सुप्रीम कोर्ट का फैसला – माता-पिता बच्चों कर सकते हैं अपनी संपत्ति से बेदखल!
माता-पिता और बच्चों के बीच संपत्ति को लेकर होने वाले विवाद अब कोई नई बात नहीं हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा और सम्मान को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने साफ किया है कि अगर किसी वरिष्ठ नागरिक की देखभाल, सुरक्षा और गरिमा के लिए जरूरी हो, तो सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल बच्चों या रिश्तेदारों को उनकी संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दे सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति को जिंदगी के आखिरी पड़ाव तक सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह फैसला Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 के तहत सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि इस कानून का मकसद सिर्फ बुजुर्गों के भरण-पोषण की व्यवस्था करना नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा और सम्मान को भी सुनिश्चित करना है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वहां बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।
दरअसल, यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से जुड़ा है। लखनऊ निवासी रवि कांत गुप्ता ने अपने बेटे को मकान से बाहर निकालने के लिए जिला प्रशासन के सामने आवेदन दिया था। बताया गया कि यह मकान उनकी खुद की खरीदी हुई संपत्ति थी।
Senior Citizens Tribunal Can Order Eviction Of Children From Parents’ Property : Supreme Court Reiterates#SupremeCourt https://t.co/m21dViM0RY
— Live Law (@LiveLawIndia) August 19, 2026
मामले में यह भी सामने आया कि उनकी 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा था। इसके बाद एसडीएम ने 15 नवंबर 2022 को बेटे की बेदखली का आदेश दिया। जिला मजिस्ट्रेट ने भी 9 अगस्त 2023 को इस आदेश को बरकरार रखा और बेटे तथा बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया।
इसके बाद बेटे और बहू ने इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश में दखल देते हुए बेदखली का फैसला रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि 2007 का कानून बुजुर्ग माता-पिता को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का सीधा अधिकार नहीं देता। इसके बाद रवि कांत गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि बुजुर्गों की सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल के पास जरूरी कदम उठाने की शक्ति है।
कोर्ट ने Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act की धारा 7 और 8 का भी उल्लेख किया। अदालत के मुताबिक ट्रिब्यूनल को कानून के उद्देश्य को लागू करने के लिए जरूरी आदेश देने का अधिकार है।
हालांकि, इस फैसले को यह समझना सही नहीं होगा कि माता-पिता अब किसी भी परिस्थिति में अपने बच्चों को सीधे संपत्ति से बाहर कर सकते हैं।
बेदखली का फैसला मामले की परिस्थितियों के आधार पर होगा। ट्रिब्यूनल को यह देखना होगा कि क्या वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा, भरण-पोषण या सम्मान के लिए बच्चे या रिश्तेदार को संपत्ति से हटाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सबसे अहम संदेश यही है कि बुजुर्ग माता-पिता को अपने ही घर में अपमान या असुरक्षा के बीच रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अगर हालात ऐसे बनते हैं कि वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और गरिमा बचाने के लिए कानूनी हस्तक्षेप जरूरी है, तो ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब देशभर में संपत्ति और बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल को लेकर कई विवाद सामने आते रहते हैं। कई बार उम्रदराज माता-पिता अपनी ही संपत्ति में बच्चों या रिश्तेदारों के व्यवहार से परेशान होते हैं और उन्हें कानूनी मदद लेनी पड़ती है। ऐसे मामलों में यह फैसला बुजुर्गों के अधिकारों और सम्मान को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के जरिए यह साफ संदेश दिया है कि संपत्ति से ज्यादा जरूरी किसी व्यक्ति की गरिमा है। उम्र बढ़ने के साथ किसी इंसान के सम्मान और सुरक्षित जीवन का अधिकार खत्म नहीं हो जाता। अगर किसी बुजुर्ग को अपने ही घर में सम्मान के साथ रहने में परेशानी हो रही है, तो कानून उसके संरक्षण का रास्ता उपलब्ध कराता है।
हालांकि, बच्चों के संपत्ति अधिकार को लेकर यह फैसला कोई सामान्य नियम नहीं बनाता। संपत्ति का स्वरूप, मालिकाना हक, परिवार की परिस्थितियां और बुजुर्गों की वास्तविक स्थिति जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर ही फैसला लिया जाएगा। इसलिए हर संपत्ति विवाद को इस फैसले के आधार पर एक जैसा नहीं माना जा सकता।
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