दतिया की हार पर बीजेपी में मंथन! क्या सीएम मोहन यादव की राह में पार्टी के भीतर ही बिछे हैं कांटे?
संसद में जब 13 दिन की सरकार गिरी थी, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में खड़े होकर कहा था—क्या हार में, क्या जीत में,
किंचित नहीं भयभीत मैं,
कर्तव्य पथ पर जो भी मिला,
ये भी सही, वो भी सही…
यानी जीत मिले तो भी ठीक और हार मिले तो भी ठीक।
अटल जी ने आगे कहा था—
वरदान नहीं मांगूंगा,
हो कुछ भी पर हार नहीं मानूंगा…
दतिया उपचुनाव के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव मीडिया के सामने आए और उनका अंदाज़ भी कुछ ऐसा ही दिखाई दिया— “क्या हार में, क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं…”
सीएम मोहन ने दतिया में खूब पसीना बहाया, लेकिन कई ऐसे कारण रहे जिनकी वजह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। आज के वीडियो में हम उन्हीं कारणों की बात करेंगे।
लेकिन मुख्यमंत्री की स्थिति देखकर यही कहा जा सकता है—
पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफ़र,
किस से कहें कि पाँव के काँटे निकाल दे…
दतिया उपचुनाव के ऐलान के बाद से ही सीएम मोहन लगातार सक्रिय रहे। नामांकन से लेकर रैलियों, सभाओं और रोड शो तक, हर जगह उनकी मौजूदगी दिखाई दी। यही वजह रही कि बीजेपी को दतिया सीट पर पिछली बार की तुलना में लगभग 1700 ज़्यादा वोट मिले।
वैसे, मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 29 में से 29 सीटें जीतकर इतिहास रचा था। हाल के राज्यसभा चुनाव में भी बीजेपी ने तीनों सीटों पर जीत हासिल की थी।
अगर उपचुनाव की बात करें तो कांग्रेस के गढ़ अमरवाड़ा पर बीजेपी ने कब्ज़ा किया और बुधनी सीट भी अपने नाम की।
अब सवाल उठता है कि दतिया और विजयपुर में बीजेपी क्यों हारी?
सवाल यह है कि विजयपुर में रामनिवास रावत को बीजेपी में शामिल करने का फैसला किसने लिया था? फिर आनन-फानन में उन्हें मंत्री बनाया गया और माहौल अनुकूल न होने के बावजूद उपचुनाव में टिकट दे दिया गया। नतीजा सबके सामने है।
दतिया में भी नरोत्तम मिश्रा प्रचार शुरू कर चुके थे। मुख्यमंत्री मोहन यादव की सहमति से टिकट के लिए दिल्ली उनका नाम अकेले भेजा गया था। फिर आशुतोष तिवारी को टिकट किसने दिया?
क्या जनता नहीं जानती कि बीजेपी में एक नहीं, कई वरिष्ठ मंत्री ऐसे हैं जो काम कम करते हैं और काम में अड़ंगा ज़्यादा डालते हैं?
क्या कोई पूछेगा कि उन कथित बड़े नेताओं ने दतिया में कितना प्रचार किया, कितनी रैलियां कीं और पार्टी के लिए कितना काम किया?
ये कथित वरिष्ठ मंत्री मुख्यमंत्री मोहन यादव की राह में कांटे बोने का ही काम करते हैं।
ऐसे में, जिस शेर से हमने शुरुआत की थी, वह बिल्कुल सटीक बैठता है—
पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफ़र,
किस से कहें कि पाँव के काँटे निकाल दे…
सीएम मोहन की स्थिति भी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है— पीछे बँधे हैं हाथ और शर्त है सफ़र।
लेकिन अब पार्टी से, बीजेपी से कौन कहे कि इन कथित कांटों को निकाल तो दे?
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