सुप्रीम कोर्ट की धार्मिक मामलों पर टिप्पणी से संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय को लेकर नई बहस।
-सुनील कुमार
सबरीमाला में महिलाओं के दाखिले से शुरू हुई बात अब सुप्रीम कोर्ट जजों की एक असाधारण हिचक तक पहुंच गई है जिसके चलते वे धार्मिक कट्टरता के सामने दंडवत होते दिख रहे हैं। नौ जजों की संविधानपीठ सबरीमाला सहित कुछ और धार्मिक मामलों की सुनवाई कर रही है, और मुद्दा अभी इसमें उलझा हुआ है कि आस्था, धार्मिक परंपरा, रीति-रिवाज जैसे मामलों में अदालती दखल होनी चाहिए या नहीं, और अगर होनी चाहिए तो किस हद तक होनी चाहिए।
हम इस सिलसिले में मोटी-मोटी बातें ही कर रहे हैं जो आम लोगों को समझ में आएं, और सुप्रीम कोर्ट के एक-एक शब्द को ज्यों का त्यों यहां रखकर मुख्य मुद्दे से भटकना नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि पाठकों को बुनियादी बात समझ में आए कि देश के इस एक जलते-सुलगते मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट जजों का क्या रूख है। कल तो जजों ने जो कहा है, वह हक्का-बक्का कर देने वाला है।
एक से अधिक जजों के बयान अब हमारी इस आशंका को पुख्ता करते हैं कि देश की सबसे बड़ी अदालत धार्मिक और पारंपरिक मामलों में दखल देने से कतरा रही है, फिर चाहे ये मामले देश के नागरिकों के बुनियादी-संवैधानिक अधिकारों को कुचलने वाले ही क्यों न हों।
कल कुछ जजों ने जो कहा वह हैरान और परेशान दोनों करता है। अदालत की टिप्पणी थी कि धर्म एक व्यक्तिगत विश्वास का विषय है, और क्या अदालत के पास यह अधिकार है कि वह यह तय करे कि कौन सी धार्मिक प्रथा अनिवार्य है, और कौन सी नहीं? एक जज ने कहा हमारा संविधान की व्याख्या करना है, धर्मग्रंथों की नहीं।
अदालत ने यह चिंता जताई कि अगर वे एक मंदिर या समुदाय की प्रथा में दखल देंगे, तो देश के हजारों अन्य समुदायों की अलग-अलग प्रथाओं को भी चुनौती दी जाएगी, जिससे एक अंतहीन कानूनी सिलसिला शुरू हो जाएगा। जब वकीलों ने यह तर्क दिया कि कुछ प्रथाएं भेदभावपूर्ण है, तो जजों ने एक बहुत ही तंगनजरिए का सवाल उठाया, और कहा कि क्या एक धर्मनिरपेक्ष अदालत उस आस्था को रद्द कर सकती है, जो सदियों पुरानी है, और जिसका आधार तर्क नहीं, बल्कि आस्था है? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत सहित कुछ जजों ने इस बात पर जोर दिया कि जनहित याचिकाओं के जरिए लोग अब धार्मिक सुधार की जिम्मेदारी अदालत पर डाल रहे हैं, जबकि यह काम समाज और विधायिका (संसद) का होना चाहिए।
ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की यह मौजूदा सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ भी जवाबी हमले से डर रही है। सबरीमाला मामले में अदालत के पिछले फैसले के बाद जिस तरह का सामाजिक और राजनीतिक विरोध हुआ था, उससे ऐसा लगता है कि अदालत अपने आपको बचाने के लिए एक ढाल की तरह अपने तर्क रख रही है, जो कि अच्छे-खासे खोखले तर्क हैं। अदालत अब बार-बार इंसाफ के फैसले की जिम्मेदारी को संसद और समाज की तरफ धकेल रही है, और कह रही है कि वह निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है।
