मध्यप्रदेश में भी खुलेगा छात्रसंघ चुनाव का रास्ता !

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The way for student union elections will open in Madhya Pradesh too!

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वंशवादी राजनीति सबसे बड़ी मुश्किल .. दरअसल छात्र राजनीति से निकलकर मंत्री और मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे नेता  अपने बेटों के अलावा किसी दूसरे
युवा नेताओं को आगे नहीं आने देना चाहते। ये भी एक कारण है छात्र संघ चुनाव न होने का।
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बाते युवा नेतृत्व की पर नामी  संस्थानों में भी रोक  ..  जामिया मिलिया इस्लामिया, BHU, AMU, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और JU जैसी कई सेंट्रल, स्टेट यूनिवर्सिटी ने स्टूडेंट बॉडी चुनाव बंद कर दिए हैं, वहीं IIT में अलग तरह के रेगुलर चुनाव होते हैं।
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मध्यप्रदेश में भी 2017 से छात्रसंघ चुनाव पर रोक है। तीन शिवराज, कमलनाथ के बाद अब मोहन यादव मुख्यमंत्री हैं, कर्नाटक के फैसले से  प्रदेश में
भी चुनाव का रास्ता खुलेगा।  हाईकोर्ट पहले ही सरकार को छात्रसंघ चुनाव को लेकर सवाल कर चुका है।
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#politicswala Report
दिल्ली /बेंगलुरु। भोपाल।

कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट यूनियन चुनावों पर लगी रोक हटाने का प्रस्ताव दिया है, जो लगभग तीन दशकों से लागू है, लेकिन देश भर के कई राज्यों में हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन (HEI) में स्टूडेंट बॉडीज़ के लिए रुके हुए चुनावों का  विश्लेषण करें तो ज्यादातर यूनिवर्सिटी में बरसो से छात्रसंघ चुनाव है हुए। मध्यप्रदेश में भी एक दशक होने जा रहा है। कर्नाटक में छात्रसंघ चुनाव के लिए सरकार ने कमेटी बनाई है। इसके बाद मध्य्रपदेश में भी हलचल तेज है। मध्यप्रदेश में हाईकोर्ट भी सरकार से पहले सवाल कर चुका है कि छात्रसंघ चुनाव क्यों नहीं करवाए जा रहे हैं।

 इन चुनावों के न होने से बड़े स्तर पर नए ऊर्जावान नेता देश को नहीं मिल पा रहे हैं। मध्यप्रदेश में तो नेता छात्रसंघ चुनाव का सवाल सुनते है गायब हो जाते हैं। उच्च शिक्षा मंत्री इन्दर सिंह परमार से पिछले महीने एक आयोजन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों ने छात्रसंघ चुनाव के बारे में सवाल किया तो वे उलटे पैर लौट गए। पॉलिटिक्सवाला ने भी कई पूर्व छात्र नेता और वर्तमान में मंत्रियों से चर्चा की तो  ऑफ थे रिकॉर्ड तो वे बोले कि चुनाव होने चाहिए। पर सीधे सीधे सब पार्टी लाइन का बहाना बनाकर किनारा कर गए।

खास बात ये है कि मध्य प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और पूर्व सीएम शिवराज सिंह छात्र राजनीति से होकर ही इस मुकाम पर पहुंचे हैं। वहीं, इस समय मोहन मंत्रिमंडल के 12 मंत्री और 19 विधायक ऐसे हैं, जिन्होंने राजनीति का ककहरा छात्र जीवन में ही सीखा था। अब वे छात्र संघ चुनाव से किनारा कर रहे हैं। दरअसल वंशवादी राजनीति के कारण नेता अपने पुर्त्रो को आगे बढ़ाने में इस कदर लगे हुए है कि वे नया नेतृत्व उभरने नहीं देना चाहते।

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने स्टूडेंट यूनियन चुनावों को फिर से शुरू करने की शुरुआत की, और  मेडिकल एजुकेशन मिनिस्टर शरण प्रकाश पाटिल के नेतृत्व में नौ सदस्यों की एक कमेटी बनाई ताकि राज्य में इन चुनावों को फिर से शुरू करने की संभावना और तरीकों की जांच की जा सके। यह डिप्टी चीफ मिनिस्टर डी के शिवकुमार की पहल थी, जो कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी  के प्रेसिडेंट भी हैं। राज्य कांग्रेस नेताओं का कहना है कि इसका मकसद युवाओं को भविष्य के लिए पॉलिटिक्स में प्रशिक्षित करना है।

