CJP के संसद मार्च के बाद पुलिस की नेमप्लेट पर क्यों उठे सवाल? जानिए ड्यूटी के दौरान क्या कहते हैं नियम?
दिल्ली के जंतर-मंतर से संसद तक निकाले गए CJP के विरोध मार्च के बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि लाठीचार्ज और भीड़ को हटाने की कार्रवाई में कई पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट वाली वर्दी और सादे कपड़ों में मौजूद थे। इसके बाद पुलिस प्रोटोकॉल और जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो गई है।
इस पूरे मामले पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी. लोकुर ने भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल कई वीडियो में कुछ पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट और सिविल ड्रेस में प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग करते दिखाई दे रहे हैं। उनका कहना है कि यदि ऐसा हुआ है तो यह तय नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता और इसकी जांच होनी चाहिए।
दरअसल, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35(1)(a) के अनुसार ड्यूटी के दौरान वर्दीधारी पुलिसकर्मियों के लिए अपनी वर्दी पर नाम और पद की स्पष्ट नेमप्लेट लगाना अनिवार्य है। इसका उद्देश्य कार्रवाई के दौरान पारदर्शिता बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर संबंधित अधिकारी की पहचान सुनिश्चित करना है।
कानूनी प्रावधानों के मुताबिक यदि कोई पुलिसकर्मी ड्यूटी के दौरान बिना नेमप्लेट कार्रवाई करता है, तो नागरिक उसका नाम और पद पूछ सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, संबंधित थाने, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) या सक्षम न्यायालय में शिकायत भी दर्ज कराई जा सकती है।
हालांकि कुछ विशेष परिस्थितियों में जैसे खुफिया अभियान, अपराधियों की गिरफ्तारी या संवेदनशील सुरक्षा ऑपरेशन में पुलिसकर्मियों को सादे कपड़ों में तैनात किया जा सकता है। लेकिन ऐसे मामलों में भी उनकी कार्रवाई कानून और विभागीय दिशा-निर्देशों के दायरे में ही होती है।
CJP के संसद मार्च के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर आरोप और सवाल दोनों सामने हैं। ऐसे में यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ पुलिस की जवाबदेही और पहचान सुनिश्चित करने वाले नियमों का पालन कितना जरूरी है।
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