जौहर यूनिवर्सिटी: क्या प्रशासन के पास यूनिवर्सिटी को ध्वस्त करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं!
उत्तर प्रदेश के रामपुर में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खां के ड्रीम प्रोजेक्ट, मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी पर इस समय प्रशासन का कानूनी शिकंजा कस गया है, जिससे न केवल यूनिवर्सिटी प्रबंधन बल्कि वहां पढ़ रहे हजारों छात्र-छात्राओं के भविष्य पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
इस पूरे विवाद का पहला बड़ा पहलू लोक निर्माण विभाग की वह हालिया कार्रवाई है जिसके तहत यूनिवर्सिटी परिसर के भीतर बनी लगभग साढ़े तीन किलोमीटर लंबी सड़क को आधिकारिक तौर पर ‘आम रास्ता’ घोषित कर दिया गया है।
करीब 13 करोड़ रुपये से अधिक की सरकारी लागत से बनी इस सड़क पर अब तक केवल विश्वविद्यालय प्रशासन का ही पूर्ण नियंत्रण था और आम जनता का प्रवेश वर्जित था। लेकिन साल 2019 में सरकारी बजट के दुरुपयोग की शिकायत और उसके बाद हुई उच्च स्तरीय जांच के बाद, अब पीडब्ल्यूडी ने यूनिवर्सिटी के मुख्य गेट पर अपना बोर्ड लगाकर इसे सार्वजनिक मार्ग घोषित कर दिया है।
विभाग के इस कदम के बाद अब रामपुर के स्थानीय नागरिकों और राहगीरों के लिए इस मार्ग से आवाजाही की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
आरडीए ने परिसर के कुल 40 भवनों में से 38 को पूरी तरह अवैध ठहराया
इस सड़क विवाद के समानांतर ही, यूनिवर्सिटी के अस्तित्व पर इससे भी बड़ा संकट रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के उस आदेश से खड़ा हो गया है, जिसमें परिसर के कुल 40 भवनों में से 38 को पूरी तरह अवैध घोषित करते हुए उन्हें ध्वस्त करने का फरमान जारी किया गया है।
रामपुर के जिलाधिकारी और आरडीए उपाध्यक्ष अजय कुमार द्विवेदी की अध्यक्षता में हुई व्यक्तिगत सुनवाई के बाद यह फैसला लिया गया है, जिसमें करीब 82 हजार वर्ग मीटर से अधिक के विशाल क्षेत्रफल में फैले इन 38 भवनों को हटाने के लिए यूनिवर्सिटी प्रबंधन को मात्र 20 दिनों की मोहलत दी गई है।
प्रशासन ने साफ कर दिया है कि यदि निर्धारित अवधि के भीतर प्रबंधन खुद इन अवैध निर्माणों को नहीं हटाता है, तो प्राधिकरण खुद बुलडोजर की कार्रवाई कर इन्हें जमींदोज कर देगा और ध्वस्तीकरण पर आने वाला समस्त खर्च भी भू-राजस्व बकाये की तरह यूनिवर्सिटी से ही वसूला जाएगा।
इस व्यापक ध्वस्तीकरण कार्रवाई के बाद पूरे विश्वविद्यालय परिसर में केवल दो ही इमारतें मेडिकल कॉलेज भवन और मुख्य अकादमिक ब्लॉक सुरक्षित बचेंगी, क्योंकि केवल इन्हीं दो भवनों का नक्शा सक्षम प्राधिकारी से स्वीकृत कराया गया था।
निर्माण 27 सितंबर 2024 से पहले तक रामपुर विकास प्राधिकरण के अंतर्गत नहीं थी!
इस पूरे कानूनी मामले में दोनों पक्षों के बीच आरडीए के अधिकार क्षेत्र और नियमों को लेकर बहस देखने को मिली है। व्यक्तिगत सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार और अधिवक्ताओं ने दलील दी कि यह पूरा निर्माण राजस्व ग्राम सींगनखेड़ा की भूमि पर स्थित है, जिसे 27 सितंबर 2024 से पहले तक रामपुर विकास प्राधिकरण या नगर पालिका की सीमा में शामिल ही नहीं किया गया था।
यूनिवर्सिटी पक्ष का तर्क था कि चूंकि निर्माण कार्य काफी पुराना है और उस समय यह क्षेत्र प्राधिकरण के दायरे से बाहर था, इसलिए आरडीए से नक्शा पास कराने की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं थी और वर्तमान नियमों के आधार पर इसे अवैध मानना पूरी तरह गलत है।
हालांकि, जिला प्रशासन और आरडीए के अधिकारियों ने इस तर्क को यह कहते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया कि जब यूनिवर्सिटी प्रबंधन ने अपने मेडिकल और अकादमिक भवन का नक्शा जिला पंचायत से पास कराया था, तो उन्हें नियमों की पूरी जानकारी थी। प्रशासन का सवाल था कि जब दो प्रमुख भवनों के लिए अनुमति ली गई, तो बाकी 38 भवनों के निर्माण के समय सक्षम अधिकारियों से मानचित्र स्वीकृत कराने की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई, जो सीधे तौर पर नियमों की अनदेखी को दर्शाता है।
उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की धारा-27(1) के तहत की जा रही इस सख्त प्रशासनिक घेराबंदी और हाल ही में फायर सेफ्टी मानकों की अनदेखी को लेकर जारी नए नोटिसों ने मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के भविष्य को पूरी तरह अंधकार में डाल दिया है।
इन कड़े फैसलों का असर अब वहां नामांकित करीब 2,500 छात्र-छात्राओं की शिक्षा पर पड़ता दिख रहा है, जिनकी पढ़ाई, आगामी परीक्षाओं और डिग्रियों की वैधता को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी हो गई हैं। परिसर की लगभग 90 प्रतिशत इमारतों के ढहाए जाने की स्थिति में विश्वविद्यालय का कामकाज पूरी तरह ठप होने की कगार पर पहुंच जाएगा, जिससे छात्रों का शैक्षणिक सत्र अधर में लटक सकता है।
1948 में जो वैचारिक और कानूनी बहस देश के बड़े नेताओं के बीच नियमों और अधिकारों को लेकर चलती थी, आज रामपुर की जमीन पर वह एक ठोस और आक्रामक कानूनी कार्रवाई के रूप में तब्दील हो चुकी है, जहां एक राजनीतिक ड्रीम प्रोजेक्ट और हजारों छात्रों का भविष्य अब पूरी तरह अदालती फैसलों और प्रशासनिक समय-सीमा के चक्रव्यूह में उलझ गया है।
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