वैसे धर्म और राजनीति का संबंध मानव सभ्यता के जितना ही पुराना है। इतिहास के लगभग हर दौर में हर कालखंड में सत्ता और धर्म ने एक-दूसरे को प्रभावित किया है। कभी धर्म ने सत्ता को वैधता दी, तो कभी राजनीति ने धर्म का उपयोग जनता को संगठित करने और शासन को स्थिर रखने के लिए किया। आज के लोकतांत्रिक समाज में भी धर्म की राजनीति एक अत्यंत संवेदनशील और प्रभावशाली विषय है। यह केवल भारत तक ही सीमित नहीं, बल्कि दुनिया के लगभग सभी देशों में सत्ता, पहचान और सामाजिक नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण माध्यम रही है।
प्राचीन समय में राजा स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि बताते थे। मिस्र के फ़राओ हों, यूरोप के सम्राट हों या भारत के कई शासक सभों ने धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से अपनी सत्ता को मजबूत करार दिया। प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने लिखा था, “राजनीतिक सत्ता तब सबसे स्थिर होती है जब उसे धार्मिक वैधता प्राप्त हो।” वेबर का यह कथन बताता है कि धर्म केवल आस्था का विषय नहीं रहा, बल्कि शासन का भी एक साधन बना। भारत में भी “राजा धर्म का रक्षक है” जैसी अवधारणाएं लंबे समय तक समाज में अपनी पैंठ बनाए हुए दिखाई दी हैं।
मध्यकालीन यूरोप में चर्च और राज्य का गठजोड़ या मिलीभगत कहें इसका बड़ा उदाहरण है। चर्च केवल धार्मिक संस्था नहीं था, बल्कि राजनीतिक निर्णयों को भी प्रभावित करता था। पोप की अनुमति के बिना कई राजाओं की सत्ता अधूरी मानी जाती थी। इतिहासकार विल ड्यूरेंट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Story of Civilization में लिखा कि “धर्म ने लोगों को नैतिक अनुशासन दिया और राजनीति ने धर्म को संस्थागत शक्ति।” इसी तरह इस्लामी साम्राज्यों में भी खलीफा धार्मिक और राजनीतिक दोनों अधिकारों का केंद्र होता था।
भारत में धर्म की राजनीति को आधुनिक रूप ब्रिटिश शासन के दौरान मिला। अंग्रेजों ने “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाई। 1871 की जनगणना में लोगों को धार्मिक आधार पर वर्गीकृत किया गया, जिससे हिंदू और मुस्लिम पहचान पहले से अधिक राजनीतिक बनकर सामने आई। इतिहासकार बिपिन चंद्र ने अपनी पुस्तक India’s Struggle for Independence में लिखा है कि अंग्रेजों ने सांप्रदायिक विभाजन को जानबूझकर बढ़ावा दिया था ताकि भारतीय समाज एकजुट न हो सके। 1909 के मार्ले-मिंटो सुधारों के तहत मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन व्यवस्था लागू की गई, जिसने धर्म आधारित राजनीति को संस्थागत रूप में ढाल दिया।
बीसवीं सदी के दरम्यान धार्मिक पहचान राजनीतिक आंदोलनों का आधार बनने लगी। मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के हितों की राजनीति शुरू की, वहीं हिंदू महासभा जैसे संगठनों ने हिंदू पहचान को राजनीतिक अमलीजामा पहनाया। महात्मा गांधी धर्म को नैतिकता और सामाजिक सुधार का माध्यम मानते थे, लेकिन वे धर्म आधारित विभाजनकारी राजनीति के विरोधी थे। गांधी ने कहा था, “धर्म व्यक्ति का निजी विषय है, उसे राजनीति का हथियार नहीं बनना चाहिए।” इसके बावजूद, स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम वर्षों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ता गया और 1947 का विभाजन दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक और राजनीतिक विभाजनों में बदल गया। लाखों लोग विस्थापित हुए और हिंसा में अनगिनत लोगों का नरसंहार हुआ।
स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं ने इस अनुभव से सीख लेते हुए धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा अपनाई। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि “राज्य का कोई धर्म नहीं होगा और नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे।” भारतीय संविधान ने सभी धर्मों को समान सम्मान देने का सिद्धांत अपनाया। हालांकि, व्यवहार में धर्म और राजनीति का संबंध कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। चुनावी राजनीति में धार्मिक पहचान अक्सर वोट बैंक में बदलती रही।