समाज जो कि एक पूरी तरह अमूर्त चीज है, और संसद जो कि आज बहुमत की अपनी ताकत से पूरी तरह संकीर्णतावादी है, इन दोनों के भरोसे इंसाफ को छोडऩे का मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को उसी तरह सडक़ पर छोडक़र चले जा रहा है, जिस तरह अभी कुछ दिन पहले मध्यप्रदेश में एक करोड़पति कारोबारी दम्पत्ति ने गोद ली हुई बच्ची को सडक़ पर छोड़ दिया था, और भाग गई थी।
हमारी बहुत ही सीमित, लेकिन प्राकृतिक न्याय की बुनियादी समझ यह कहती है कि जिस दिन देश में संविधान लागू हुआ, उस दिन यह तय हो गया कि अगर किसी धर्म, समुदाय, या व्यक्ति की धार्मिक या सामाजिक आस्था किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों की राह का रोड़ा बनेगी, तो देश का लोकतंत्र उस रोड़े को हटाकर लोगों के मौलिक अधिकारों की राह साफ करेगा।
आज ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी इस जिम्मेदारी से साफ-साफ कतरा रहा है, उसे भी यह बात साफ दिख रही है कि समाज का आज का ढांचा बहुत साफ-साफ बहुसंख्यकवाद की हिंसक ताकत के झंडे-डंडे उठाए हुए हैं, खुद बहुसंख्यक तबके के भीतर भी किसी किस्म की विविधता की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। अपने ही तबके की महिलाओं के खिलाफ, दलितों के खिलाफ आस्था का बड़ा ही कट्टर और हिंसक रूप जगह-जगह सामने आ रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का कल का यह ताजा रूख हमें सदमा पहुंचाता है क्योंकि हम तो मानकर चलते हैं कि संविधान लागू होने के बाद धार्मिक या किसी भी किस्म की आस्था संविधान के नीचे ही रहेगी, उसके ऊपर नहीं जाएगी।
संविधान की हमारी बड़ी सीमित समझ बताती है कि अनुच्छेद 25 में धर्म की जो स्वतंत्रता है, वह मौलिक अधिकारों (भाग-3) के अधीन है। इसका मतलब यह है कि अगर कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति की समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14), या गरिमापूर्ण जीवन (अनुच्छेद-21), का उल्लंघन करती है, तो संविधान के अनुसार उस प्रथा को हारना ही होगा। सुप्रीम कोर्ट जब धार्मिक आस्था की दुहाई देकर लोगों के बुनियादी अधिकार बचाने से बचता है, तो वह कहे-अनकहे 26 जनवरी 1950 के पहले की सामाजिक व्यवस्था को मान्यता दे देता है, जिसके अन्यायपूर्ण हिस्से को खत्म करने का संकल्प संविधान ने लिया था। सुप्रीम कोर्ट यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी भूल रहा है।
पिछले कुछ बरसों में जजों के बयानों ने संवैधानिक जिम्मेदारी की जगह सामाजिक स्वीकार्यता शब्द अधिक सुनाई देने लगा है। जबकि संविधान एक बहुसंख्यकवाद विरोधी दस्तावेज बनाया गया था, जो कि संख्या के आधार पर इंसाफ करने की पुरातन व्यवस्था को तोड़ता था।
इसका काम उन लोगों के अधिकारों की रक्षा करना था जो परंपरा या धर्म के नाम पर हाशिए पर धकेल दिए गए थे। आज जब संसद देश में बहुत सारी व्यवस्थाओं को संविधान के पहले के दिनों पर पहुंचाने पर उतारू है, और उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट अपने-आपको बचाते हुए अपने सुरक्षित खोल में दुबक रहा है, तो इस लोकतंत्र में इस मुद्दे पर इंसाफ की संभावना खत्म सरीखी हो जाती है। भारत ही नहीं दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब संवैधानिक अदालतों ने आस्था या भीड़ के दबाव के सामने घुटने टेके हैं, सभ्यता पीछे की ओर गई है। आज अगर भारत का सुप्रीम कोर्ट यह कह रहा है कि उसकी लगभग असीमित संवैधानिक ताकत के रहते हुए भी वह धर्म की बेइंसाफी के भीतर सुधार नहीं कर सकता, तो फिर बीती एक सदी से अधिक की धार्मिक और सामाजिक सुधार की सुधारकों की लड़ाई पर वह पानी फेर रहा है।
