पश्चिम बंगाल...यह पराजय नहीं, पतन की कहानी है

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बंगाल में जो कुछ हुआ, जो कुछ हो रहा है, क्या वह केवल एक चुनावी पराजय और प्रतिक्रिया है? बंगाल के चुनाव क्या अन्य राज्यों की तरह हुए एक और राज्य के चुनाव परिणामों जैसे हैं? क्या बंगाल भारत के दूसरे राज्यों से कुछ अलग और घातक लक्षणों में प्रकट नहीं हो रहा था? क्या बंगाल के कुकर की सीटी सौ डिग्री के ताप की प्रतीक्षा में नहीं थी, जो उच्चांक पर आते ही जोर से बज उठी है….
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जो लोग पिछले तीन दशकों में पश्चिम बंगाल में किसी अध्ययन या रिपोर्टिंग के लिए एक से अधिक बार नहीं गए हैं, वे समझ ही नहीं सकते कि वहाँ चल क्या रहा था। 2026 में एक लगातार खंडित, हताशा की हद पर जा पहुँचे और लगभग खत्म होते राज्य की जनता जैसे एक अंतिम शक्ति जुटाकर अपने सामने उपस्थित सर्वश्रेष्ठ विकल्प के बगल में जा खड़ी हुई है।
भ्रष्टाचार से कोई राज्य मुक्त नहीं है मगर बंगाल जैसा वसूली नेटवर्क बनाना किसी के लिए मुमकिन नहीं है। सत्ता की अपराधियों के साथ खुली गठजोड़ ने कानून-व्यवस्था को ही कैद कर डाला था। घुसपैठ के लिए कोई सीमा नहीं थी और निरंकुश सत्ता भी असीमित थी।
मनमानी वसूली और बेहिसाब बढ़ते अतिक्रमणों ने शहरी विकास का कचूमर निकाल दिया था और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था। असंतुलित होती जनसांख्यिकी ने समाज के चरित्र पर चोट की। हर तरफ से निराश राज्य की जनता ने बंपर मतदान कर इस पार या उस पार जैसा जवाब दिया।
बुआ-भतीजे की रियासत में सत्ता में हिस्सेदार सब होंगे मगर उनकी कार्यशैली पर सबकी मुहर नहीं ही होगी। कुछ या अधिकतर के दस्तखत किसी और ने ही किए होंगे। वे अपने तात्कालिक लाभ के लिए मजबूरी में ही इस रिश्ते में रहे होंगे। जब सबकी नस सबके हाथ दबी हो तो एक कॉमन मिनिमम समझौते पर चलना बेहतर होता है ताकि खीर की कटोरी सबको मिले और दोने में भरा रायता भी न फैले।
बिहार में बाप-बेटे की रियासत में धूल उड़ रही है। यूपी में बहनजी और भैयाजी के किस्से प्राचीन काल में एक थी रानी और एक था मंत्री टाइप के बचे हैं। पिताजी जब नेताजी थे तब तक सैफई के सिक्के खनकते रहे मगर अब बेटाजी की बादशाहत किसी को कुबूल नहीं है। दिल्ली में भी तीन पीढ़ियों का सल्तनतकाल समाप्त हो चुका है। तमिलनाडु की प्रजा ने अभी-अभी करुणानिधि की तीसरी पीढ़ी को रामेश्वर के तटों तक जाकर खदेड़ दिया है।
प्रश्न सामान्य है- चेन्नई में उदयनिधि की योग्यता क्या है? पटना में तेजस्वी के तेज का मूल क्या है? लखनऊ में आनंद कुमार के आनंद लोक क्यों सजने चाहिए थे? संघर्ष से स्वयंनिर्मित दीदी तो ठीक हैं मगर अभिषेक को बंगाल क्यों सिर पर बैठाए?
इस प्रश्न का विस्तार लखनऊ से दिल्ली तक और उन सब राजनीतिज्ञों तक कीजिए, जो अपनी दूसरी या तीसरी पीढ़ी को सत्ता पर लाद रहे हैं। बेटे, बहू, भाई, भतीजे, भांजे, दीदी, दामाद, नाती, पोते, सबके अंडे, सबके बच्चे। देश में ये चल क्या रहा है?
