बंगाल में भाजपा नेताओं के बदले वाले तेवर चर्चा में, सवाल उठ रहे हैं कि क्या पार्टी अब नीतीश कुमार के सुशासन मॉडल से सीख लेगी?
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पश्चिम बंगाल फिलहाल बदलापुर दिखाई दे रहा है। भाजपा के विधायक बदला लेने को उतारू दिख रहे हैं। भाजपा का कोई नेता तृणमूल के विधायक हुमायूं कबीर को अतीक अहमद जैसे अंजाम तक पहुंचाने की बात कर रहा है, तो कोई बुलडोज़र पर चढ़कर विजय जुलूस निकाल रहा है। एक नारा भी खूब लग रहा है— “बहुत हुआ सबका साथ, सबका विकास, अब इसमें जुड़ेगा सबका हिसाब।”
भाजपा को इस वक्त नीतीश कुमार से सीख लेनी चाहिए। कैसे नीतीश ने अपराध के गढ़ बने बिहार में सुशासन स्थापित किया और सभी पार्टियों के चहेते बने हुए हैं। “सबका साथ, सबका विश्वास और सबका हिसाब” की जगह भाजपा को “सबका सुशासन” पर काम करना चाहिए। अपराधियों और माफियाओं को ठिकाने लगाना चाहिए, और आम कार्यकर्ताओं को अपने पक्ष में करके अपनी लाइन लंबी करनी होगी।
आखिर भाजपा अपनी जीत के बाद किससे हिसाब करना चाहती है? ऐसा लग रहा है मानो इन्हें जनता ने गैंग बनाने के लिए चुना है। ममता के राज की अराजकता पर अंकुश होना चाहिए। अपराधियों पर कार्रवाई भी जरूरी है। लेकिन क्या जनता ने आपको ऐसे बुलडोज़र प्रदर्शन की उम्मीद से चुना है?
मान लेते हैं ममता ने डर की सत्ता चलाई। जनता को डराया, प्रताड़ित किया। एक तरह से जनता ने ममता के डर से तंग आकर ही भाजपा को चुना है। ऐसे में क्या भाजपा फिर वही डर की सत्ता पैदा करेगी? यदि भाजपा आलाकमान ने इसको गंभीरता से नहीं लिया, तो हर गली-मोहल्ले में ऐसे ही बुलडोज़र और बदले वाले नज़ारे दिखेंगे, ऐसी ही आवाजें उठेंगी।
पश्चिम बंगाल के खड़गपुर सदर से नए चुने गए भाजपा विधायक दिलीप घोष ने अपने चुनाव क्षेत्र में एक बुलडोज़र के ऊपर अपनी पार्टी का झंडा फहराकर अपनी जीत का जश्न मनाया। 61 वर्षीय पूर्व सांसद घोष, 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान राज्य भाजपा के अध्यक्ष थे, जब भाजपा ने 42 संसदीय सीटों में से 18 सीटें जीती थीं, जिसने बंगाल की राजनीति में उनकी पार्टी के आगमन का संकेत दिया था।
घोष बुलडोज़र के पक्ष में अपना तर्क देते हैं। उनका कहना है कि 2021 में, जब राज्य विधानसभा चुनावों के नतीजे घोषित हुए थे, तब कितने भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या की गई थी— यह बात किसी को नहीं भूलनी चाहिए। पिछली बार तृणमूल ने हमारे दर्जनों पार्टी दफ्तरों पर कब्ज़ा कर लिया था, उनके रंग बदल दिए थे और वहां अपने झंडे लगा दिए थे। कुछ पार्टी दफ्तरों को वापस ले लिया गया है। लोगों को पता है कि वे भाजपा के दफ्तर थे, जहां अब हमारी पार्टी के झंडे लगाए जा रहे हैं, इसलिए डरने की कोई बात नहीं है। डायमंड हार्बर में उन्होंने JCB का इस्तेमाल करके हमारे 12 पार्टी दफ्तरों को ढहा दिया था।
पर घोष बाबू, एक बात याद रखिए— जनता ने तृणमूल की इसी हिंसा से तंग आकर भाजपा को चुना है। भाजपा को बदला लेने की नीयत के बजाय ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने का काम करना चाहिए। यह सुशासन का अवसर है। नीतीश कुमार से सीखिए कि कैसे उन्होंने लालू के जंगलराज को सुशासन में बदला। उसके बाद वे बिहार के “सुशासन बाबू” बन गए, अजेय बन गए।