देश में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर छिड़ी बहस का केंद्र इस समय मध्य प्रदेश बना हुआ है, जहां राज्य सरकार इसे कानूनी रूप देने की तैयारी में है।
इस पूरे मुद्दे की गहराई और इसके विभिन्न सामाजिक आयामों को समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों में जाकर संविधान सभा के तीन प्रमुख नायकों – डॉ. बी.आर. अंबेडकर, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के विचारों को देखना होगा, क्योंकि इस विषय पर तीनों का दृष्टिकोण काफी अलग था।
23 नवंबर 1948 को संविधान सभा में जब अनुच्छेद 44 पर बहस हो रही थी, तब डॉ. अंबेडकर ने इसे केवल एक धार्मिक मुद्दा न मानकर सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और महिला अधिकारों के चश्मे से देखा। उनका स्पष्ट तर्क था कि यह कानून सिर्फ अल्पसंख्यकों को नहीं बल्कि बहुसंख्यक हिंदुओं को भी प्रभावित करेगा, हालांकि लोकतांत्रिक मर्यादा के तहत उन्होंने इसे जबरन थोपने के बजाय नीति निर्देशक सिद्धांतों में शामिल करना बेहतर समझा।
इसके विपरीत, महात्मा गांधी का मानना था कि सच्ची राष्ट्रीय एकता सांस्कृतिक और धार्मिक विविधताओं को मिटाकर नहीं, बल्कि उनका सम्मान करके ही हासिल की जा सकती है, इसलिए वे हर समुदाय को उनके पर्सनल कानून के तहत जीने की स्वायत्तता देने के पक्ष में थे। वहीं जवाहरलाल नेहरू वैचारिक रूप से एक समान कानून और धर्मनिरपेक्षता के समर्थक थे, जिसके लिए उन्होंने ‘हिंदू कोड बिल’ के जरिए सुधारों की कोशिश भी की, लेकिन विभाजन के बाद के संवेदनशील हालातों और राजनीतिक व्यावहारिकता को देखते हुए उन्होंने जल्दबाजी न कर समुदायों को आंतरिक सुधार के लिए समय देना सही समझा।
लिव-इन वाले हो जाएं तैयार
इतिहास की यही वैचारिक जंग आज मध्य प्रदेश की धरती पर व्यावहारिक रूप लेती दिख रही है, जहां सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली समिति ने 9.58 लाख से अधिक जनता के सुझावों का विश्लेषण कर 13 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को 4 भागों, 404 धाराओं और 7 अनुसूचियों वाला एक विस्तृत मसौदा सौंप दिया है।
इस प्रस्तावित कानून में ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन न कराने पर कानूनी कार्रवाई जैसे कड़े प्रावधान शामिल हैं, जिसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस बिल को लेकर सबसे बड़ा विवाद आदिवासियों और मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर खड़ा हुआ है; समिति ने राज्य की 22 प्रतिशत आदिवासी आबादी की सांस्कृतिक परंपराओं को अक्षुण्ण रखने के लिए उन्हें इस कानून के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की है, जिस पर विपक्ष सरकार को घेरते हुए इसे आदिवासियों की पहचान पर खतरा बता रहा है।
दूसरी ओर, जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसी मुस्लिम संस्थाओं का तर्क है कि पर्सनल लॉ को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है और यदि ऐसा कोई कानून बनाना भी है तो वह संसद के स्तर पर होना चाहिए, न कि अलग-अलग राज्यों द्वारा अलग-अलग रूप में। इस बीच, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हैं जहां कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी सरकार पर बेरोजगारी और महंगाई जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं मुख्यमंत्री मोहन यादव कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति करने का पलटवार कर रहे हैं।
20 जुलाई 2026 से शुरू हो रहे मध्य प्रदेश विधानसभा के पांच दिवसीय मानसून सत्र में सरकार इस विधेयक को पेश करने की तैयारी में है, और यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो उत्तराखंड के बाद मध्य प्रदेश देश का ऐसा अगला राज्य बन जाएगा जहां UCC धरातल पर उतरेगा, जिससे स्पष्ट होता है कि 1948 की वह वैचारिक बहस आज भी उतनी ही जीवंत और जटिल बनी हुई है।
किन किन राज्यों में UCC लागू है!
भारत में विभिन्न राज्यों में समान नागरिक संहिता (UCC) के लागू होने का समय और उसका इतिहास काफी अलग रहा है। वर्तमान में कानूनी तौर पर पूरी तरह लागू राज्यों और हाल ही में कानून पारित करने वाले राज्यों की टाइमलाइन नीचे दी गई है:
1. गोवा: वर्ष 1867 से लागू गोवा भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां स्वतंत्रता से पहले से ही समान नागरिक संहिता लागू है। लागू होने का वर्ष: 1867 (पुर्तगाली शासन के दौरान)इतिहास: पुर्तगाली सरकार ने 1867 में वहां ‘पुर्तगाली नागरिक संहिता’ लागू की थी। जब 1961 में गोवा भारतीय संघ का हिस्सा बना, तो भारत सरकार ने ‘गोवा, दमन और दीव प्रशासन अधिनियम, 1962’ के तहत इस कानून को उसी रूप में बने रहने दिया। इसलिए तकनीकी तौर पर गोवा में यह कानून आज़ादी के बाद लागू नहीं किया गया, बल्कि पहले से चले आ रहे कानून को ही जारी रखा गया।
2. उत्तराखंड: वर्ष 2024 में लागू उत्तराखंड आज़ादी के बाद अपने स्तर पर समान नागरिक संहिता (UCC) का नया कानून बनाकर उसे पूरी तरह धरातल पर लागू करने वाला देश का पहला राज्य है।विधेयक पारित होने की तिथि: 7 फरवरी 2024 को उत्तराखंड विधानसभा ने इस ऐतिहासिक बिल को मंजूरी दी।राष्ट्रपति की मंजूरी: 11 मार्च 2024 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस कानून को अंतिम मंजूरी दी।पूर्ण रूप से लागू: वर्ष 2024 में राष्ट्रपति की मंजूरी और आवश्यक नियमावली तैयार होने के साथ ही यह कानून राज्य में पूरी तरह प्रभावी हो चुका है।
3. गुजरात: मार्च 2026 में पारित गुजरात में समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए लंबे समय से तैयारी चल रही थी, जिसे हाल ही में बड़ी कानूनी मंजूरी मिली है।विधेयक पारित होने की तिथि: मार्च 2026 में गुजरात विधानसभा ने ‘गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक 2026’ को पूर्ण बहुमत से पारित किया।वर्तमान स्थिति: यह विधेयक वर्तमान में राष्ट्रपति की अंतिम मंजूरी के लिए प्रक्रिया में है, जिसके बाद इसे पूरे राज्य में नोटिफाई करके लागू कर दिया जाएगा।
4. असम: वर्ष 2026 में पारित असम पूर्वोत्तर भारत का पहला ऐसा राज्य बन गया है जिसने अपने यहां समान नागरिक संहिता लागू करने का रास्ता साफ किया है।विधेयक पारित होने की तिथि: वर्ष 2026 के विधानसभा सत्र में असम सरकार ने इस विशेष विधेयक को पारित किया।विशेष पहलू: इस कानून में राज्य के ट्राइबल (आदिवासी) क्षेत्रों को छूट दी गई है और इसे लागू करने की प्रशासनिक प्रक्रिया वर्तमान में जारी है।
UCC पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का मत!
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने समान नागरिक संहिता (UCC) का पुरजोर समर्थन करते हुए इसे ‘एक देश, एक विधान’ के संकल्प के लिए जरूरी बताया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश में सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के नियम एक समान होने चाहिए। मुख्यमंत्री को सेवानिवृत्त जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की समिति ने यूसीसी का ड्राफ्ट सौंप दिया है, जिसमें आदिवासियों को इस कानून से बाहर रखने की सिफारिश की गई है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यूसीसी समाज में लैंगिक समानता लाने और महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण कदम है।
इसकी क्या जरूरत आन पड़ी?
