youth in Madhya Pradesh

youth in Madhya Pradesh

मध्यप्रदेश के लगभग 2 करोड़ युवा….. किसकी जिम्मेदारी….!

Share Politics Wala News

मध्यप्रदेश के लगभग 2 करोड़ युवा….. किसकी जिम्मेदारी….!

मध्यप्रदेश में किसानों के लिए योजनाएं हैं, महिलाओं के लिए योजनाएं हैं, लाड़ली बहना जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन प्रदेश के युवाओं का क्या?

यह सवाल आज सबसे बड़ा सवाल बन चुका है। सरकारें हर वर्ग के लिए घोषणाएं करती दिखाई देती हैं, लेकिन जब बात रोजगार और युवाओं के भविष्य की आती है तो पूरा मुद्दा ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

प्रदेश में लगभग दो करोड़ युवा हैं, लेकिन राजनीति में उनकी चर्चा बहुत कम दिखाई देती है। रोजगार, भर्ती और भविष्य जैसे सवाल अब केवल भाषणों तक सीमित रह गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मध्यप्रदेश के आधिकारिक रोजगार पोर्टल पर लगभग 25.68 लाख युवा पंजीकृत हैं। यानी इतने युवा आज भी रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। यह केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों की चिंता, संघर्ष और टूटती उम्मीदों की कहानी है।

अगर वर्गवार आंकड़ों को देखें तो स्थिति और भी गंभीर दिखाई देती है। अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी में लगभग 10.46 लाख युवा बेरोजगार के रूप में पंजीकृत हैं। सामान्य वर्ग में करीब 6.34 लाख युवा नौकरी की तलाश में हैं। अनुसूचित जाति वर्ग में लगभग 4.69 लाख और अनुसूचित जनजाति वर्ग में लगभग 4.18 लाख युवा रोजगार की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर इतने बड़े वर्ग की आवाज राजनीति में क्यों सुनाई नहीं देती?

प्रदेश की राजनीति में किसान आंदोलन चर्चा में आ जाता है, महिलाओं की योजनाएं चुनावी मुद्दा बन जाती हैं, लेकिन युवा केवल चुनावी वादों तक सीमित रह जाते हैं। न सरकार युवाओं की बात गंभीरता से लेती दिखाई देती है और न ही विपक्ष इस मुद्दे को मजबूती से उठाता है। बेरोजगार युवाओं को “आकांक्षी युवा” कह देने भर से क्या उनकी समस्याएं खत्म नहीं हो जाती हैं? मुख्यमंत्री मोहन यादव को कौन बताए की केवल शब्द बदल देने से रोजगार पैदा नहीं होता।

मध्यप्रदेश में आज भी लगभग 3 से 4 लाख सरकारी पद खाली बताए जाते हैं। शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, पुलिस, राजस्व, पंचायत और कई अन्य विभाग कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। स्कूलों में शिक्षक कम हैं, अस्पतालों में डॉक्टर और नर्सों की कमी है, पुलिस विभाग में पद खाली हैं, लेकिन भर्ती की गति बेहद धीमी है। इससे साफ दिखाई देता है कि समस्या केवल बेरोजगारी की नहीं, बल्कि सरकारी इच्छाशक्ति की भी है। और असल में यही है भाजपा की चाल चरित्र और चेहरा की राजनीति…..

भारतीय जनता पार्टी ने 2023 के विधानसभा चुनावों में अपने घोषणापत्र में पांच वर्षों में 2.5 लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा किया था। युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार के सपने दिखाए गए थे। लेकिन वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 2023 के विधानसभा चुनावों के बाद अब तक केवल लगभग 29 हजार सरकारी पदों भरे गए। यह संख्या उन बड़े चुनावी वादों के मुकाबले बेहद कम है, जिनके आधार पर सरकार बनाई गई।

युवाओं में सबसे बड़ी नाराजगी भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर भी है। कई परीक्षाएं वर्षों तक अटकी रहती हैं। कभी परीक्षा रद्द होती है, कभी परिणाम में देरी होती है और कभी कोर्ट मामलों के कारण भर्ती प्रक्रिया लटक जाती है। हजारों युवा वर्षों तक तैयारी करते रहते हैं, लेकिन उन्हें न नौकरी मिलती है और न ही स्पष्ट जवाब। यही कारण है कि युवाओं में निराशा लगातार बढ़ रही है। इसका उदाहरण आप हालिया भर्तियों जिनमें एक MPPSC राज्य सेवा परीक्षा 2025 भी शामिल है को देख सकते हैं।

प्रदेश में प्रमोशन का मुद्दा भी लंबे समय से अटका हुआ है। यदि विभागों में समय पर प्रमोशन हों तो नीचे के हजारों पद खाली होंगे और नई भर्तियों का रास्ता खुलेगा। लेकिन वर्षों से कई विभागों में प्रमोशन प्रक्रिया अटकी हुई है। इस पर सरकार खुलकर चर्चा नहीं करती। क्योंकि जैसे ही प्रमोशन होंगे, खाली पदों पर भर्ती का दबाव बढ़ेगा। यही वजह है कि इस मुद्दे को लगातार टाला जाता रहा है

एक और गंभीर समस्या युवाओं का पलायन है। अगस्त–सितंबर 2025 के हालात बताते हैं कि मध्यप्रदेश से बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर जा रहे हैं। प्रदेश में उद्योगों और निजी रोजगार के अवसर सीमित हैं। यही कारण है कि शिक्षित युवा भी दिल्ली, मुंबई, गुजरात, पुणे और बेंगलुरु जैसे शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

बताया जाता है कि मध्यप्रदेश के लगभग 4 लाख मजदूर दूसरे राज्यों में काम कर रहे हैं, जिनमें करीब 2 लाख मजदूर केवल दिल्ली में हैं। यह आंकड़ा केवल मजदूरों का नहीं, बल्कि उस मजबूरी का प्रतीक है जिसमें युवा अपना घर, परिवार और राज्य छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। गांवों और छोटे शहरों में रोजगार के अवसर न होने के कारण युवाओं का भविष्य लगातार असुरक्षित होता जा रहा है।

सबसे दुखद बात यह है कि युवा मुद्दे अब राजनीतिक प्राथमिकताओं में दिखाई नहीं देते। चुनाव के समय रोजगार का मुद्दा उठाया जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही चर्चा योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित रह जाती है। विपक्ष की जिम्मेदारी होती है कि वह बेरोजगार युवाओं की आवाज बने, लेकिन विपक्ष भी इस मुद्दे को उतनी गंभीरता से नहीं उठा पा रहा जितनी जरूरत है।

आज जरूरत केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि ठोस नीति की है। प्रदेश में बड़े उद्योग लाने होंगे, सरकारी खाली पदों पर तेजी से भर्ती करनी होगी, स्किल डेवलपमेंट को रोजगार से जोड़ना होगा और युवाओं को स्थायी रोजगार देने की दिशा में काम करना होगा। वरना आने वाले समय में बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं रहेगी, बल्कि सामाजिक और मानसिक संकट का रूप ले सकती है।

मध्यप्रदेश का युवा आज सिर्फ नौकरी नहीं मांग रहा, वह सम्मान, अवसर और भविष्य मांग रहा है। सवाल यही है कि क्या सरकारें युवाओं की इस आवाज को सुनेंगी या फिर आने वाले चुनावों तक यह मुद्दा केवल आंकड़ों और भाषणों में ही दबा रहेगा।

यह भी पढ़ें- राजनीति में धर्म का आना, महज एक इत्तेफाक नहीं!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *