सिर्फ सकारात्मक ख़बरें छापने से जनता को हालात की गंभीरता, भयावहता कैसे समझ आएगी

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अखबार पाठकों को विचलित करते ही क्यों हैं? इस सवाल परअख़बार का जवाब..

सुनील कुमार ( संपादक, दैनिक छत्तीसगढ़ )

कई बार शब्दों और तस्वीरों से खिलवाड़ करने के पीछे नीयत कोई और रहती है लेकिन उसका असर उससे अलग भी हो सकता है। कई बार ऐसा भी होता है कि लिखने की नीयत जो होती है असर भी वही होता है। दो दिन पहले छत्तीसगढ़ अखबार के पहले पन्ने पर टाइम मैगजीन के कवर पेज को लेकर एक पिक्सटून बनाया गया था जिसे लेकर एक पाठिका ने एक कड़ी शिकायत भेजी है।

एक जिम्मेदार अखबार के नाते ऐसी आई शिकायत का हमें जवाब देना चाहिए। टाईम मैगजीन ने अपने ताजा अंक के कवर पेज पर भारत में आज कोरोना से हो रही मौतों की हालत पर कवर स्टोरी की है और उसकी तस्वीर यह बताती है कि एक श्मशान में किस तरह चारों तरफ लाशें जल रही हैं।

भारत के आज के समाचारों की हालत की इससे बहुत अधिक भयानक तस्वीरें भी इन दिनों लगातार छप रही हैं, लेकिन इस प्रतिष्ठित पत्रिका ने इस तस्वीर को क्यों छांटा, इसे तो उसके संपादक ही बता सकते हैं, हम होते तो इससे अधिक भयानक तस्वीर छांटते।

हमने अपने अखबार की एक खास शैली के, तस्वीरों वाले कार्टून, पिक्सटून, के लिए इस कवर पेज को क्यों चुना और उसके शब्दों के साथ खिलवाड़ करते हुए एक नई तस्वीर गढ़ी जो कहती हैं ‘सबका टाइम आएगा’। यह लाइन एक किसी लोकप्रिय गाने की भी है, और यह लाइन दार्शनिकों के लिखे हुए एक फलसफे की भी है कि सबका वक्त कभी न कभी आएगा ही।

 

हमने इस पत्रिका के नाम के ऊपर और नीचे एक-एक शब्द जोडक़र यह पिक्सटून बनाया कि ‘सबका टाइम आएगा’। हमारी इस पाठिका ट्विंकल खन्ना ने एक लंबे ईमेल में लिखा है कि इस कार्टून को देखकर, या अखबार की सुर्खी की जगह इसे देखकर वे मानसिक रूप से विचलित हुई हैं। उन्होंने लिखा है कि यह बहुत ही तकलीफ का वक्त चल रहा है और सब लोग इस दौर से गुजर रहे हैं ऐसे में यह हैडिंग क्यों सोची गई?

उन्होंने यह सवाल किया है कि अखबार की संपादकीय टीम ने इतनी विचलित करने वाली हैडिंग क्यों बनाई है जिसे पढक़र एक पाठक के रूप में उनके दिमाग में भी यही आ रहा है कि अपना टाइम आएगा। उनका कहना है कि वे इसके अलावा और कुछ भी नहीं सोच पा रही हैं।

उन्होंने अखबार के सम्मान में लिखा है कि यह एक प्रतिष्ठित अखबार है और इसे ऐसे वक्त में उम्मीद की कोई किरण दिखाते हुए कोई बेहतर बयान एक हैडिंग के रूप में लेना था, कम से कम ऐसा लेना था जिससे कि लोगों की मदद होती और वह अधिक निराशा में नहीं डूबते। उन्होंने यह उम्मीद भी की है कि बेचैन करने वाली ऐसी कोई दूसरी हैडिंग बाद में उन्हें देखने ना मिले।

आज के वक्त में जब लोग अखबारों को लिखकर भेजना तकरीबन बंद कर चुके हैं और अधिक से अधिक प्रतिक्रिया यह होती है कि अखबार की कतरन के साथ अपनी टिप्पणी लिखकर उसे व्हाट्सएप पर दोस्तों को भेज दिया जाए या कि कुछ ग्रुप में डाल दिया जाए, ऐसे में एक पाठिका ने अगर यह लिखकर भेजा है तो यह सचमुच हमारे सोचने और इस पर हमारी सोच को लिखने का मुद्दा तो है ही।