1960 और 1970 के दशक तक भारतीय राजनीति मुख्य रूप से विकास और समाजवाद के मुद्दों पर केंद्रित रही, लेकिन 1980 के बाद धर्म की राजनीति ने नया मोड़ लिया। शाहबानो केस, राम जन्मभूमि आंदोलन और बाबरी मस्जिद विवाद ने धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक केंद्र में ला दिया। राजनीतिक वैज्ञानिक पॉल ब्रास ने अपनी पुस्तक The Production of Hindu-Muslim Violence in Contemporary India में लिखा कि सांप्रदायिक राजनीति केवल धार्मिक मतभेदों से नहीं, बल्कि राजनीतिक हितों और संगठित प्रचार से पैदा होती है।
1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस भारतीय राजनीति का बड़ा मोड़ था। इसके बाद धार्मिक ध्रुवीकरण खुलकर सामने आया। चुनावी भाषणों, रैलियों और मीडिया अभियानों में धार्मिक पहचान को लगातार प्रमुखता मिलने लगी। समाजशास्त्री आशीष नंदी ने कहा था कि “धर्म तब खतरनाक हो जाता है जब वह सत्ता की भाषा बोलने लगता है।” उनका तर्क था कि राजनीति धर्म की मूल मानवीय और नैतिक भावना को कठोर पहचान में बदल देती है।
धर्म की राजनीति केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में ईसाई कट्टरपंथी समूह चुनावों को प्रभावित करते रहे हैं। पश्चिम एशिया में कई देशों की राजनीति धार्मिक विचारधाराओं पर आधारित है। पाकिस्तान का निर्माण ही धार्मिक राष्ट्रवाद के आधार पर हुआ। इज़राइल में यहूदी पहचान राजनीति का केंद्रीय तत्व है। फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर ने कहा था, “जो लोग आपको बेतुकी बातों पर विश्वास करा सकते हैं, वे आपको अत्याचार करने के लिए भी प्रेरित कर सकते हैं।” यह कथन बताता है कि धार्मिक भावनाओं का राजनीतिक उपयोग कितना प्रभावशाली हो सकता है।
धर्म की राजनीति के समर्थक कहते हैं कि धर्म समाज को नैतिक दिशा देता है और लोगों को सांस्कृतिक पहचान से जोड़ता भी है। उनके अनुसार राजनीति यदि समाज की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है, तो धार्मिक भावनाओं को पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता है। लेकिन आलोचकों का मानना है कि जब धर्म सत्ता का उपकरण बन जाता है, तब सामाजिक विभाजन, हिंसा और असहिष्णुता बढ़ने लगती है। इतिहास गवाह है कि धार्मिक संघर्षों ने दुनिया में अनेक युद्धों और दंगों को जन्म दिया है।
मीडिया और सोशल मीडिया ने आज धर्म की राजनीति को और अधिक पेचीदा बना दिया है। पहले धार्मिक संदेश सीमित मंचों तक रहते थे, लेकिन अब डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भावनाएं तेजी से फैलती हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की कई शोध रिपोर्टों में यह बताया गया है कि सोशल मीडिया एल्गोरिद्म अक्सर भावनात्मक और विभाजनकारी सामग्री को अधिक बढ़ावा देते हैं। इससे धार्मिक ध्रुवीकरण और तेज हो सकता है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के बीच संतुलन कैसे बनाए। संविधान सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है, लेकिन साथ ही राज्य को निष्पक्ष रहने की जिम्मेदारी भी सौंपता है। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक Discovery of India में भी यही लिखा है कि “भारत की आत्मा उसकी विविधता में है।” यही विविधता भारतीय लोकतंत्र की ताकत भी है और परीक्षा भी।
बहरहाल, कहा यह भी जा सकता है की धर्म की राजनीति की शुरुआत सत्ता और सामाजिक नियंत्रण की आवश्यकता से हुई, लेकिन समय के साथ यह पहचान, संस्कृति और चुनावी रणनीति का हिस्सा बन गई। इतिहास यह बताता है कि धर्म और राजनीति का मेल समाज को एकजुट भी कर सकता है और विभाजित भी। इसलिए किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या धर्म लोगों की नैतिक चेतना को मजबूत करेगा या केवल राजनीतिक लाभ का साधन बनकर रह जाएगा।
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