जेन-अल्फा

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अब 2014 के बाद वाले ‘जेन-अल्फा’ सड़कों पर

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जेन-अल्फा के बच्चे अब स्कूल, पानी, खाना, सड़क और सुरक्षा जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर आवाज उठा रहे हैं। क्या बदल रहा है नई पीढ़ी का विरोध?

जंतर-मंतर पर हुए युवा आंदोलन ने जिस तरह डिजिटल मीडिया, मीम्स और शांत तरीकों का सहारा लेकर अपनी बात रखी थी, उसने देश में प्रदर्शन का पूरा तरीका ही बदल दिया।

NEET-UG जैसी परीक्षाओं में पेपर लीक और धांधली के खिलाफ उठा वह गुस्सा सिर्फ एक परीक्षा का नहीं था, बल्कि सालों की महंगी कोचिंग, मानसिक तनाव और युवाओं के आर्थिक दबाव का नतीजा था।

लेकिन अब उस आंदोलन की आंच एक कदम आगे बढ़ गई है। जेन-ज़ी के बाद अब जेन-अल्फा यानी स्कूली बच्चे सड़कों पर उतरने लगे हैं और वे किसी बड़े राजनीतिक बदलाव के बजाय अपनी रोज़मर्रा की बुनियादी समस्याओं को लेकर प्रशासन से जवाब मांग रहे हैं।

जेन-अल्फा के इस उभार के पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि इस नई पीढ़ी का सब्र अब जवाब दे चुका है।

ये बच्चे बड़े-बड़े वादों और तरक्की के दावों के बीच बड़े हुए हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि उन्हें आज भी स्कूल जाने के लिए कीचड़ भरे रास्तों से गुज़रना पड़ता है। बैठने के लिए फर्नीचर नहीं है, जिसके नीचे बैठ पाएं इस तरह की सुरक्षित छत नहीं है। कई जगहों पर स्कूलों में पीने का साफ पानी तक नहीं मिलता और मिड-डे मील की स्थति इतनी खराब है कि खाना निगलना मुश्किल हो जाता है।

बचपन से ही बुनियादी सुविधाओं के इस अभाव को सहते-सहते जब बच्चों की सहनशक्ति खत्म हो गई, तो उन्होंने बड़े छात्रों के आंदोलनों से प्रेरणा ली और अपनी आवाज़ खुद उठाने का फैसला किया। अब ये बच्चे चुपचाप सहने के बजाय कलेक्ट्रेट और बड़े प्रशासनिक अधिकारियों के दफ्तरों का रुख कर रहे हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों में यह गुस्सा साफ नज़र आने लगा है। मध्य प्रदेश में सराफा कन्या हायर सेकेंडरी स्कूल की सैकड़ों छात्राओं ने अपने स्कूल के मर्ज के विरोध में कलेक्टर दफ्तर के बाहर धरना दे दिया, क्योंकि नए स्कूल की दूरी बहुत ज़्यादा थी और रास्ते में सुरक्षा का डर था।

विदिशा में छात्राएं ट्रांसपोर्ट किराया कम कराने के लिए सड़कों पर उतर आईं। वहीं दूसरी ओर, जयप्रकाश नारायण सर्वोदय विद्यालय के छात्रों ने अपने हॉस्टल के खाने में कीड़े निकलने पर सड़क जाम कर दी।

झारखंड में तो JPSC और JSSC परीक्षाओं की गड़बड़ियों के खिलाफ छात्रों का विरोध प्रदर्शन हफ्तों से जारी है, और सरकार की अनदेखी से परेशान होकर अब छात्र आक्रामक रास्ते भी अपनाने लगे हैं।

इस पूरे चक्र में सबसे खास बात यह है कि विरोध का दायरा अब बदल गया है। जहां जेन-ज़ी का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर के परीक्षा तंत्र और नीतिगत मुद्दों पर केंद्रित था, वहीं जेन-अल्फा का आंदोलन सीधे उनके जीवन से जुड़ी ज़मीनी समस्याओं पर टिका है।

स्कूल, खाना, रास्ता और पानी जैसी बुनियादी मांगें इतनी बिखरी हुई हैं कि प्रशासन के लिए इन्हें एक जगह दबाना आसान नहीं है। एक शहर में मामला शांत होता है, तो दूसरे जिले में छात्र अपनी मांगों को लेकर खड़े हो जाते हैं।

इस बदलाव ने राजनीति और सत्ता में बैठे लोगों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। स्कूली बच्चों की इस सक्रियता ने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है, जिससे अब वे अपनी रणनीतियों को नए सिरे से गढ़ने में लग गए हैं।

हालांकि, इस पूरे दौर को लेकर आलोचनाएं भी सामने आई हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पिछले आंदोलनों के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा मर्यादा से बाहर थी और शायद नई पीढ़ी को इससे दूर रहने की ज़रूरत है

लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा सच यही है कि जेन-ज़ी ने जिस विरोध की राह दिखाई थी, जेन-अल्फा ने उसे अपनाकर अपने आसपास की स्थानीय समस्याओं से जोड़ दिया है। अब शासन और प्रशासन को सिर्फ वोट देने वाले वयस्कों की ही नहीं, बल्कि इन स्कूली बच्चों की जायज़ शिकायतों और सवालों की भी सीधी जवाबदेही लेनी पड़ रही है।

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