स्वरा भास्कर जौहर बयान

स्वरा भास्कर जौहर बयान

स्वरा भास्कर के ‘जौहर’ पर बयान की सच्चाई!

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स्वरा भास्कर के ‘जौहर’ पर बयान की सच्चाई!

हाल ही में अभिनेत्री स्वरा भास्कर फिल्म ‘पद्मावत’ में दिखाए गए जौहर के दृश्य पर की गई टिप्पणी को लेकर विवादों में हैं। उन्होंने इस महिमामंडन पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी भी परिस्थिति में चाहे बलात्कार हुआ हो या पति या रक्षक की मृत्यु महिलाओं को जीने का अधिकार है, और आत्मदाह जैसी प्रथा को आज के दौर में महिमामंडित करने की ज़रूरत नहीं।

स्वरा ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर’ के एक इवेंट में यह बात कही। आगे उन्होंने कहा की “भगवान न करे कि मैं कभी रेप की शिकार होती, लेकिन अगर होती तो उनकी फिल्म मुझे क्या बताती? कि मैं कायर हूं और अपनी इज्जत बचाने के लिए मुझे खुदकुशी कर लेनी चाहिए”?

इस पर करणी सेना और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई, जिसके बाद स्वरा ने सफाई दी कि उनकी बात को गलत तरीके से पेश किया गया और उन्होंने किसी भी जौहर करने वाली महिला को “कायर” नहीं कहा।

विवाद आज का नहीं है!

दरअसल, स्वरा ने साल 2018 में भंसाली को एक ओपन लेटर लिखा था, जिसमें उन्होंने उनकी फिल्म के जौहर वाले सीन पर गुस्सा निकाला था और खुद की तुलना महिला के प्राइवेट पार्ट से की थी। इस पर उनकी खूब आलोचना हुई थी।

अब स्वरा भास्कर ने अपने उस बयान और ओपन लेटर को जस्टिफाई किया है, पर इस चक्कर में जो कहा, उसके कारण वह निशाने पर आ गई हैं। स्वरा भास्कर ने ‘पद्मावत’ के जौहर वाले सीन को कायरतापूर्ण बताया और भंसाली पर सवाल उठाया कि क्या वो इस फिल्म के जरिए रेप की शिकार महिलाओं को बताना चाहते थे कि वो जीने लायक नहीं हैं?

इस पूरे विवाद के केंद्र में सवाल यह है की क्या जौहर को सिर्फ एक “प्रथा” के रूप में देखना ठीक है, या यह मध्यकालीन युद्धों की उस भयावह सच्चाई को जिसमें हारे हुए पक्ष की महिलाओं का क्या हश्र होता था? यह सवाल जायज़ है, और इसका जवाब बिना इतिहास में गए नहीं मिल सकता।

जौहर चुनाव नहीं, आख़िरी विकल्प

मध्यकालीन भारत में, विशेषकर राजपूत रियासतों में, जब किसी किले की हार निश्चित दिखने लगती थी, तो पुरुष केसरिया बांधकर अंतिम युद्ध के लिए निकल जाते थे और महिलाएं जौहर कर लेती थीं। इतिहासकार इसे किसी सांस्कृतिक “परंपरा” से ज़्यादा एक सामूहिक, सामाजिक दबाव में लिया गया अंतिम निर्णय मानते हैं। जो इस डर से जन्मा था कि पराजय के बाद महिलाओं के साथ क्या होगा।

यह डर निराधार नहीं था। समकालीन और परवर्ती इतिहास-लेखन बताता है कि विजयी सेनाओं द्वारा पराजित पक्ष की स्त्रियों को अक्सर बंदी बनाकर गुलाम बनाया जाता, दास बाज़ारों में बेचा जाता और यौन हिंसा का शिकार बनाया जाता था। यानी जौहर के पीछे केवल बलात्कार की आशंका नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी गुलामी में गुज़रने का भय भी काम करता था।

बंदी बनाना और गुलाम बाज़ार

मध्यकालीन युद्धों के बाद स्त्रियों और बच्चों को दासता में धकेलना कोई अपवाद नहीं, बल्कि उस दौर के युद्ध की एक सामान्य प्रथा थी। चाहे आक्रमणकारी कोई भी हो। भारत पर हुए कई आक्रमणों के दौरान के इतिहास-लेखन में इसका जिक्र साफ तौर पर मिलता है।

इसका एक प्रमुख उदाहरण मुहम्मद बिन क़ासिम का सिंध अभियान (लगभग 712 ईस्वी) है। सिंध के शासक राजा दाहिर की हार के बाद की घटनाओं का वर्णन मुख्य रूप से ‘चचनामा’ नामक फ़ारसी ग्रंथ में मिलता है, जो घटना के कई सदियों बाद लिखा गया एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।

