संजय गांधी .. भारतीय राजनीति का वो चेहरा जिसके बारे में जानकारी कम अफवाहें ज्यादा

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एक परिंदा अभी उड़ान पर था….

सुदीप ठाकुर  (वरिष्ठ पत्रकार )

सियासत कितनी निर्मम होती है, इसे संजय गांधी से बेहतर भला कौन जानता रहा होगा, जिनकी मौत को आज छियालिस साल हो गए। 23 जून, 1980 को इंदिरा गांधी के छोटे बेटे एक छोटा विमान उड़ाते हुए हादसे का शिकार हो गए थे। महज 33 बरस की उम्र में चले गए। तब तक इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी हो चुकी थी। यानी देखा जाए तो संजय को मुश्किल से 10-11 साल का सार्वजनिक जीवन मिला था।

वास्तव में वह परिदृश्य में 1971 में इंदिरा की भारी जीत के बाद आए थे। बल्कि .कहना सही होगा कि 1973-74 के आसपास। उनकी धमक इसी दौर में दिखनी शुरू हो गई थी। और तब तक उन्हें इंदिरा के बिगड़ैल तुनकमिजाज बेटे के रूप में ही ज्यादा ख्याति मिली हुई थी।
दरअसल वह असली भूमिका में 12 जून, 1975 को नजर आए थे, जिस दिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगनमोहन सिन्हा ने राजनारायण की याचिका पर रायबरेली से इंदिरा गांधी के निर्वाचन को निरस्त कर दिया था।

उनके इस फैसले को विवादास्पद भी माना गया और आज जिस तरह से सत्तारूढ़ दल और सरकारी मशीनरी में फर्क ही नहीं बचा उसमें तो यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्वाचन को सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आधार पर रद्द कर दिया गया था। उन पर जो दूसरा बड़ा आरोप था वह प्रधानमंत्री सचिवालय में कार्यरत यशपाल कपूर के इंदिरा के चुनाव प्रचार से जुड़ा था।

यशपाल कपूर ने प्रिंसिपल सेक्रेटरी पी एन हक्सर को मौखिक तौर पर इस्तीफे की जानकारी दे दी थी। मगर मंजूर होने से पहले ही वह इंदिरा के चुनाव अभियान के प्रमुख के रूप में काम करने लगे थे।
तो खैर 12, जून 1975 को आए फैसले के समय से संजय गांधी गुड़गांव में अपनी मारुति कार की फैक्टरी में थे।

पता चलते ही घर लौटे और तब तक देश की सियासत में भूचाल आ गया था। इंदिरा के पास दो विकल्प थे, या तो बेदाग साबित होते तक इस्तीफा दें और किसी भरोसेमंद को अपनी जगह प्रधानमंत्री बनवा दें। दूसरा विकल्प था, पद पर बने रहें और सियासी और कानूनी दोनों तरह की लड़ाई लड़ें। संजय ने दूसरा विकल्प चुना।

दरअसल संजय को भरोसा ही नहीं था कि जिस किसी नेता को भी तदर्थ रूप में इंदिरा की जगह बिठाया जाएगा वह बाद में उनके लिए पद छोड़ेगा।
और बस यहीं से देश की सियासत में संजय गांधी का सीधा दखल शुरू हो गया।

ढेर सारी कहानियां उस दौर की बताई जा चुकी हैं। असल में आज भी कुछ ऐसे सवाल हैं, जिन पर गौर किया जा सकता हैः एक तो यह कि यदि इंदिरा ने संजय गांधी के कहने पर पी एन हक्सर को प्रधानमंत्री सचिवालय से नहीं हटाया होता तो क्या तस्वीर कुछ और होती? दूसरा, यदि इंदिरा उस वक्त पद से हट गई होतीं तो क्या हुआ होता?

असल में जेपी की अगुआई में हो रहे विपक्ष के आंदोलन को भी इसी दौर में हवा मिल गई। 1974 के छात्र आंदोलन से लस्त पस्त विपक्ष में जो जान आई थी, उसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले ने संजीवनी की काम किया। और जाहिर है, इसी दौर में हाशिये पर पड़े आरएसएस को भी ताकत मिली

इमरजेंसी के बारे में काफी कुछ लिखा ही जा चुका है। दो दिन बाद 25 जून को इस पर फिर पन्ने रंगे जाएंगे। भाजपा और आरएसएस के लिए कांग्रेस और गांधी परिवार के खिलाफ आज भी इमरजेंसी सबसे बड़ा हथियार है। यह अलग बात है कि इमरजेंसी के दौर में संजय की भूमिका को आरएसएस ने परोक्ष रूप से सराहा ही पंक्तियों के लेखक को बताया था कि कैसे संजय गांधी ने जब परिवार नियोजन को अपने पंच सूत्रीय कार्यक्रम में शामिल किया तो सारा मामला उलट पुलट गया। मुख्यमंत्रियों में नसंबदी के आंकडे बढ़ा  चढ़ा कर बताने की होड़ मच गई थी।

वास्तव में जबरिया नसबंदी के मामले सामने न आते तो इमरजेंसी से आम लोगों को खास दिक्कत भी नहीं थी।
नसबंदी ने इंदिरा, संजय और कांग्रेस के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया कि 1977 के चुनाव में उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया।

मगर आज संजय गांधी को याद करने की एक वजह यह भी है कि कैसे वह कांग्रेस की सत्ता जाने के महज पौने दो साल बाद ही देश की सियासत के केंद्र में दोबारा आ गए थे। किस तरह से उन्होंने उन्हीं राजनारायण से मुलाकात की थी और मोरारजी देसाई सरकार के पतन में पर्दे के पीछे के एक अहम किरदार बन गए थे।

यों जनता पार्टी के टूटने की असल वजह तो आरएसएस था। मधु लिमिये जैसे समाजवादी ही नहीं, पूर्व कांग्रेसी चरण सिंह तक जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता के मुद्दे को लेकर मुखर थे। यह दीगर सवाल है कि यदि उस दौर में आरएसएस को जगह नहीं मिलती तो क्या आज वह उस जगह पर होता है, जहां वह है?

आज तो यह पूछना चाहिए  भाजपा और आरएसएस से कि इमरजेंसी के लिए वह इंदिरा और कांग्रेस को तो जिम्मेदार नहीं ठहराते, लेकिन संजय गांधी को लेकर आम तौर पर चुप्पी ही नजर आती है। आरएसएस और भाजपा सोनिया और राहुल  गांधी पर हमलावर होते हैं, जबकि तब तो वे सियासी परिदृश्य में कहीं थे ही नहीं।

इमरजेंसी में संजय संविधानेतर सत्ता का केंद्र थे। यह बात भी छिपी नहीं है कि संजय की तेज रफ्तार ने इंदिरा को सोचने को मजबूर कर दिया था और जनवरी, 1977 में उन्होंने अपने इस बेटे को भरोसे में लिया बिना ही चुनाव कराने का ऐलान किया था।
1980 में कांग्रेस की वापसी के बाद संजय गांधी भी पहली बार अमेठी से संसद पहुंचे थे। उन्हें लंबी उम्र नहीं मिली।

उनकी पत्नी मेनका और बेटे वरुण गांधी ने भाजपा का हाथ थाम लिया था। आज मेनका और वरुण लगभग हाशिये पर हैं। संजय गांधी जब तक रहे हमेशा सियासत के केंद्र में रहे, कांग्रेस सत्ता में रही हो या विपक्ष में।

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