सत्ता पाकर भी संन्यास चुनना कोई सोनिया गांधी से सीखे


रामबहादुर राय (वरिष्ठ पत्रकार)
सोनिया गांधी ने राजनीति से संन्यास लेने का फैसला कर ही लिया है. सोनिया ने 1997-98 में राजनीति में और कांग्रेस की जिम्मेदारी संभालने में रुचि ले ली. 1998 में ही चुनाव होनेवाले थे.

अब 1991 से लेकर 1997 तक के बीच का छह साल का समय सोनिया गांधी के लिए सोच-विचार और दुविधा का रहा होगा और कुछ हद तक राजीव के जाने के शोक का भी प्रभाव रहा होगा. तब सोनिया गांधी कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं थीं और भारत में सोनिया गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने की मन:स्थिति भी नहीं थी. सोनिया गांधी इस बात को जानती थीं. इसके बावजूद 1998 में उन्होंने कांग्रेस की कमान इसलिए संभाली, क्योंकि वे राहुल को अपनी जगह सौंपकर ही जाना चाहती थीं. सोनिया गांधी की अपनी सीमाएं हैं.

कांग्रेस ने कल भी और आज भी यह मान लिया है कि नेहरू वंश नेतृत्व में रहेगा, तभी उसका उद्धार हो सकता है और तभी वह सत्ता में आ सकती है. यही वजह है कि कांग्रेस ने तब सोनिया गांधी को स्वीकार किया और अब राहुल गांधी को भी स्वीकार कर लिया है.

लेकिन, मेरा ख्याल है कि सोनिया ने यह सब आपद धर्म के रूप में स्वीकार किया. यानी राजनीतिक जीवन, राजनीतिक आकांक्षा या महत्वाकांक्षा उनमें न थी, न ही उनको कोई स्वीकार ही करता. लेकिन, चूंकि इंदिरा गांधी की हत्या हुई और फिर राजीव गांधी भी मार दिये गये, तो फिर नेहरू परिवार की बहू सोनिया ने (जिसकी रुचि पारिवारिक जीवन में थी न कि राजनीतिक जीवन में) आपद धर्म के तहत कांग्रेस को नेतृत्व देना स्वीकार कर लिया.

राजीव को राजनीति में आने से रोका!

सोनिया का व्यक्तित्व राजनीतिक नहीं था, लेकिन उसी घर में संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी राजनीतिक थीं. संजय गांधी के मरने के बाद जब पहली बार यह बात आयी थी कि राजीव गांधी अपनी मां के कहने से राजनीति में जा रहे हैं, तो सोनिया गांधी ने जितना वह रोक सकती थीं, उतना रोकने की कोशिश की कि राजीव राजनीति में न जायें.

संजय गांधी की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी ने मेनका को राजनीतिक रूप से बाहर किया और सोनिया को अपना लिया. इंदिरा ने यह भांप लिया था कि सोनिया घर-परिवार संभाल सकती हैं और सोनिया ने संभाला भी. इसी तरह से आपद धर्म के रूप में कांग्रेस की कमान संभालने को लेकर सोनिया ने यह समझा होगा कि उसे भी वह परिवार की तरह ही संभाल लेंगी.

वे भारत की सबसे पुरानी पार्टी के राजनीतिक दायित्व का निर्वाह नहीं कर रही थीं, बल्कि कांग्रेस में नेहरू वंश की पारिवारिक भूमिका समाप्त न हो जाये, इसलिए उसको आगे बढ़ाने के लिए अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह कर रही थीं.

कांग्रेस की डूबती नैया लगाई पार

साल 1996 में जब पीवी नरसिम्ह राव की सरकार परास्त हो गयी, तब सोनिया गांधी के सामने यह प्रश्न आया होगा कि नेहरू वंश को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका क्या हो. यहां मैं मानता हूं कि सोनिया गांधी का यह साहस भरा कदम था कि उन्होंने कांग्रेस की कमान अपने हाथ में ली.

जब 1998 के चुनाव में सोनिया ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में चुनाव प्रचार शुरू किया, तब उनका मुकाबला अटल बिहारी वाजपेयी से था. वाजपेयी का मुकाबला सोनिया गांधी से नहीं था. वाजपेयी के रूप में 40-50 साल के राजनीतिक जीवन का विराट पुरुष सोनिया के सामने था, लेकिन मीडिया ने जितना वाजपेयी को महत्व दिया, उससे कम महत्व सोनिया को नहीं दिया, क्योंकि सबको यही लग रहा था कि सोनिया गांधी के आने से कांग्रेस केंद्र की सत्ता में आ जायेगी.

लेकिन, ऐसा नहीं हुआ. जब 1999 में लोकसभा का चुनाव हो रहा था, तब यह स्पष्ट देखा गया कि राहुल और प्रियंका गांधी में से अगर प्रियंका सामने आती हैं, तो कांग्रेस के पक्ष में हवा बह सकती है. मुझे याद है, रायबरेली की एक चुनावी सभा में (वहां सोनिया गांधी के खिलाफ अरुण नेहरू चुनाव लड़ रहे थे) हमने राहुल और प्रियंका को देखा. सबने देखा कि राहुल कुछ नहीं बोल पाये, लेकिन प्रियंका ने जादू जैसा भाषण दिया- ‘मेरे पिता की पीठ में जिसने छूरा भोंका है, क्या आप लोग उसको जितायेंगे?’

इस बात का इतना असर हुआ कि अटल बिहारी वाजपेयी की आंधी के बावजूद रायबरेली से अरुण नेहरू हार गये. फिर भी सोनिया ने अपने उत्तराधिकार के रूप में प्रियंका के बजाय राहुल को चुना. अब राहुल उसी उम्र में पहुंच गये हैं, जिस उम्र में राजीव गांधी चले गये थे.
सोनिया ने अब समझ लिया था कि उनकी भूमिका अब पूरी हो गयी है, इसलिए उन्होंने राहुल के हाथ में कमान सौंप दी है. सोनिया के इस निर्णय की मैं सराहना करता हूं, क्योंकि भारतीय राजनीति में आखिरी सांस तक सत्ता में बने रहना चाहते हैं. सोनिया गांधी ने यह बहुत अच्छा फैसला किया है कि वे अब राजनीतिक जीवन से संन्यास ले रही हैं.
पदत्याग का विवेकपूर्ण फैसला
सोनिया गांधी ने यह समझ लिया था कि उन्होंने अपने आपद धर्म का निर्वाह अच्छे से किया है. आपद धर्म से तात्पर्य यह है कि यह सोनिया का स्वधर्म नहीं है. दरअसल, मनुष्य अपने स्वधर्म से संचालित होता है, लेकिन कभी उसको ऐसा काम भी करना पड़ता है, जो उसके स्वभाव के विपरीत हो. साल 1998 से लेकर अब तक सोनिया गांधी ने अपने स्वभाव से विपरीत एक जिम्मेदारी समझते हुए उसे निभाया है. इसे ही मैं आपद धर्म कहता हूं. और आपद धर्म का पूरा निर्वाह करने के बाद जब उसे छोड़ने का मौका आया है, तब भी सोनिया ने कोई माैका नहीं गंवाया और उन्होंने अपने एक विवेकपूर्ण फैसले के तहत राहुल के हाथ में कांग्रेस की कमान देकर खुद राजनीतिक जीवन से संन्यास ले लिया है. सोनिया का यह फैसला भारतीय राजनीति में एक उदाहरण की तरह भी देखा जायेगा.

(साभार-प्रभात खबर )


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