गुजरात में जो भी हारा उसको हरिनाम!


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गुजरात में जो भी हारा उसको हरिनाम!

शंभूनाथ शुक्ल

गुजरात का चुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अहम है. यही कारण है कि जहाँ एक तरफ राहुल गाँधी वहां पिछले महीने भर से डेरा डाले हैं वहीँ भाजपा ने अपने सारे सीनियर मंत्रियों और कई मुख्यमंत्रियों को भेजा हुआ है और अब तो स्वयं प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ताबड़तोड़ रैलियाँ कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि गुजरात विधानसभा का चुनाव मानों कुरुक्षेत्र का समर बन गया हो. हालाँकि है भी ऐसा ही. भाजपा यदि गुजरात हारी तो उसकी पराजय का अध्याय खुल जाएगा और अगर कांग्रेस हारी तो राहुल गाँधी का मिथक टूट जाएगा. और तब शायद नेहरू-इंदिरा वंश के हाथ से नेतृत्त्व चले जाने की कवायद शुरू हो जाएगी. क्योंकि इसके बाद कांग्रेस के अन्दर की कलह और बढ़ जाएगी. और किसी न किसी कोने से उनके विरुद्ध आवाज़ उठेगी. इसीलिए इस चुनाव में दोनों ही पक्षों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है.

इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात में राहुल गाँधी ने शुरू में वैसे ही पैंतरे अपनाए जैसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान अपनाए थे. छोटे-छोटे दलों और मोर्चों को साधना, शत्रु को इंगित करना और फिर अचानक हमला बोल देना. इसी मकसद के तहत राहुल गाँधी ने गुजरात पहुँच कर क्षत्रिय नेता अल्पेश ठाकोर को साधा. मालूम हो कि क्षत्रिय गुजरात में ओबीसी हैं. इसके बाद ऊना आन्दोलन से उभरे दलित नेता जिग्नेश मेवानी को अपने साथ किया. अंतिम दाँव के रूप में वे हार्दिक पटेल को भी अपने साथ ले गए. पर यह दांव सधा नहीं. इसके अलावा ट्वीट और जुमलों को भी पकड़ा. लेकिन यहीं राहुल गाँधी गच्चा खा गए. जुमलों को गढ़ने और पलटवार करने में भाजपा का जोड़ नहीं. सोमवार को प्रधानमंत्री गुजरात के कच्छ इलाके में थे. वहां उन्होंने राहुल के उस ट्वीट पर पलटवार किया जिसमें राहुल गाँधी ने कहा था कि ट्रंप से दोस्ती काम न आई और आतंकी हाफ़िज़ सईद रिहा हो गया. मोदी ने एक रैली में ठेठ गुजराती में कहा कि राहुल गाँधी और उनकी पार्टी को 26/11 के मास्टर माइंड हाफ़िज़ सईद के रिहा हो जाने से ख़ुशी हो रही है. जबकि उसे पाकिस्तान की अदालत ने छोड़ा है. अपनी इस व्याख्या से नरेंद्र मोदी ने अचानक राहुल और कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर दिया.

दूसरी तरफ जैसे ही हार्दिक ने कांग्रेस के साथ समझौता किया फौरन एक सीडी बाज़ार में आ गई जिसमें वे किसी महिला के साथ अश्लील मुद्रा में हैं. शायद इसीलिए कांग्रेस ने किसी का अपने साथ विलय नहीं किया. न जिग्नेश के दलित अधिकार मोर्चे का और न ही हार्दिक के पाटीदार अमानत आन्दोलन समिति (पीएएएस) मोर्चे से. उलटे हार्दिक पटेल ने तो खुद ही कह दिया कि वे कांग्रेस के साथ जाना ही नहीं चाहते थे. जिग्नेश ने तो वडगाम विधानसभा सीट से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार परचा भी दाखिल कर दिया है. वडगाम में मतदान 14 दिसम्बर को है. बनासकांठा जिले की वडगाम सीट से नामांकन दाखिल कराते समय युवा दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने अपने एक ट्वीट में कहा था कि “दोस्तों, मैं गुजरात के बनासकांठा जिले के वडगाम-11 सीट से एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ रहा हूं. हम लड़ेंगे,हम जीतेंगे.” उन्होंने एक और ट्वीट में अपने फेसबुक पेज का लिंक शेयर करते हुए लिखा कि लड़ रहा हूं वडगाम से, पर निशाने पर हैं वडनगर के पीएम.