हमारा बिल्कुल साफ मानना है कि अदालत का काम धर्म की संविधान-विरोधी बातों को बचाना नहीं है, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को बचाना है। हमने कानून के कुछ जानकारों से इस मुद्दे पर समझने की कोशिश की तो उनका कहना है कि अब यह बात साफ है कि अदालत अब उन कड़े शब्दों का इस्तेमाल करना नहीं चाहती जो बहुसंख्यक समाज या सत्ता को चूभते हों।
जस्टिस बी.बी.नागरत्ना ने साफ-साफ कहा, सुधार के नाम पर धर्म को खोखला न करें, उन रीति-रिवाजों, और रस्मों को न छुएं जो सदियों से चले आ रहे हैं। दूसरे जजों ने कहा कि अगर हम हर धार्मिक प्रथा की समीक्षा करेंगे, तो देश में अराजकता फैल जाएगी, हर व्यक्ति अपनी व्याख्या लेकर आएंगे, जिससे मंदिरों और दूसरी संस्थाओं का अनुशासन भंग होगा। अदालत ने यह भी सुझाया कि भविष्य में याचिकाकर्ता को यह साबित करना पड़ सकता है कि वह वाकई उस धर्म का सच्चा आस्तिक है।
अब इस देश के नागरिकों को यह सोचने की जरूरत है कि भारत का सुप्रीम कोर्ट जब सदियों से चली आ रही प्रथाओं को छूना भी नहीं चाहता, तो यही बात तो मनुस्मृति की वकालत करने वाले कहते हैं, यही बात तो भारत में जाति व्यवस्था का अन्याय जारी रखने वाले लोग कहते हैं, यही बात तो अफगानिस्तान में तालिबान कहते हैं, और यही बात तो हिन्दुस्तान में छोटी-छोटी सी बच्चियों की शादी करते हुए शरीयत का हवाला देने वाले करते हैं।
अगर लोकतांत्रिक संविधान में भी सदियों पुरानी धार्मिक और सामाजिक बेइंसाफी से जूझने का हौसला नहीं रह गया है, तो यह तो फिर सतीप्रथा जारी रखने वाली सोच है, बाल विवाह को मंजूरी देने वाली, और शाहबानो के हक को कुचलने वाली सोच है। लोकतंत्र का आविष्कार ही इसलिए हुआ था कि हजारों बरस से चले आ रहे अन्याय को खत्म किया जा सके, और आज लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत का इस्तेमाल करते हुए ऊंचे-ऊंचे शाही सिंहासनों पर बैठे हुए जज सदियों पुरानी परंपराओं को सलामी देते नजर आ रहे हैं!
यह कैसी भयानक निराशापूर्ण नौबत है कि जिसके बाद अब इस देश के नागरिकों के लिए कहीं रौशनी नहीं बचती है। वोटों के सौदागर, सत्तारूढ़ लोग, संसद, या विधानसभाओं में बहुसंख्यक तबके, इन सबको तो सडक़ की भीड़ से, और आस्थावानों की एकजुटता से डर लगना समझ आता है, लेकिन जब अदालत के सामने धार्मिक और सामाजिक अन्याय के शिकार लोग खड़े हो रहे हैं, इंसाफ मांग रहे हैं, तब सुप्रीम कोर्ट के जज अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से कतराते हुए लोगों को सैकड़ों बरस पुराने रीति-रिवाज सुझा रहे हैं!
अभी यह मामला चल ही रहा है, लेकिन कल से आज तक जजों की जो टिप्पणियां सामने आई हैं, उनसे ऐसा लगता है कि हम 26 जनवरी 1950 के पहले के वक्त में चले गए हैं, और संविधान अभी लागू हुआ नहीं है। हे राम…
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