मेजर हमज़ा आरिफ की अंतिम यात्रा में नेताओं की गैरमौजूदगी पर उठे सवाल
कहा जाता है कि सैनिक किसी भी देश का गौरव होता है, लेकिन सवाल तब उठता है जब उसी सैनिक की अंतिम यात्रा में सियासत की खामोशी दिखाई देने लगे।
भारतीय सेना के मेजर हमज़ा आरिफ की जैसलमेर में एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। बताया जा रहा है कि ड्यूटी पूरी करने के बाद लौटते समय सेना की गाड़ी के सामने अचानक एक ऊंट आ गया, जिससे वाहन का संतुलन बिगड़ गया और भीषण हादसे में देश ने अपना एक जांबाज़ अधिकारी खो दिया।
मेजर हमज़ा आरिफ की कहानी सिर्फ एक सैनिक की नहीं, बल्कि एक अधूरी प्रेम कहानी की भी है। करीब सात साल तक चले रिश्ते के बाद उन्होंने प्रेम विवाह किया था। शादी को अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था कि एक सड़क हादसे ने परिवार की खुशियां छीन लीं। जिस घर में नई जिंदगी की शुरुआत हुई थी, वहां अचानक मातम पसर गया।
इंदौर में मेजर हमज़ा आरिफ को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। तिरंगे में लिपटे सैनिक को गार्ड ऑफ ऑनर और अंतिम सलामी दी गई। इस बीच सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठ रहा है कि अगर अंतिम यात्रा में शहर के प्रमुख जनप्रतिनिधि मौजूद नहीं थे,
तो इसके पीछे क्या वजह थी। हालांकि, इस संबंध में किसी भी जनप्रतिनिधि की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या हमारे नेताओं के पास एक सैनिक को अंतिम श्रद्धांजलि देने का समय नहीं है।
क्या सैनिकों का सम्मान अब केवल मंचों, भाषणों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित होकर रह गया है। चुनावी रैलियों, उद्घाटनों और प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए समय निकालने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए क्या एक सैनिक की अंतिम विदाई में शामिल होना नैतिक जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए।
जब कोई सैनिक सीमा पर खड़ा होता है, तो वह यह नहीं पूछता कि वह जिस नागरिक की रक्षा कर रहा है, वह किस धर्म, जाति या राजनीतिक दल से जुड़ा है। उसके लिए सिर्फ एक पहचान होती है भारत।
ऐसे में समाज और राजनीति के सामने भी यह सवाल खड़ा होता है कि क्या हमें अपने सैनिकों को राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान के दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
अगर किसी जनप्रतिनिधि की अनुपस्थिति के पीछे कोई आधिकारिक कारण था, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना जितना जरूरी है, जवाब देना भी उतना ही आवश्यक है।
यह सवाल किसी एक दल से नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र से है कि क्या हम अपने सैनिकों का सम्मान केवल शब्दों में करते हैं या उनके आखिरी सफर में भी उनके साथ खड़े होते हैं।
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