कहते हैं सच छिपता नहीं, लेकिन राजनीति में सच कब, कहां और किसके मुंह से निकले, इसकी कोई गारंटी नहीं होती।
मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट पर मचे घमासान के बीच नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने ऐसा दावा कर दिया है, जिसने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। सिंघार का कहना है कि रिटर्निंग ऑफिसर ने खुद माना कि गलती हुई है, लेकिन सरकार के दबाव में नौकरी भी बचानी है। अब सवाल यह है कि क्या वाकई लोकतंत्र दबाव में था, या फिर हार के बाद आरोपों की नई पटकथा लिखी जा रही है?
पूरा विवाद कांग्रेस प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन के नामांकन रद्द होने से शुरू हुआ। नामांकन खारिज होने के बाद भाजपा के तीनों उम्मीदवारों की राह लगभग साफ हो गई। कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र की हत्या बताया, धरना दिया, चुनाव आयोग तक पहुंची और अब नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने नया राजनीतिक बम फोड़ दिया है।
उमंग सिंघार का दावा जितना बड़ा है, उतने ही बड़े सवाल भी खड़े करता है। यदि रिटर्निंग ऑफिसर ने सचमुच गलती मानी है, तो क्या इसकी कोई रिकॉर्डिंग है? क्या कोई लिखित दस्तावेज मौजूद है? क्या चुनाव आयोग को इसकी जानकारी दी गई? या फिर यह केवल एक राजनीतिक आरोप है, जिसका मकसद राज्यसभा चुनाव को विवादों में बनाए रखना है?
अब तक न तो रिटर्निंग ऑफिसर की तरफ से कोई आधिकारिक स्वीकारोक्ति सामने आई है और न ही चुनाव आयोग ने ऐसी किसी बात की पुष्टि की है। ऐसे में यह दावा राजनीतिक बहस का विषय तो बन गया है, लेकिन इसे स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
सियासत में अक्सर हार का कारण ईवीएम, सिस्टम, प्रशासन या विरोधी दल में खोज लिया जाता है। लेकिन इस बार कांग्रेस ने सीधे उस अधिकारी को ही गवाह बना दिया, जिस पर कार्रवाई करने का आरोप लगा रही है। यानी कहानी में किरदार भी वही, आरोपी भी वही और कथित गवाह भी वही।
दूसरी तरफ भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। भाजपा का कहना है कि नामांकन नियमानुसार खारिज हुआ और कांग्रेस अपनी राजनीतिक नाकामी को साजिश का नाम दे रही है। भाजपा के मुताबिक पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप हुई और चुनावी प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता नहीं हुई।
वहीं कांग्रेस का दावा है कि यदि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन स्वीकार हो जाता, तो राज्यसभा की तीसरी सीट पर मुकाबला काफी दिलचस्प हो सकता था। कांग्रेस का मानना है कि नामांकन रद्द होने से चुनावी प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई।
राजनीति का यह भी दिलचस्प दौर है, जहां अदालत में फैसला अभी बाकी है, चुनाव आयोग अपनी प्रक्रिया बता रहा है और नेताओं ने फैसला पहले ही सुना दिया है। कांग्रेस कह रही है कि दबाव था, भाजपा कह रही है कि नियम थे, और जनता पूछ रही है कि आखिर सच क्या है?
अब यह मामला सिर्फ एक नामांकन तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता का है। सवाल प्रशासनिक निष्पक्षता का है। और सवाल उन आरोपों का भी है, जो बिना किसी सार्वजनिक सबूत के लगाए जा रहे हैं।
जब तक रिटर्निंग ऑफिसर खुद सामने आकर कुछ नहीं कहते या कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक नहीं होता, तब तक उमंग सिंघार का दावा एक बड़ा राजनीतिक आरोप है, लेकिन स्थापित तथ्य नहीं। राज्यसभा की एक सीट ने मध्य प्रदेश की राजनीति में ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है कि अब लड़ाई सिर्फ सीट की नहीं, बल्कि साख की भी हो गई है।
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