राकेश कायस्थ (वरिष्ठ पत्रकार )
हिंदी के लोकप्रिय उपन्यास राग दरबारी में वैद्यजी हुआ करते थे. वैद्यजी के पास दो तरह के रोगी थे. प्रकट रोगी और गुप्त रोगी. वैद्यजी प्रकट रोग का इलाज प्रकट तरीके से करते थे और गुप्त रोग का इलाज गुप्त तरीके से.
केंद्र सरकार का भी यही हाल है. प्रकट रोग इस्लामोफोबिया है, जिसका इलाज मुल्ला टाइट परियोजना के ज़रिये चल रहा है. प्रकट रोग चुनाव में बीजेपी को हराने की ‘साजिश’ करने वाले विपक्षी नेता हैं, जिनका इलाज ईडी और सीबीआई और अदालतें कर रही हैं.
देश की आर्थिक बदहाली गुप्त रोग है. ये मर्ज गंभीर है और इलाज गुप-चुप तरीके से चल रहा है लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं है. ये एक दिलचस्प तथ्य है कि अपने छोटे से छोटे काम का ढिंढोरा पीटने वाली केंद्र सरकार ने पिछले डेढ़ साल में देश की अर्थव्यस्था को पटरी पर लाने के कई गंभीर प्रयास किये हैं लेकिन उनका ढोल नहीं पीटा, जानते हैं क्यों? दरअसल सरकार को खुद भी इस बात का भरोसा नहीं था कि उसकी कोशिशें दम तोड़ती अर्थव्यस्था को पुर्नजीवित कर पाएंगी.
नये वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश की प्रमुख कंपनियों के वित्तीय नतीजे आपकी स्क्रीन पर हैं. इस तिमाही में कुछ सुधार के बावजूद अब भी ज्यादातर प्रमुख कंपनियां बिक्री और लाभ में संतोषजनक सुधार नहीं दिखा पा रही हैं. नतीजों में गिरावट का सिलसिला करीब दो साल पहले यानी सितंबर 2024 की तिमाही से शुरू हुआ था.
फाइव ट्रिलियन इकॉनमी का शिगूफा छोड़ने और विकसित भारत का ढोल पीटने वाली सरकार ये अच्छी तरह जानती थी कि इकॉनमी की असली हालत क्या है. आम आदमी की जेब से पैसे निकालने में माहिर सरकार ने कलेजे पर पत्थर रखकर पिछले साल इनकम टैक्स में बड़ी कटौती का एलान किया लेकिन इसका देश की आर्थिक सेहत पर कोई खास असर नहीं हुआ.
उसके बाद सरकार ने जीएसटी की दरों में कटौती की ताकि बाज़ार में मांग लौटाई जा सके लेकिन जहां बेरोजगारी अपने उच्चतम स्तर पर हो वहां डिमांड किस तरह वापस लौटे? जीएसटी कटौती का आइडिया भी फुस्स हो गया. इनकम टैक्स और जीएसटी कटौती से सरकारी खजाने का जो नुकसान हुआ उसमें अगर चुनाव जीतने के लिए तरह-तरह की स्कीमों के ज़रिये बांटी जाने वाली खरबों की सब्सिडी को जोड़ लिया जाये तो देश की अर्थव्यस्था इस समय बारूद के ढेर पर बैठी है.
कोविड के समय शुरू की गई मुफ्त अनाज योजना अब तक जारी है और इस पर साल लगभग 2 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं. हर राज्य के चुनाव से पहले बांटी जाने वाली कैश सब्सिडी अलग है. दूसरी तरफ आंकड़े बता रहे हैं कि साक्षरों या उच्च शिक्षित लोगों में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा है. इसका सीधा मतलब ये है कि उच्च गुणवत्ता वाली ऐसी नौकरियां देश में नहीं के बराबर है, जो किसी परिवार की माली हालत बदल दे.
डॉलर आसमान पर है और रुपया जमीन सूंघ रहा है. इंपोर्ट बिल खजाना लगातार खाली कर रहा है. पेट्रोल, डीजल और गैस की आसमान छूती कीमतों की वजह से करोड़ों घरों में दो वक्त चूल्हा जल पाना मुश्किल होता जा रहा है. विदेशी निवेशक शेयर बेचकर भारत से भाग रहे हैं और घरेलू कंपनियां कोई नया निवेश नहीं कर रही हैं.
इन सबके बीच गोदी मीडिया नेहरू को परास्त कर देने पर अपनी जंघा पीट रहा है और गुप्त रोग के इलाज में विफल वैद्जी देश का ध्यान भटकाने के लिए नये तमाशों के आविष्कार पर मौलिक चिंतन कर रहे हैं.
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