फिलहाल माना यही जा रहा है कि कांग्रेस ने मेवानी को मौन समर्थन दिया है क्योंकि कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी करते वक्त वडगाम पर किसी उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है. मेवानी ने सोमवार को अपना नामांकन दाखिल किया. 14 दिसंबर को होने वाले दूसरे चरण के लिए नामांकन दाखिल करने का सोमवार आखिरी दिन था. युवा दलित नेता मेवानी अहमदाबाद से उना के लिए दलित गर्व जुलूस निकालने के बाद सुर्खियों में आए थे. उन्होंने दलित जुलूस के जरिए बीते साल गोरक्षकों द्वारा सौराष्ट्र क्षेत्र में दलित चर्मकारों पर हुई ज्यादती का विरोध किया था. इससे पहले उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल में शामिल होने या चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं जताई थी. उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की थी और उनकी पार्टी को समर्थन जताया था. खबरों के मुताबिक इस सीट से मौजूदा विधायक कांग्रेस के मणिभाई वाघेला ने कहा है कि पार्टी ने उन्हें नामांकन न कराने का निर्देश दिया गया है और यह मेवानी के साथ समझौते के तहत किया गया है. वाघेला ने कहा कि कांग्रेस ने वड़गाम सीट पर मेवानी को परोक्ष समर्थन दिया है. यह सीट अनुसूचित जाति (एससी) के उम्मीदवार के लिए आरक्षित है.

दूसरी तरफ पाटीदार नेता हार्दिक पटेल को गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कांग्रेस का एजेंट करार दिया है. अब इसको लेकर हार्दिक पटेल ने पलटवार करते हुए कहा कि उनका कांग्रेस से कोई नाता नहीं, इसलिए उन्हें कांग्रेस से नहीं जोड़ा जाए. उन्होंने कहा कि विजय रूपाणी सही मुद्दों से भाग रहे हैं. इसलिए सीडी कांड और अन्य तरीके से उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन अब इस सब से कुछ नहीं होने वाला है. गुजरात की जनता सब कुछ देख रही है. हार्दिक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि पीएम मोदी खुद गाली-गलौच और लोगों को बदनाम करने वालों को फॉलो करते हैं. लेकिन, देश के सही मुद्दों को ट्विटर पर नहीं उठाते हैं. पीएम मोदी की तबाड़-तोड़ रैलियों पर हार्दिक ने कहा अब उनकी पहले जैसी हवा नहीं रही. हाल की रैलियों में कुछ हजार लोग ही जमा कर पाई है भाजपा. साफ है कि भाजपा की लुटिया डूबने जा रही है. तभी तमाम मंत्रियों को गुजरात में झोंका जा रहा है. हार्दिक ने आगे कहा कि सही बात तो यह की पीएम मोदी विकास करने के दावे के बावजूद गुजरात के विकास की सीडी नहीं दिखा पा रहे है. लेकिन, गुजरात को सेक्स सीडी जरूर दिखाई जा रही है. भाजपा ने कुछ भी विकास नहीं किया है. उन्होंने कहा कि मैं राजनीति करुंगा, लेकिन ढाई साल बाद. अभी तो मैं गुजरात की राजनीति और उसके मुद्दों को समझ रहा हूं. सियासत के लिए तो मैं खुद को अभी तैयार कर रहा हूं.

