Rahul is unstoppable now! Will the ‘INDIA’ alliance walk along?

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राहुल अब रुकने वाले नहीं हैं ! ‘इंडिया’ साथ चलेगा क्या ?

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राहुल अब रुकने वाले नहीं हैं ! ‘इंडिया’ साथ चलेगा क्या ?

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श्रवण गर्ग (वरिष्ठ पत्रकार )

‘इंडिया’ ब्लॉक की दिल्ली में हुई बैठक में राहुल गांधी ने ऐसा क्या कह दिया कि बीजेपी और संघ में भी सन्नाटा है और विपक्ष के उन नेताओं के बीच भी जो उस मीटिंग में उपस्थित थे ? क्या राहुल ने ऐसा कह दिया कि गठबंधन के दल अगर बीजेपी और संघ के साथ लड़ाई पुराने तरीक़ों से ही जारी रखना चाहते हैं और सड़कों पर उतर दमन के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की राजनीति से बचना चाहते हैं तो फिर वे अपनी लड़ाई ख़ुद लड़ें ?

‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक के बाद जारी हुए राहुल की स्पीच के ऑडियो के बाद से राजनीति में हलचल मच गई है और उनके कहे के विश्लेषण किए जा रहे हैं ! राहुल ने जो कहा उसे उनके दो दशकों से ज़्यादा समय की राजनीति की सबसे आक्रामक अभिव्यक्ति या आज़ादी की दूसरी लड़ाई के लिए पार्टी का घोषणापत्र माना जा रहा है।
राहुल ने जो कहा उसे इस नज़रिए से देखा जाना चाहिए है कि बैठक में सोनिया गांधी भी थीं और पार्टी अध्यक्ष खड़गे भी। इस बात पर शक किया जा सकता है कि स्वभाव के विपरीत जाकर राहुल ने अपनी स्पीच को लेकर माँ सोनिया से पूर्व-स्वीकृति ली होगी या खड़गेजी को विश्वास में लिया होगा। वे कुछ ऐसा कुछ कहने जा रहे थे जिसके नतीजे कुछ भी निकल सकते हैं !

गठबंधन के सहयोगी दलों के नेताओं द्वारा की गई आलोचना को मुस्कुराते हुए सुन लेने के बाद राहुल ने कहा :’ मुझे अफ़सोस है हमारे संगठन के सदस्यों के बीच कुछ भ्रम है। वह यह कि जिन राजनीतिक औज़ारों का इस्तेमाल वे अब तक करते आए हैं वे आगे भी काम कर पाएँगे।ऐसा मुमकिन नहीं हो पाएगा।बीजेपी देश के सभी संस्थानों (क़ानून-व्यवस्था, नौकरशाही, ख़ुफ़िया एजेंसियों, चुनाव आयोग )पर क़ब्ज़ा कर चुकी है।

राहुल की स्पीच का उपसंहार यह मान सकते हैं कि विपक्षी दलों को अस्तित्व की लड़ाई अब उन औज़ारों लड़ना होगी जिन पर कांग्रेस को भरोसा है। यानी गठबंधन के दल अगर उसके लिए तैयार नहीं हैं तो फिर कांग्रेस अकेले ही लड़ेगी और परिणामों का सामना भी करेगी।

 

हुकूमत की बर्ख़ास्तगी और लोकतंत्र की बहाली के लिए प्रतिरोध की जिस राजनीति की शुरुआत राहुल करना चाहते हैं वह निश्चित ही असीमित ख़तरों से भरी है। एक ऐसी हुकूमत जिसके पितृ-संगठन में हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाता है, साध्य की प्राप्ति के लिए हिंसा के उपयोग के प्रति जिसका कोई विरोध नहीं है, जो सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति के ज़रिए सत्ताओं को प्राप्त कर उनपर क़ाबिज़ रहना चाहती है वह राहुल के अहिंसक प्रतिरोध की भ्रूण हत्या के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है।

 

मानकर चला जाना चाहिए कि राहुल इन सभी ख़तरों के प्रति सचेत हैं और उन्हें झेलने के लिए उनकी तैयारी भी है। सवाल यह है कि ‘इंडिया’ ब्लॉक के वे सहयोगी दल जो पिछले लोकसभा चुनाव में राहुल की उपस्थिति का लाभ ले चुके हैं अब उनके साथ ख़तरों में भी भागीदारी निभाएंगे कि नहीं ? ‘आम आदमी पार्टी’ की टूट के अनुभव से ममता ने कोई सबक़ नहीं लिया ! तृणमूल का हश्र सामने है। गेंद अब अखिलेश और उद्धव के पालों में है।राहुल तो अब रुकने वाले नहीं ही हैं !

राहुल को पता है कि जिस सत्ता से वे टकरा रहे हैं उसके हाथ कितने लंबे हैं ! उसके खतरे कितने गंभीर और घातक सिद्ध हो सकते हैं ! उनके इस कथन पर कम गौर किया गया है कि :’ हम संघ के सोच के बिल्कुल ख़िलाफ़ हैं। हम मर जाएँगे लेकिन बीजेपी या संघ के साथ कभी समझौता नहीं करेंगे ! इसके लिए हमें अपने सिर कटाने पड़ेंगे !’ ‘ मतलब मैं प्रतिरोध करूँगा। मैं अन्याय नहीं होने दूँगा बस !’

 

 

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