मध्य प्रदेश में पोषण आहार संकट, 300 दिन की जगह मिला 170 दिन आहार
मध्य प्रदेश में बच्चों और महिलाओं के पोषण को लेकर चल रही सरकारी व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। NFHS की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रदेश के सभी 7 पोषण आहार प्लांट बंद पड़े हैं और नई व्यवस्था शुरू करने के लिए अब तक टेंडर भी नहीं हो पाया है।
इसका सीधा असर आंगनवाड़ी केंद्रों पर मिलने वाले पोषण आहार पर पड़ रहा है। हालात ऐसे हैं कि जिन बच्चों और महिलाओं को साल में करीब 300 दिन पोषण आहार मिलना चाहिए, उन्हें कई जगहों पर सिर्फ 170 दिन तक ही आहार मिल पाया।
रिपोर्ट के मुताबिक बालाघाट सहित मध्य प्रदेश के कई आदिवासी इलाकों में कुपोषण की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। बालाघाट के आदिवासी क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि यहां बच्चों में कुपोषण की स्थिति लगातार गंभीर बनी हुई है। लंबे समय तक बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिलने का असर उनके वजन और शारीरिक विकास पर दिखाई दे रहा है।
आंकड़ों में यह भी सामने आया है कि प्रदेश में लंबाई के मुकाबले हर चौथा बच्चा कम वजन का है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ऐसे बच्चों की संख्या में करीब 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वहीं कम वजन वाले बच्चों के मामले में भी स्थिति चिंता पैदा करने वाली बताई गई है।
इसका मतलब साफ है कि जिन बच्चों को शुरुआती उम्र में बेहतर पोषण की जरूरत होती है, वहीं सरकारी पोषण व्यवस्था की कमी का असर सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है।
बालाघाट के अलावा रीवा, सागर, देवास, शिवपुरी और होशंगाबाद सहित प्रदेश के कई जिलों में पोषण आहार की व्यवस्था को लेकर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के अनुसार कई जगहों पर पोषण आहार बनाने वाली यूनिट या प्लांट बंद हैं।
ऐसे में आंगनवाड़ी केंद्रों तक नियमित रूप से पोषण आहार पहुंचाना चुनौती बन गया है।
पोषण आहार की व्यवस्था में बदलाव के लिए सरकार की ओर से नई व्यवस्था लाने की बात कही गई थी, लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक नई व्यवस्था का टेंडर अब तक जारी नहीं हो पाया है।
पुरानी व्यवस्था के तहत चल रहे प्लांट भी बंद होने से सबसे बड़ा सवाल यही है कि बच्चों और गर्भवती महिलाओं को नियमित पोषण आहार आखिर कैसे मिलेगा।
रिपोर्ट में आंगनवाड़ी केंद्रों से जुड़े आंकड़ों का भी जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में बच्चे पोषण की कमी से जूझ रहे हैं। आदिवासी और दूरदराज के इलाकों में समस्या और ज्यादा गंभीर हो सकती है, क्योंकि इन क्षेत्रों में पहले से ही स्वास्थ्य और पोषण सेवाओं तक पहुंच आसान नहीं है।
पोषण आहार सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है। गर्भवती महिलाओं और किशोरियों के लिए भी यह व्यवस्था काफी अहम है।
अगर आंगनवाड़ी केंद्रों पर तय समय पर पोषण आहार नहीं पहुंचता है तो इसका असर बच्चों के साथ-साथ महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। खासकर उन परिवारों के लिए यह समस्या ज्यादा बड़ी है, जहां परिवार की आमदनी कम है और पौष्टिक भोजन नियमित रूप से उपलब्ध कराना मुश्किल है।
रिपोर्ट में प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना और दूसरी सरकारी योजनाओं से जुड़े आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। प्रदेश में बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों को इन योजनाओं के जरिए पोषण और स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाएं देने का लक्ष्य है। ऐसे में पोषण आहार की सप्लाई में देरी या कमी सरकारी योजनाओं के जमीन पर असर को लेकर सवाल खड़े करती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार की योजना बच्चों और महिलाओं को साल में करीब 300 दिन पोषण आहार देने की है, तो कई जगहों पर यह सुविधा सिर्फ 170 दिन तक क्यों पहुंची। अगर पोषण आहार के प्लांट बंद हैं और नई व्यवस्था के लिए टेंडर भी नहीं हुआ है, तो आने वाले दिनों में आंगनवाड़ी केंद्रों पर पोषण आहार की सप्लाई कैसे सामान्य होगी, यह देखने वाली बात होगी।
कुपोषण से लड़ने के लिए सिर्फ योजनाएं बनाना काफी नहीं है। इन योजनाओं का लाभ समय पर और सही व्यक्ति तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है। खासकर बच्चों के मामले में पोषण की कमी का असर उनके विकास पर लंबे समय तक रह सकता है।
इसलिए पोषण आहार की व्यवस्था में आई इस रुकावट को जल्द दूर करना जरूरी है, ताकि सरकारी योजना का लाभ कागजों से निकलकर जमीन पर बच्चों तक पहुंच सके।