अल्पेश ठाकोर जरूर कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं. यूँ भी वे पुराने कांग्रेसी नेता खोड़ाभाई पटेल के बेटे हैं. करीब तीन साल पहले अल्पेश ने ठाकोर सेना का गठन किया था, लेकिन वह मध्य और उत्तरी गुजरात में अवैध शराब की बिक्री के खिलाफ मोर्चा खोलकर चर्चा में आए. उनके लोगों ने देशी शराब के अड्डों पर छापे मारने शुरू कर दिए, उनका तर्क था कि अवैध शराब से सबसे ज्यादा ठाकोर समुदाय के युवा प्रभावित हो रहे हैं. इस अभियान से 70 फीसदी से ज्यादा ठाकोर समुदाय उनसे जुड़ गया. शराबबंदी के जरिये वह मजबूत नेता के तौर पर सामने आए.

दो दशक से सत्ता से बाहर कांग्रेस को अल्पेश ठाकोर से बहुत उम्मीद हैं. हालांकि यह वक्त ही बताएगा कि वह कांग्रेस को सत्ता में वापसी दिलाने में कामयाब रहते हैं या नहीं. गुजरात में करीब 50 फीसदी मतदाता ओबीसी हैं. इसमें 20-22 फीसदी वोटर तो ठाकोर हैं. अल्पेश का दावा है कि वह कांग्रेस को कम से कम 125 सीटों पर जीत दिलवा सकते हैं. ये सारे कारण हैं जिनकी वज़ह से भाजपा की स्थिति गुजरात में बहुत अच्छी नहीं है और 1995 के बाद पहली बार यह पार्टी गुजरात में घिरी हुई है. ऊपर से शिव सेना भी उसकी मुसीबतें बढ़ा रही है. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धुआँधार प्रचार और उनकी आक्रामक शैली ही अब भाजपा का सहारा है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह यहाँ कई मामलों से घिर गए हैं. हालांकि पहले बड़बोला बयान उन्होंने ही दिया था कि भाजपा गुजरात में डेढ़ सौ सीटें लेकर आएगी. किन्तु अपने पुत्र जय शाह की भाजपा राज में बढ़ी सम्पत्ति से उन पर अंगुलियाँ उठीं तो अब सोहराबुद्दीन एनकाउन्टर मामले में सीबीआई के जज लोया की मृत्यु को स्वाभाविक नहीं माना जा रहा. इस मामले में भी शक की सुई उनकी और बढ़ रही है.

सोमवार को कच्छ भुज इलाके के अति प्राचीन आशापुरा मन्दिर में दर्शन करने के बाद उन्होंने अपने प्रचार की शुरुआत की. उन्होंने गुजरात पहुँचते ही गुजराती अस्मिता का कार्ड खेला. इसमें कोई शक नहीं कि नरेंद्र मोदी के केंद्र की राजनीति में जाने से गुजरात में बीजेपी को नुकसान हुआ है. 2014 के बाद से राज्य में भ्रष्टाचार के आरोप, कमजोर प्रशासन, जाति आधारित विरोध-प्रदर्शन जैसे मुश्किल मुद्दों से भाजपा को रू-ब-रू होना पड़ रहा है. पार्टी राज्य में अबतक के सबसे मुश्किल स्थिति से गुजर रही है. राज्य में कांग्रेस के पक्ष में सबकुछ है, लोग जीएसटी, नोटबंदी के खिलाफ हैं. पाटीदारों, ओबीसी और दलित आंदोलन भी राज्य सरकार के खिलाफ है. इसके अलावा अमित शाह और पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के बीच  ‘शीतयुद्ध’ के चलते राज्य को विजय रुपाणी जैसा कमजोर मुख्यमंत्री मिला. लेकिन इसके बावजूद मोदी का चेहरा भाजपा के लिए उम्मीद बना हुआ है. अब देखना यह है कि कच्छ के इस रण में भाजपा अपनी सत्ता बनाए रखती है या कांग्रेस नया अध्याय शुरू करेगी. नतीजा कुछ भी आए लेकिन यह तो पक्का है कि जो गुजरात में जीतेगा वही दो वर्ष बाद आनेवाले लोकसभा चुनाव में अपनी स्थिति बेहतर पाएगा. कुछ भी हो गुजरात यघ तो बता ही देगा कि बस अब हारने वाले के लिए हरिनाम जपना ही शेष बचा है.

 


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