दिया गया।
आखिर क्या है इस कुर्सी के बाद ‘गायब होने’ की वजह?
वैसे तो इसके पीछे कुछ बहुत ही ठोस प्रशासनिक और सियासी कारण हैं।
लेकिन जनता और कर्मचारियों की सीधी नाराजगी एक वजह हो सकती है: गृहमंत्री का सीधा नाता पुलिस, कानून-व्यवस्था और दंगे-फसाद से होता है। प्रदेश में कहीं भी कोई अपराध या चूक होती है, तो जनता का सीधा गुस्सा गृहमंत्री पर फूटता है, जो चुनाव में वोट कटने की बड़ी वजह बनता है।
मुख्यमंत्री से पावर स्ट्रगल: गृहमंत्री को सरकार में नंबर-2 माना जाता है और इस कुर्सी पर बैठने वाला नेता अक्सर खुद को अगला मुख्यमंत्री समझने लगता है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री और उनके करीबी लोग हमेशा गृहमंत्री के पर कतरने की ताक में रहते हैं, ताकि कोई समानांतर पावर सेंटर खड़ा न हो सके। और शायद यह गृहमंत्रियों के अस्त होने का सबसे बड़ा रीजन है।
इसके अलावा पुलिस महकमे में ट्रांसफर-पोस्टिंग, एनकाउंटर और राजनीतिक मुकदमों के चलते गृहमंत्री हमेशा विवादों से घिरे रहते हैं। ज्यादा विवादित छवि होने के कारण हाईकमान चुनाव के वक्त इन्हें ‘साइडलाइन’ करना ही बेहतर समझता है।
अंत में बस यही कहा जा सकता है कि कहने को तो गृह मंत्रालय बेहद रसूखदार पद है, लेकिन मध्य प्रदेश के सियासी इतिहास ने यह साबित कर दिया है कि यह कुर्सी किसी ‘काले साए’ से कम नहीं है। और हाल में कटी टिकट के बाद नरोत्तम मिश्रा इस चले आ रहे स्टिग्मा को तोड़ते हैं या फिर, इन्हीं खो चुके पूर्व गृहमंत्रियों की सूची का हिस्सा बन जाते हैं।
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