और ऐसा भी नहीं कि इस तस्वीर या इस कार्टून ने महज उन्हें ही विचलित किया हो, हो सकता है कि और भी बहुत से लोग इससे विचलित हुए हों, जिन्होंने विरोध दर्ज करने की जहमत नहीं उठाई हो। लेकिन हम ऐसे मौन लोगों के लिए भी अपनी सोच को सामने रखना चाहते हैं।

आज हिंदुस्तान में कोरोना महामारी के चलते हुए, कुछ तो कोरोना की हैवानियत की वजह से, और उससे भी बहुत अधिक भारत सरकार की लापरवाही की वजह से, कुछ हद तक भारत की गैरजिम्मेदार और लापरवाह जनता की वजह से, और कुछ हद तक राज्य सरकारों की लापरवाही और नाकामयाबी की वजह से, महामारी से यह हालत हुई है कि देश के लोगों की कोई हालत ही नहीं बची है।

कल ही अमेरिकी समाचार चैनल सीएनएन के एक समाचार बुलेटिन का दिल्ली पर बनाया गया एक हिस्सा देखने मिला जो दिल दहला देता है जिसे देखकर लगता है कि लोग वहां किस तरह जिंदा हैं, और लोग आज अपने सामने खड़ी हुई बेबसी को बाकी की जिंदगी किस तरह भूल पाएंगे?

कुछ मिनटों के इस समाचार बुलेटिन को देख पाना भी कमजोर कलेजे की बात नहीं है। ऐसे में जब देश में सब कुछ बेकाबू है, जब दिल्ली सहित देश के दर्जनभर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट अलग-अलग सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और अलग-अलग राज्य सरकारों को सरकार चलाना सिखा रहे हैं, हिंदुस्तान पूरी तरह से नाकामयाब साबित हो चुका है, और ऐसे में जब चारों तरफ लाशें ही लाशें दिख रही हैं, जब सडक़ों के किनारे सिख समाज की मेहरबानी से चल रहे ऑक्सीजन लंगरों में ही लोगों को ऑक्सीजन नसीब हो रही है, जब एक के बाद एक मुख्यमंत्री और राज्य गिड़गिड़ा रहे हैं कि उनके पास कोई ऑक्सीजन नहीं बची है, तो बहुत से दूसरे अखबारों की तस्वीरें, और हमारे अखबार का यह दिल दहलाने वाला कार्टून/पिक्सटून इस हिसाब से जायज है कि जिन लोगों ने इन मौतों को रूबरू नहीं देखा है, जिन लोगों ने सरकारी व्यवस्था को करीब से नहीं देखा है, उन्हें भी एक बार में यह समझ में आना चाहिए कि वक्त कितना खराब है।

आज भारत में कोरोना के संक्रमण का हाल इतना खराब है कि अब चिकित्सा विज्ञान ऐसी चर्चा करने लगा है कि क्या देश में सामुदायिक संक्रमण हो रहा है? और देश में इलाज की कमी, ऑक्सीजन और दवा की कमी, वैक्सीन और सरकार की कमी, इन सबके चलते हुए ऐसे संक्रमण में हर किसी की जिंदगी खतरे में है। हम खुद जब यह लिख रहे हैं तो हम अपने एक रिपोर्टर को कोरोना में खो चुके हैं, संपादकीय विभाग के कुछ लोग घरों से काम कर रहे हैं, और इस बात का कोई ठिकाना नहीं है कि किसका टाइम कब आ जाएगा, और ऐसे में अखबार की जिम्मेदारी लोगों को इस बात का एहसास कराना भी है कि हालात कितने खराब हैं।

आज अगर देश में ऐसा लग रहा है कि किसी का भी टाइम कभी भी आ जाएगा, और अगर हाल ऐसा ही चलता रहा तो सबका टाइम आएगा, तो हम इस बात के एहसास को पूरी तल्खी के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें अगर किसी अस्पताल या मरघट में खड़े होने की नौबत अभी तक नहीं आई है तो भी उन्हें यह एहसास रहना चाहिए कि उनके इर्द-गिर्द देश के बाकी लोग आज किस हाल में जी रहे हैं और किस हाल में मर रहे हैं।

और जब अखबार जिम्मेदारी के साथ इस बात का एहसास कराना चाहते हैं, कराने की कोशिश करते हैं, तो पाठकों को, देश के नागरिकों को झकझोरने की, झिंझोडऩे की उनकी कोशिश कई लोगों को सदमा भी पहुंचा सकती है, कई लोगों को विचलित भी कर सकती है।