समान नागरिक संहिता (UCC) की जरूरत को लेकर देश में लंबे समय से बहस चल रही है। भारत में आपराधिक मामलों (जैसे चोरी, मर्डर) के लिए तो सबके लिए एक ही कानून (भारतीय न्याय संहिता) है, लेकिन व्यक्तिगत मामलों (शादी, तलाक, गोद लेना, संपत्ति का बंटवारा) के लिए हर धर्म के अपने अलग ‘पर्सनल लॉ’ हैं।संविधान निर्माताओं ने भी अनुच्छेद 44 (Article 44) के तहत राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने का निर्देश दिया था, ताकि कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) को पूरी तरह जमीन पर उतारा जा सके।
इससे भारतीय विविधता पर पड़ने वाला प्रभाव
1. विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका (विरोधियों का तर्क)
आलोचकों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि UCC भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान के लिए खतरा बन सकता है:
सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का नुकसान: भारत में हर धर्म, समुदाय और जनजाति के अपने अनोखे रीति-रिवाज, शादी की रस्में और पारिवारिक परंपराएं हैं। आशंका है कि एक समान कानून आने से ये सदियों पुरानी अनूठी परंपराएं धीरे-धीरे खत्म हो सकती हैं और सब कुछ “एक ही सांचे” में ढल जाएगा।
संवैधानिक अधिकारों का टकराव: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 नागरिकों को अपनी पसंद के धर्म को मानने और उसके अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता देता है। आलोचकों के अनुसार, व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) को खत्म करना इस धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर चोट करने जैसा है।
आदिवासियों और क्षेत्रीय समुदायों की चिंताएं: देश के कई हिस्सों, विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों और मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्रों में अपनी विशेष प्रथाएं हैं (जैसे मातृसत्तात्मक समाज, जहां संपत्ति बेटी को मिलती है)। हालांकि हाल के ड्राफ्टों (जैसे मध्य प्रदेश या उत्तराखंड) में आदिवासियों को इससे बाहर रखने की बात कही जा रही है, लेकिन डर है कि इससे अंततः उनकी स्वायत्तता प्रभावित होगी।
2. विविधता को नया रूप और सुरक्षा मिलने का तर्क (समर्थकों का तर्क)
दूसरी ओर, समर्थकों का मानना है कि UCC विविधता को खत्म नहीं करता, बल्कि उसे एक सुरक्षित और समान आधार देता है:
विविधता बनाम कुप्रथाएं: समर्थकों का तर्क है कि हर विविधता सुंदर नहीं होती। यदि किसी समुदाय की “विविधता या परंपरा” के नाम पर महिलाओं या बच्चों के अधिकारों का हनन होता है (जैसे कम उम्र में शादी या संपत्ति में अधिकार न मिलना), तो कानून को उसमें हस्तक्षेप करना चाहिए। विविधता के नाम पर असमानता को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।
धार्मिक रीति-रिवाजों पर कोई रोक नहीं: समर्थकों के अनुसार, UCC केवल ‘नागरिक अधिकारों’ (जैसे तलाक की कानूनी प्रक्रिया, संपत्ति का समान बंटवारा, बहुविवाह पर रोक) को एक समान करता है। यह किसी को निकाह करने, सात फेरे लेने, चर्च में शादी करने या अपनी धार्मिक पद्धतियों का पालन करने से नहीं रोकता। रीति-रिवाज वैसे ही रहेंगे, बस उनके पीछे का कानूनी ढांचा एक समान हो जाएगा।
असली विविधता समानता में है: एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र के रूप में विविधता तभी फल-फूल सकती है जब सभी नागरिक कानूनी तौर पर सुरक्षित महसूस करें। जब समाज के कमजोर वर्गों को समानता मिलेगी, तभी वे देश की मुख्यधारा में बिना किसी भेदभाव के योगदान दे सकेंगे।
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