दिल्ली से तेल अवीव: क्या भारत ने चुपचाप बदल ली है अपनी दशकों पुरानी फिलिस्तीन नीति?

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दिल्ली से तेल अवीव: क्या भारत ने चुपचाप बदल ली है अपनी दशकों पुरानी फिलिस्तीन नीति?

आजादी के बाद से भारत की विदेश नीति में फिलिस्तीन का समर्थन एक स्थायी स्तंभ रहा है। (PM Modi Israel Visit 2026)

लेकिन पिछले एक दशक में, विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, भारत और इजरायल के रिश्तों में जो गर्माहट आई है, उसने दुनिया का ध्यान खींचा है।(Modi Netanyahu Summit 2026)

हालिया वैश्विक घटनाक्रमों और गाजा युद्ध के दौरान भारत के रुख ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मोदी सरकार अब बिना सार्वजनिक घोषणा किए पूरी तरह से इजरायल के पाले में खड़ी हो चुकी है?(India Israel Strategic Partnership)

ऐतिहासिक यू-टर्न: नेहरू के आदर्शों से मोदी की कूटनीति तक (Narendra Modi Tel Aviv Speech)

भारत कभी फिलिस्तीन के पक्ष में दुनिया की सबसे मुखर आवाजों में से एक था। 1988 में फिलिस्तीन को मान्यता देने वाला भारत पहला गैर-अरब देश था। हालाँकि, 1992 में कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत के बाद से बर्फ पिघलनी शुरू हुई। (India-Israel Defense Deals 2026)

लेकिन असली बदलाव 2014 के बाद आया। 2017 में पीएम मोदी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। यह दौरा केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि इसने दशकों पुराने ‘हिचकिचाहट’ के दौर को खत्म कर दिया।(India-Israel Drone Deal (Adani-Elbit))

अब भारत ‘डी-हाइफनेशन’ की नीति पर चल रहा है, जहाँ वह इजरायल से सैन्य संबंध बढ़ाते हुए भी फिलिस्तीन से औपचारिक संवाद बनाए रखता है। (Iron Dome Technology for India)

‘मेक इन इंडिया’ का इजरायली कनेक्शन ( I4F (India-Israel Industrial R&D Fund)

भारत और इजरायल के बीच बढ़ती नजदीकी का सबसे बड़ा आधार ‘रक्षा’ है। आज भारत इजरायली हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है, जो इजरायल के कुल निर्यात का लगभग 46% हिस्सा है। (Semiconductor manufacturing India Israel)

अडानी समूह और एल्बिट सिस्टम्स जैसे उपक्रमों के बीच साझेदारी ने रक्षा उत्पादन को नई दिशा दी है। (Cybersecurity Cooperation India Israel)

ड्रोन तकनीक से लेकर मिसाइल सिस्टम तक, इजरायल भारत का एक भरोसेमंद साझेदार बनकर उभरा है। इसके अलावा, कृषि में ड्रिप इरिगेशन और सेमीकंडक्टर निर्माण जैसे क्षेत्रों में इजरायली तकनीक भारत की आर्थिक प्राथमिकताओं का हिस्सा बन चुकी है। (India-Middle East-Europe Economic Corridor (IMEC))

सितंबर 2024 में अडानी समूह और इजरायल की टॉवर सेमीकंडक्टर के बीच हुआ समझौता इसी कड़ी का एक हिस्सा है। (Israel-India Free Trade Agreement (FTA) news)

गाजा युद्ध और संयुक्त राष्ट्र में भारत का बदलता रुख (Modi vs Nehru Israel policy) 

अक्टूबर 2023 के हमलों के बाद भारत का रुख पहले की तुलना में काफी अलग नजर आया। जहाँ अतीत में भारत मानवाधिकारों के हनन पर इजरायल की तुरंत निंदा करता था, वहीं हाल के वर्षों में भारत ने कई महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर ‘अनुपस्थित’ रहने का विकल्प चुना।

अक्टूबर 2023 में मानवीय संघर्ष विराम के प्रस्ताव पर वोट न देना और 2024 में इजरायल को हथियारों की बिक्री रोकने वाले प्रस्ताव से दूरी बनाना इस बात का संकेत है कि भारत अब इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता दे रहा है।

हालांकि, भारत अभी भी द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की बात करता है, लेकिन अब भारत की सक्रियता और मोदी का दौरा इजरायल के पक्ष में अधिक झुका हुआ नजर आता है।

विचारधारा और आतंकवाद: एक समान मॉडल की तलाश

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की इस बदलती नीति के पीछे केवल रणनीतिक हित नहीं बल्कि वैचारिक समानता भी है।

हिंदुत्व विचारधारा के पैरोकार अक्सर इजरायल को एक ‘मॉडल’ के रूप में देखते हैं एक ऐसा देश जो चारों तरफ से दुश्मनों से घिरे होने के बावजूद अपनी संप्रभुता की रक्षा करता है।

2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के समय पीएम मोदी ने इजरायल की सैन्य क्षमता का उदाहरण दिया था।

सोशल मीडिया पर #IndiaStandsWithIsrael जैसे ट्रेंड्स और घरेलू स्तर पर इजरायल के प्रति बढ़ता समर्थन यह दर्शाता है कि आतंकवाद के खिलाफ इजरायल की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अब भारत की अपनी रक्षा नीति का प्रेरणा स्रोत बन गई है।

क्या बहु-पक्षीय कूटनीति बरकरार रहेगी? 

इजरायल के साथ इस बढ़ती घनिष्ठता के बीच भारत के सामने अपने पुराने सहयोगियों, जैसे ईरान और अरब देशों के साथ संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। (Hindutva and Zionism connection) 

अमेरिका के दबाव और इजरायल से बढ़ती दोस्ती के कारण चाबहार जैसे प्रोजेक्ट्स और ईरान के साथ रिश्तों पर असर पड़ सकता है।

हालांकि, यूएई और सऊदी अरब के साथ भारत के रिश्ते मजबूत हुए हैं, लेकिन गाजा में बढ़ते मानवीय संकट और इजरायल के प्रति बढ़ते वैश्विक आक्रोश के बीच भारत के लिए ‘तटस्थ’ दिखना मुश्किल होता जा रहा है।

क्या भारत नेहरू युग की तरह जटिल वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच अपना स्वतंत्र रास्ता बना पाएगा, यह आने वाले समय का सबसे बड़ा सवाल है।

भारत की विदेश नीति अब आदर्शवाद से हटकर शुद्ध ‘राष्ट्रीय हित’ पर केंद्रित है। इजरायल आज भारत के लिए केवल एक मित्र नहीं, बल्कि रक्षा, तकनीक और सुरक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। (Impact of Modi’s visit on Arab countries)

भले ही सरकार आधिकारिक तौर पर इसे ‘संतुलन’ कहे, लेकिन वैश्विक राजनीतिक गलियारों में यह स्पष्ट है कि भारत ने अपनी पसंद चुन ली है।

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