The ₹370 Biryani: The real story behind the applause

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₹370 की बिरयानी: असली कहानी तालियाँ क्यों थीं

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₹370 की बिरयानी: असली कहानी तालियाँ क्यों थीं

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₹370 की बिरयानी के विवाद ने वह सब कुछ पैदा किया है जिसे आधुनिक भारत औद्योगिक पैमाने पर बनाने में माहिर है: आक्रोश (आउटरेज), हैशटैग, माफी, नौकरी का जाना, इन्फ्लुएंसर्स की टिप्पणियाँ और सोशल मीडिया का अंतहीन शोर. फिर भी, इस सारे चिल्लाने-चिल्लाने के नीचे एक कहीं अधिक असहज करने वाला सवाल छिपा है.  आखिरकार इतने सारे लोगों को वह बात पहली बार में इतनी मजेदार क्यों लगी?

यह विवाद कॉमेडियन प्रणीत मोरे के शो के दौरान ‘क्राउडवर्क’ (दर्शकों से बातचीत) के एक हिस्से से शुरू हुआ. एक युवक ने अपनी एक ‘डेट’ का जिक्र किया. उसने एक चिकन बिरयानी के पैसे चुकाए थे. बिल करीब ₹370 आया था. बाद में, जब महिला ने उसे घर छोड़ने के लिए कहा, तो उसने टिप्पणी की कि ₹370 खर्च करने के बाद, वह स्वाभाविक रूप से उस रकम की वसूली करेगा. इसका निहितार्थ बिल्कुल साफ था. दर्शक हँसे. कॉमेडियन भी हँसा और आगे बढ़ गया. इस क्लिप को ऑनलाइन अपलोड कर दिया गया. जल्द ही, यह सोशल मीडिया पर फैल गई.

इसके बाद तीखी प्रतिक्रिया हुई. उस दर्शक ने, जिसकी पहचान बाद में हिमांशु जांगड़ा के रूप में हुई, माफी मांगी. उसके नियोक्ता (कंपनी) ने उसकी नौकरी खत्म कर दी. प्रणीत मोरे ने उस टिप्पणी पर आपत्ति न जताने के लिए माफी मांगी और स्वीकार किया कि उन्हें स्थिति को अलग तरह से संभालना चाहिए था. चालाकी दिखाते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए अपनी सोशल मीडिया की दुकान बंद कर दी. उस दिन एक घटिया संस्कृति ने कॉमेडियन, उस दर्शक और वहां मौजूद अन्य दर्शकों को एक साथ बांध दिया था. इन्फ्लुएंसर्स ने इस क्लिप की निंदा की. आखिरकार, वह मूल वीडियो (इंटरनेट से) गायब हो गया.

लेकिन यह घटना खत्म होने का नाम नहीं ले रही है क्योंकि यह कभी बिरयानी के बारे में थी ही नहीं.

यह रकम अपने आप में बेहद मामूली है. कोई भी किसी आलीशान छुट्टी, महंगे तोहफे या किसी बड़े वित्तीय त्याग की बात नहीं कर रहा है. बिरयानी की एक प्लेट राष्ट्रीय बहस का आधार बन गई क्योंकि मुद्दा कभी पैसा था ही नहीं. मुद्दा तो मानसिकता थी.

वह युवक यह मानता हुआ लग रहा था कि किसी महिला पर पैसा खर्च करने से बदले में कुछ पाने का अधिकार (एंटाइटलमेंट) मिल जाता है.  यह सोच न तो नई है और न ही दुर्लभ. यह उस संस्कृति में गहराई से समाई हुई है जो महिलाओं को स्वतंत्र व्यक्तियों के रूप में नहीं, बल्कि पुरुषों द्वारा नियंत्रित लेन-देन के भागीदारों के रूप में देखती आ रही है.  इसके बाद वह ‘डेट’ दो इंसानों के बीच की बातचीत नहीं रह जाती. वह एक निवेश (इन्वेस्टमेंट) बन जाती है. महिला एक संपत्ति (एसेट) बन जाती है. सवाल अब यह नहीं रह जाता कि क्या दोनों के बीच आपसी आकर्षण या सहमति थी. सवाल यह बन जाता है कि क्या किए गए खर्च ने पर्याप्त रिटर्न (मुनाफा) दिया.

यह रोमांस नहीं है. यह प्रेमालाप के भेष में किया जा रहा अकाउंटिंग (बहीखाता) है.

मनोवैज्ञानिक ऐसी सोच को ‘लेन-देन संबंधी संज्ञान’ (ट्रांजैक्शनल कॉग्निशन) कहते हैं. कोई व्यक्ति एक काम करता है और मान लेता है कि उसे इनाम मिलना ही चाहिए. इस मामले में, एक वित्तीय खर्च को एक काल्पनिक अनुबंध (कॉन्टैक्ट) में बदल दिया गया. महिला का अपनी प्राथमिकताओं, सीमाओं और प्राथमिकताओं वाले एक व्यक्ति के रूप में अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है. वह एक ऐसी वस्तु बन जाती है जिसके इर्द-गिर्द हिसाब-किताब लगाया जाता है. मानवीय रिश्ते रसीदों और रीइंबर्समेंट (रकम की वापसी) तक सिमट कर रह जाते हैं.

हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे परेशान करने वाला पहलू वह टिप्पणी खुद नहीं थी.

वह थी तालियाँ.

एक अपरिपक्व युवक द्वारा मूर्खतापूर्ण बयान देना कोई सामाजिक घटना नहीं है. लेकिन उस पर हंसते हुए लोगों से भरा एक कमरा जरूर एक सामाजिक घटना है. दर्शकों की प्रतिक्रिया भी उतनी ही जांच के दायरे में आनी चाहिए जितनी कि वह टिप्पणी जिसने इसे जन्म दिया.  लोग आखिर किस बात पर हंस रहे थे? वहाँ कोई चतुराई भरी बात नहीं थी. कोई परिष्कृत व्यंग्य नहीं था. मानव व्यवहार को लेकर कोई अनोखी अंतर्दृष्टि नहीं थी. वह हास्य पूरी तरह से एक जाने-पहचाने पूर्वाग्रह पर निर्भर था: कि किसी महिला पर पैसा खर्च करने से उस पर हक बन जाता है.

लोग इसलिए हंसे क्योंकि वे इस विचार से परिचित थे.

यह बात हमें उस एक व्यक्ति के शब्दों से कहीं अधिक चिंतित करनी चाहिए.

समकालीन संस्कृति में हंसी को नैतिक रूप से तटस्थ (न्यूट्रल) मानने की प्रवृत्ति है. ऐसा नहीं है. हंसी अक्सर यह उजागर करती है कि एक समाज किसे स्वीकार करता है, किसे सहन करता है या चुपचाप किस पर विश्वास करता है. अगर कोई कमरा किसी महिला-विरोधी टिप्पणी पर हंसी से गूंज उठता है, तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बोलने वाले ने ऐसा क्यों कहा. सवाल यह है कि इतने सारे सुनने वालों को यह अपनी जैसी बात क्यों लगी.

कॉमेडियन की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. स्टैंड-अप कलाकार अक्सर क्राउडवर्क का बचाव यह कहकर करते हैं कि यह सहज (स्पॉन्टेनियस) होता है. एक हद तक यह सच भी है. दर्शक कुछ भी अनपेक्षित कह सकते हैं. लेकिन सहजता उसी पल खत्म हो गई जब उस क्लिप को अपलोड किया गया. उस स्तर पर, वह टिप्पणी अब कोई दुर्घटना नहीं रह गई थी. वह एक सचेत संपादकीय विकल्प (एडिटोरियल चॉइस) बन गई थी. किसी ने फुटेज देखी. किसी ने उस हिस्से को चुना.  किसी ने तय किया कि यह शो का प्रतिनिधित्व करता है. किसी ने माना कि यह हजारों, शायद लाखों लोगों के साथ साझा करने लायक मनोरंजक है.

वह फैसला अपनी खुद की कहानी बयां करता है.

यह घटना भारतीय कॉमेडी की स्थिति पर असहज करने वाले सवाल खड़े करती है. आज कॉमेडी के नाम पर जो कुछ भी परोसा जा रहा है, उसमें से अधिकांश सोशल मीडिया कंटेंट प्रोडक्शन से ज्यादा कुछ नहीं है. हास्य, व्यंग्य, अश्लीलता, फूहड़पन और स्वांग में अंतर होता है. कॉमेडियनों की पिछली पीढ़ियाँ इन अंतरों को समझती थीं. समकालीन कलाकार अक्सर इन्हें मिलाकर एक ऐसा उत्पाद बना देते हैं जिसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ‘एंगेजमेंट’ (व्यूज और लाइक्स) बढ़ाना होता है.

व्यंग्य के लिए बुद्धि की आवश्यकता होती है. इसके लिए बारीकी से देखने की क्षमता चाहिए. इसके लिए समाज के भीतर के अंतर्विरोधों को उजागर करने की क्षमता की आवश्यकता होती है. यह हंसी के नीचे एक तरह की गंभीरता की मांग करता है. आज कॉमेडी सर्किट पर जिसका दबदबा बढ़ रहा है, वह कुछ और ही है. अश्लीलता को साहस समझ लिया जाता है. फूहड़पन को ईमानदारी मान लिया जाता है. सदमा (शॉक) देने को बुद्धिमानी मान लिया जाता है. चुटकुले का समझदारी भरा होना जरूरी नहीं है. उसका बस वायरल होना जरूरी है.

एल्गोरिदम आक्रोश को बढ़ावा देता है. कलाकार उसी के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं.

कभी-कभी आश्चर्य होता है कि विचारशील हास्य की परंपरा का क्या हुआ. राजू श्रीवास्तव और जसपाल भट्टी एक अलग दौर के थे. उनकी कॉमेडी सूक्ष्म निरीक्षण से निकलती थी. आज का इकोसिस्टम ऐसे कलाकारों से भरा पड़ा है जिनकी मुख्य प्रतिभा विवाद को क्लिक्स (व्यूज) में बदलना लगती है. वे इसे कॉमेडी कहते हैं. लेकिन अक्सर, यह केवल ‘कंटेंट’ होता है.