इस ग्रंथ के अनुसार राजा दाहिर के परिवार की स्त्रियों जिनमें उनकी बेटियां और राजपरिवार से जुड़ी अन्य महिलाएं शामिल थीं को बंदी बनाया गया और आगे दमिश्क, इराक और अरब के इलाकों में भेजा गया, जहां बंदियों को दास के रूप में बेचे जाने का उल्लेख मिलता है।

यहां एक ज़रूरी ऐतिहासिक सावधानी 

‘चचनामा’ जैसे मध्यकालीन ग्रंथों में दी गई सटीक संख्याएं (जैसे बंदियों या मृतकों की गिनती) अक्सर अतिशयोक्तिपूर्ण मानी जाती हैं, क्योंकि ऐसे विवरण अक्सर विजेता की महानता दिखाने या धार्मिक-राजनीतिक उद्देश्यों से लिखे जाते थे।

अनेक इतिहासकार इन आंकड़ों को प्रतीक के रूप में या फिर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया मानते हैं, भले ही घटना का मूल तथ्य यानी युद्धबंदी बनाना, दास बनाना और बेचना व्यापक रूप से स्वीकृत हो। इसलिए किसी एक स्रोत की सटीक संख्या को अंतिम सत्य मानने के बजाय, इसे उस दौर की व्यापक प्रवृत्ति के प्रमाण के तौर पर देखना ज़्यादा उचित है।

यह पैटर्न सिर्फ सिंध तक सीमित नहीं रहा। बाद कि शताब्दियों में हुए कई आक्रमणों के इतिहास-लेखन में भी युद्धबंदी बनाई गई महिलाओं और बच्चों को दास बाज़ारों में भेजे जाने के उल्लेख मिलते हैं। यह दासता व्यवस्था उस दौर के व्यापक भू-राजनीतिक और आर्थिक ढांचे का हिस्सा थी, जिसमें युद्धबंदी एक “माल” की तरह व्यवहृत होते थे।

आधी बात या पूरी बात?

स्वरा भास्कर के मूल तर्क में एक वाजिब चिंता है! किसी भी आत्मदाह या हिंसा के महिमामंडन पर सवाल उठाना जायज़ है, और पीड़िताओं के जीने के अधिकार पर बात करना संवेदनशील मुद्दा है। लेकिन जब यह बहस सिर्फ “बलात्कार के डर” तक सीमित कर दी जाती है,

तो यह मध्यकालीन युद्धों की उस पूरी वास्तविकता को छोटा कर देती है जिसमें हार के बाद स्त्रियों के सामने केवल एक दिन की हिंसा नहीं, बल्कि जीवन भर की गुलामी, परिवार से अलगाव, धर्मांतरण का दबाव और बार-बार बेचे जाने की आशंका होती थी। यही व्यापक भय जौहर जैसे निर्णयों के पीछे काम करता था। यह किसी “प्रथा” के प्रति समर्पण नहीं, बल्कि एक भयावह भविष्य से बचने की सामूहिक कोशिश थी।

साथ ही, यह भी उतना ही ज़रूरी है कि इस इतिहास को किसी एक समुदाय या पक्ष को निशाना बनाने के औज़ार में न बदला जाए। मध्यकाल के अधिकांश साम्राज्य चाहे उनकी धार्मिक पहचान कुछ भी रही हो युद्ध में यही आचरण करते थे; युद्धबंदी बनाना और दास बनाना तत्कालीन विश्व-व्यवस्था का हिस्सा था, न कि किसी एक सभ्यता विशेष की विशेषता। इतिहास को समझते वक़्त यह संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है न पीड़ा को नकारना, न उसे राजनीतिक हथियार बनाना।

भारत में इतिहास पर बहस अक्सर या तो पूरी तरह महिमामंडन में बदल जाती है या पूरी तरह नकार में। दोनों ही रुख अधूरे और खतरनाक हैं।

जौहर को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम यह भी समझें कि पराजय के बाद बंदी बनाई गई महिलाओं के साथ वास्तव में क्या होता था। यह सिर्फ एक क्षणिक हिंसा नहीं, बल्कि दासता और बिक्री की एक पूरी व्यवस्था थी। साथ ही यह भी याद रखना ज़रूरी है कि मध्यकालीन ग्रंथों के आंकड़ों को बिना जांचे-परखे स्वीकार करना भी अच्छा इतिहास-लेखन नहीं है।

सही राह यही है कि हम बिना किसी को महिमामंडित या राक्षसीकृत किए, तथ्यों की सीमाओं को स्वीकार करते हुए, पूरी तस्वीर पर ईमानदारी से बात करें ताकि इतिहास सिर्फ आज की राजनीतिक बहसों का हथियार न बने, बल्कि उससे सीखने का ज़रिया बने

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