बंगाल से लेकर तमिलनाडु वालों ने कहा है कि अब बस कीजिए। बहुत हुआ। अब यह सब उनके यहाँ नहीं चलेगा।
मगर बंगाल सबसे विशिष्ट है। बंगाल के परिणाम किसी दल की साधारण जय-पराजय के नहीं हैं। यह दीदी के दल का स्पष्ट पतन है। चार मई को जनता ने उन्हें खदेड़ा और अब दल के अपने लोगों ने भी बता दिया कि यह चुनावी पराजय नहीं, पतन की शुरुआत है।
बंगाल की हर यात्रा में मुझे विचित्र लगता था कि कोई देखने वाला नहीं है। जैसे बंगाल की नियति को सबने मन मारकर स्वीकार कर लिया था। अपने राज्य, अपने देश, अपने इतिहास, अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा और अपने धर्म के प्रति जरा भी सोचने वाला बंगाली अपने आसपास तेजी से पसरते “अभद्रलोक’ को देखकर जितना बेचैन अब था, उतना पहले कभी नहीं था।
एक कटु सत्य मुझे एक लेखक की इस टिप्पणी में कोलकाता में सुनने को मिला, “हमारे कारोबार खतरे में हैं। बेटियों को कोई उठा ले जाए तो कोई एफआईआर नहीं होगी। थाने में गए तो वही अपराधी वहाँ मिलेंगे और धमकाएँगे। मकान-दुकान के सौदों पर अपराधियों के निर्णय मान्य हैं। चुनाव पर पहरा भी उनका ही है। आप अपनी मर्जी से वोट नहीं डाल सकते। हम बुरी तरह घिर चुके हैं। दुश्मनों से भी और दुश्मन के उन दोस्तों से भी, जिन्हें हम अपना समझते रहे। जिहाद के जितने प्रकार देश और दुनिया में प्रचलित हैं, बंगाल को वे उतने ही मुँह के साँपों की तरह डसे हुए हैं।’ यह इसी साल जनवरी की बात है।
2011 के बाद बंगाल कई बार जाना हुआ। तब सीपीएम की तीन दशक लंबी सत्ता के दुष्परिणामों से उबरा जर्जर बंगाल एक उम्मीद से भरा हुआ था। मगर वह एक परिवारवादी निरंकुश राजनीति के चंगुल में फँस गया, जहाँ एकपक्षीय सेक्युलरिज्म की टेम्पलेट टीएमसी ने कांग्रेस से ही ली थी और उसे और अधिक धारदार बनाकर बंगाल को बकरा समझकर उसके गले पर चलाया।
यह सच है कि सत्ता दल में सब एक से नहीं थे। माफिया माइंडसेट के लोग पूरी तरह भतीजे के भौकाल में थे मगर एक वर्ग ऐसा भी था, जो अंसतुष्ट होकर भी शुभेंदु जितना साहसी नहीं था कि छाती तानकर छोड़कर चला जाए और संघर्ष करे। वह मन मारकर वहीं बैठा किसी अनुकूल घड़ी का इंतजार कर रहा था। वह घड़ी अब आई। पहले सत्ता से बाहर हुए और अब 80 की बैठक में बुलाए गए 60 अपने घरों में आराम से टिके बदलाव के कूलर की हवा खा रहे थे।
यह तो अंत की शुरुआत है। सत्ता अपना अंत स्वयं लिखती है। बंगाल में बुआ-भतीजे ने अपने ही चार कंधे अपनी ही सत्ता को दे दिए। सत्ता की पालकी पतन के इस मोड़ पर अंतिम यात्रा जैसी हो गई। इस बुरे वक्त में किराए पर रोने वाले भी नहीं मिल रहे। गलियों से निकलना दूभर हो रहा है।
चमचमाती गाड़ियों की छत पर खड़े होकर वे फूलों की बरसात का आनंद ले रहे थे। पल भर में ही दृश्य बदल गया है। बंगाल की सड़कों पर प्रजा उन्हें अंडे फैंककर दौड़ा रही है और चोर-चोर के घोष सुनाई दे रहे हैं।
पुलिस, सीआईडी और ईडी हरकत में है। विधायकों के नकली हस्ताक्षर मिलाए जा रहे हैं। 15 साल के बही-खातों का हिसाब थोड़े लंबे और जटिल हैं। बंगाल के राजनीतिक पतन की इस ताजा कथा का सार देश के सभी दलों को लेना चाहिए। खासकर उन्हें, जिनकी उंगली थामकर बेटे, बहू, भाई, भतीजे, भांजे, दीदी, दामाद, नाती, पोते सत्ता की सीढ़ियों पर नजरें गड़ाए हुए हैं ताकि एक योग्य कार्यकर्ता के अधिकार का अतिक्रमण कर वे अपनी पारिवारिक राजनीति की रियासत को मजबूती से आगे बढ़ा सकें। उदयनिधि, अभिषेक, आनंद, तेजस्वी आदि-आदि की अपनी योग्यताएँ क्या हैं?
सावधान। यह परिवारवादी राजनीति के ताजा पतन की कहानी है।

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