लेकिन आज उन लोगों से जाकर, जिनके घर में मां-बाप आखिरी सांसें ले रहे हैं, और जो खुद ऑक्सीजन का सिलेंडर लेकर देश की राजधानी में 11-11 घंटे से कतार में लगे हैं, उनसे पूछें कि क्या उन्हें इस हालात में कोई शक है कि सबका टाइम आ ही रहा है, कब किसका टाइम आ जाएगा, क्या इसका कोई ठिकाना है, तो शायद उन्हें कोई शक नहीं होगा।

हिंदुस्तान में न सिर्फ कुछ पाठकों की ओर से, बल्कि सरकार समर्थक बहुत से लोगों की ओर से भी लगातार इस बात की वकालत की जा रही है कि खबरें अधिक से अधिक सकारात्मक दिखाई जाएं ताकि आज निराश और हताश हो चुके, डरे और सहमे लोगों के मन में दहशत और ना बैठे।

यह तर्क अपने आपमें सही है लेकिन सवाल यह है कि आज हालात की नजाकत को अगर लोग समझ नहीं पाएंगे, तो न वे सावधान हो सकेंगे और न उनका यह राजनीतिक शिक्षण हो सकेगा कि उनकी निर्वाचित सरकारें किस तरह से काम कर रही हैं।

एक अखबार के नाते हम इसे अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी मांगते हैं कि अपने पाठकों को लगातार हम देश के हालात से न सिर्फ वाकिफ कराते रहें बल्कि उन्हें यह तल्खी के साथ सोचने पर मजबूर भी करते रहें कि इन हालातों में उनकी क्या जिम्मेदारी बनती है।

आज जब देश में महामारी फैली हुई है और हिंदुस्तानियों का एक तबका जब चुनाव प्रचार में लगा है, जब वह कुंभ के मेले में दसियों लाख एक-एक दिन में गंगा स्नान कर रहा है, और वहां से प्रसाद और संक्रमण दोनों को लेकर देश के हर शहर-गांव तक लौट रहा है, तो ऐसे तबके को झकझोरने के लिए यह बतलाना भी जरूरी है कि सबका समय आने में कोई खास कसर बाकी नहीं है। इस देश की सरकारों की यह ताकत और क्षमता भी नहीं है कि वह संक्रमण बढऩे पर लोगों को बचा सकें।

हमने एक विदेशी पत्रिका के इस कवर पेज को अपनी बात को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया ताकि हमारे पाठक, हमारे आसपास के लोग, हमें पढऩे वाले लोग इस बात का एहसास कर सकें कि वक्त इतना खराब है कि कभी भी किसी का वक्त आ सकता है। और अपना टाइम आयेगा इसे लोगों को कोई असंभव बात नहीं मानना चाहिए।

आज अस्पतालों में जो हाल है और देशभर में जगह-जगह अलग-अलग किस्म के लॉकडाउन और अलग-अलग किस्म के प्रतिबंध लगाने के बाद भी कोरोना का संक्रमण जिस तरह बढ़ रहा है उसे देखते हुए यह समझने की जरूरत है कि कभी भी किसी का वक्त आ सकता है। और ऐसा वक्त हमारे अखबार की तरह का मासूम वक्त नहीं रहेगा, वह सीएनएन की दिल्ली की रिपोर्ट जैसा बेरहम वक्त रहेगा जिसे देखकर हिंदुस्तान का दिल दहल जाना चाहिए कि यह हम लोकतंत्र की किस नौबत में आ गए हैं।

हमारा यह मानना रहता है कि लोगों को अहसास कराने के लिए जितनी बेरहमी जरूरी है, उतनी बेरहमी न अनैतिक होती है, और न ही वह अखबारनवीसी के किसी सिद्धांत के खिलाफ ही होती है। वह बेरहमी तकलीफ दे हो सकती है, लेकिन तकलीफ का एहसास कराना हमारा मकसद भी है।

हम हर दिन शब्दों से, तस्वीरों से, कार्टून से, इस बात का एहसास कराते हैं कि यह दौर बहुत तकलीफ का है। ऐसे में हमारे इस कार्टून से लोग अगर विचलित हुए हैं, वे इसे देखकर और अधिक निराश हुए हैं, तो यह भी हमारा एक मकसद है कि लोगों को आज की पूरे देश की इस निराशा का एहसास होना चाहिए, आज के इस खतरे का अहसास होना चाहिए, और जब कभी लोकतंत्र में किसी बदलाव का मौका आएगा, उस वक्त तक यह एहसास खत्म नहीं होना चाहिए।

लोकतंत्र का विकास, लोगों की लोकतांत्रिक समझ का विकास, हल्की-फुल्की बातों से नहीं होता है, वह तकलीफदेह और गंभीर बातों से ही होता है, और हम उसी कोशिश में लगे हुए हैं।

 

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