₹370 वाली यह क्लिप एक व्यापक सामाजिक वास्तविकता से भी अलग नहीं है. भारत में महिलाओं ने उल्लेखनीय प्रगति की है. वे उन पेशों में प्रवेश कर रही हैं जिन पर कभी पुरुषों का एकाधिकार था. वे व्यवसायों, संस्थानों और सरकारों का नेतृत्व कर रही हैं. वे स्वतंत्र रूप से कमा रही हैं और अपने जीवन के बारे में खुद फैसले ले रही हैं. फिर भी आगे बढ़ने वाले हर कदम पर उन लोगों की ओर से प्रतिक्रिया देखने को मिलती है जो इस बदलाव से खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं.

यह प्रतिक्रिया हर जगह दिखाई देती है. सोशल मीडिया ऐसे वीडियो से पटा पड़ा है जो महिलाओं का मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें एक वस्तु की तरह पेश करते हैं या उन्हें खलनायक के रूप में दिखाते हैं. वर्चस्व, अपमान और नियंत्रण का जश्न मनाने वाली अनगिनत रील्स हैं. इन्फ्लुएंसर्स महिलाओं के प्रति अपनी कुंठा को ‘पुरुषत्व’ का नाम देकर परोसते हैं. पूरे के पूरे डिजिटल समुदाय इस विचार के इर्द-गिर्द बने हैं कि महिलाएँ चालाक जीव हैं जिन्हें अनुशासित, नियंत्रित या पराजित किया जाना चाहिए.

इसके साथ ही उत्पीड़न, हमले और हिंसा की कहानियाँ लगातार सुर्खियों में बनी रहती हैं. कोई भी पेशा इससे अछूता नहीं लगता. डॉक्टर, शिक्षक, नौकरशाह, राजनेता और पुलिस अधिकारी—सभी इस बढ़ते हुए शर्मनाक सिलसिले का हिस्सा बनते जा रहे हैं. समाज प्रगति की भाषा बोलता है, लेकिन अपने साथ उन पुरानी रूढ़िवादी सोच का बोझ ढो रहा है जिसे वह छोड़ना नहीं चाहता.

यह अंतर्विरोध बिल्कुल साफ है.

एक तरफ महिलाओं से कहा जाता है कि वे सशक्त हैं. दूसरी तरफ, उन पर लगातार नजर रखी जाती है, उन्हें नियंत्रित किया जाता है और आंका जाता है. महिलाओं के जीवन को विनियमित (रेगुलेट) करने की इच्छा सामाजिक कल्पना में कितनी गहराई से समाई हुई है, इसे देखने के लिए किसी को केवल खाप जैसी सोच के बने रहने को देखने की जरूरत है. महिलाएँ क्या पहनती हैं, कहाँ जाती हैं, किससे मिलती हैं और कैसे रहती हैं—ये सब उन लोगों के लिए सार्वजनिक चिंता का विषय बने हुए हैं जो अपने जीवन में इस तरह के हस्तक्षेप को कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे.

₹370 की बिरयानी वाली टिप्पणी कहीं शून्य से पैदा नहीं हुई थी. यह इसी माहौल से पैदा हुई थी.

कुछ लोगों ने तर्क दिया है कि उस युवक ने माफी मांग ली है और इसलिए उसे माफ कर दिया जाना चाहिए. शायद. इंसान गलतियाँ करते हैं. लोग सीख सकते हैं. लोग बदल सकते हैं. इस ढोंग में कोई भलाई नहीं है कि एक मूर्खतापूर्ण टिप्पणी पूरे जीवन को परिभाषित करे.

फिर भी जवाबदेही के लिए ईमानदारी की आवश्यकता होती है.

समस्या गुरुग्राम के एक युवक की नहीं है. समस्या उस संस्कृति की है जिसने उसे पैदा किया, उसके साथ हंसी और कुछ देर के लिए उसका जश्न मनाया. समस्या उस इकोसिस्टम की है जो महिला-द्वेष (मिसोजिनी) को मनोरंजन के रूप में देखता है और फिर आलोचना होने पर हैरान होने का नाटक करता है. समस्या उस समाज की है जो अधिकार की भावना (एंटाइटलमेंट) को पुरुषत्व और वस्तुकरण (ऑब्जेक्टिफिकेशन) को हास्य समझने की भूल करता आ रहा है.

₹370 की बिरयानी की एक प्लेट को पूरी तरह से भुला दिया जाना चाहिए था. इसके बजाय, इसने खुद भोजन से कहीं अधिक कीमती चीज़ को उजागर कर दिया. इसने एक मानसिकता को बेनकाब कर दिया.

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सवाल का जवाब अभी भी नहीं मिला है.

यह हमारे बारे में क्या कहता है कि इतने सारे लोग इससे पहले कि वे यह समझ पाते कि उन्हें इस बात पर आहत होना चाहिए था, खुलकर हंस पड़े?

(लेखक वीवीपी शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं)  

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