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(कोलकाता से लौटकर नैवेद्य पुरोहित)
उत्तर कोलकाता के बड़ा बाजार की गलियों में जब आप कदम रखते हैं, तो हवा में लाली छंगाणी की मशहूर कचौरी की खुशबू और चुनावी चर्चाओं का शोर एक साथ सुनाई देता है। जोड़ासांको विधानसभा क्षेत्र जो अपनी व्यापारिक विरासत और संकरी गलियों के लिए जाना जाता है। यह क्षेत्र इस बार एक दिलचस्प ‘त्रिकोणीय’ और ‘जातीय’ मुकाबले का गवाह बनने जा रहा है।
कोलकाता डायरी .. एक सीट तीन पंडित, क्या जोड़ासांको में भाजपा “विजय” का स्वाद चख पाएगी?
एक ही बिरादरी के तीन धुरंधर
जोड़ासांको की चुनावी बिसात इस बार बेहद अनोखी है। यहाँ मुख्य लड़ाई तीन ब्राह्मण उम्मीदवारों के बीच सिमट गई है जो मतदाताओं के एक ही बड़े हिस्से को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं।
1. विजय उपाध्याय (टीएमसी): तृणमूल ने दो बार के पार्षद और ‘धार्मिक छवि’ वाले विजय उपाध्याय को मैदान में उतारकर दांव खेला है। वे ममता बनर्जी के विकास कार्यों और अपनी जमीनी पकड़ के भरोसे हैं।
2. विजय ओझा (भाजपा): भाजपा की ओर से अनुभवी नेता विजय ओझा ताल ठोक रहे हैं। बड़ा बाजार का व्यापारिक वर्ग पारंपरिक रूप से भाजपा का समर्थक रहा है और ओझा इसी ‘वोट बैंक’ की किलेबंदी कर रहे हैं।
3. भरत राम तिवारी (सीपीआई एम): ‘लाल झंडे’ वालों ने भरत कुमार तिवारी पर भरोसा जताया है। वे भ्रष्टाचार और महंगाई को मुद्दा बनाकर मध्यम वर्ग के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
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इतिहास और विरासत: व्यापार का गढ़
जोड़ासांको का इतिहास देशबंधु पार्क, रवींद्रनाथ टैगोर के पैतृक घर (जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी) और कलाकार स्ट्रीट के व्यापारिक रसूख से जुड़ा है। यह क्षेत्र 1950 के दशक से ही राजनीति का केंद्र रहा है। कभी यहाँ कांग्रेस और वामपंथियों का दबदबा था लेकिन हाल के वर्षों में यह सीट टीएमसी और भाजपा के बीच ‘प्रतिष्ठा की लड़ाई’ बन गई है। 2021 में यहाँ से टीएमसी के विवेक गुप्ता ने जीत दर्ज की थी परंतु अब चेहरे बदल चुके हैं।
कचौरी से लेकर कलाकारी तक
कलाकार स्ट्रीट की भीड़भाड़ और बड़ा बाजार की ट्रैफिक जाम के अलावा गंदगी की समस्या यहाँ आज भी सबसे बड़ा मुद्दा है। छंगाणी की कचौरी की तरह यहाँ की राजनीति गरम है लेकिन लोगों को ऐसा नेता चाहिए जो यहाँ की तंग गलियों के साथ-साथ व्यापारियों की तंगहाली को भी समझे। तीन ब्राह्मण उम्मीदवारों के बीच वोट बंटने का सीधा फायदा किसे मिलेगा, यह कहना जल्दबाजी होगी। टीएमसी जहां अल्पसंख्यक और कुछ हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद कर रही है, वहीं भाजपा का पूरा फोकस ‘हिंदी भाषी’ व्यापारिक समाज पर ही है।
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