कई राज्यों में अलग-अलग समय पर स्टूडेंट यूनियन इलेक्शन बंद किए गए हैं, जिसके बारे में जानकारों का कहना है कि यह ऐसे इचुनावों में होने  वाली हिंसा के कारण ये चुनाव बंद हुए।   यहां तक कि जिन संस्थानों में लगातार चुनाव हुआ।  उनमें भी अक्सर धन और सत्ता काबड़े पैमाने पर इस्तेमाल के आरोप लगे हैं।

स्टूडेंट यूनियन चुनाव के सवाल पर, सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए हमेशा बहुत कुछ दांव पर लगा होता है। पार्टी लाइन से हटकर कई बड़े नेताओं ने स्टूडेंट पॉलिटिक्स से अपनी पारी शुरू की, जिनमें नीतीश कुमार, शिवराजसिंह चौहान, मोहन यादव,लालू प्रसाद, अशोक गहलोत, अजय माकन, नितिन गडकरी, धर्मेंद्र प्रधान, ममता बनर्जी, शिवकुमार, के सी वेणुगोपाल, रेखा गुप्ता या स्वर्गीय अरुण जेटली जैसे नाम शामिल हैं। हालांकि, स्टूडेंट बॉडी पोल के कैंपस में टकराव, आंदोलन और यहां तक कि हिंसा में बदलने से कई सेंट्रल और स्टेट यूनिवर्सिटी में चुनाव में रुकावट आई है, जिससे वे एक अनियमित हो  गए हैं।’

कुछ नामी विश्वविद्यालयों पर नजर

JNU जैसी यूनिवर्सिटी के चुनाव विचारधारा से जुड़े और यहां तक कि ध्रुवीकरण करने वाले होते हैं, लेकिन वे पैसे या ताकत से जुड़े नहीं होते हैं। JNU में स्टूडेंट यूनियन चुनावों को एक “जानकारी भरा” मामला कहा जाता है – भाषणों के साथ जनरल बॉडी मीटिंग, प्रेसिडेंशियल डिबेट और कई नेशनल और इंटरनेशनल मामलों पर पैम्फलेट वॉर।

ऐसा चुनाव मॉडल, जिसे कुछ हद तक हैदराबाद यूनिवर्सिटी में भी अपनाया गया है, का मकसद स्टूडेंट को “एक जानकारी वाला नागरिक और क्रिटिकल सोच वाला” बनाना है।

इसके उलट, दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के चुनावों में पैसे और ताकत का कथित इस्तेमाल देखा जाता है। जहां JNU कई पॉलिटिकल विचारकों और राज्यसभा के नेताओं को देने के लिए जाना जाता है, वहीं DU कई MLA और MPs की पॉलिटिकल नर्सरी के तौर पर जाना जाता है।

BJP, कांग्रेस और लेफ्ट जैसी पार्टियां इन चुनावों में बहुत दिलचस्पी लेती हैं, यहां तक कि उनके सीनियर नेता अपने-अपने स्टूडेंट विंग के नेताओं और उम्मीदवारों के साथ कोऑर्डिनेट करते हैं और उनके लिए कैंपेन भी करते हैं।

जामिया मिलिया इस्लामिया में 2006 से कोई स्टूडेंट यूनियन चुनाव नहीं हुआ है। BHU में 1996 से और AMU में 2018 से कोई स्टूडेंट बॉडी चुनाव नहीं हुआ है।

2018 से, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में भी कोई स्टूडेंट यूनियन चुनाव नहीं हुआ है, जबकि हिमाचल प्रदेश की सेंट्रल यूनिवर्सिटी में 2019 से कोई स्टूडेंट बॉडी चुनाव नहीं हुआ है। लद्दाख यूनिवर्सिटी में भी 2024 से कोई स्टूडेंट यूनियन चुनाव नहीं हुआ है।

सेंट्रल यूनिवर्सिटी में, JNU, DU, असम यूनिवर्सिटी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, केरल यूनिवर्सिटी और हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी में अभी भी स्टूडेंट यूनियन के रेगुलर चुनाव होते हैं।

स्टेट यूनिवर्सिटी में, चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी में रेगुलर स्टूडेंट यूनियन चुनाव होते हैं। कोलकाता में जादवपुर विश्वविद्यालय (जेयू) में 2020 से छात्र संघ चुनाव नहीं हुए हैं। पटना विश्वविद्यालय में नियमित चुनाव होते हैं, जबकि बिहार के अन्य सभी विश्वविद्यालयों में चुनाव होते रहे हैं।

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