स्ट्रीट फूड से फास्ट फूड तक,आपके खाने की थाली कितनी सुरक्षित?
भारत में सड़क किनारे लगने वाले ठेले, गली के फास्ट फूड कॉर्नर और छोटी-बड़ी खाने-पीने की दुकानें हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। सुबह की चाय-समोसे से लेकर रात के मोमोज़ और पानीपुरी तक, करोड़ों लोग हर दिन इन्हीं दुकानों पर निर्भर रहते हैं।
लेकिन सच यह है कि अगर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI जैसी संस्थाएं अपने ही बनाए नियमों को सख्ती से लागू करना शुरू कर दे, तो देश में बिकने वाले फूड, स्ट्रीट फूड और फास्ट फूड की अधिकतर दुकानें तुरंत बंद करनी पड़ेंगी।
और यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि सरकार के अपने आंकड़े और संसदीय समितियों की रिपोर्टें इसी तरफ इशारा करती हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं
FSSAI हर साल देशभर से खाने-पीने की चीज़ों के लाखों नमूने लेकर उनकी जांच करता है। वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही तक जांचे गए एक लाख पैंसठ हज़ार से ज़्यादा नमूनों में से करीब सत्रह प्रतिशत नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे।
यानी हर छठवां-सातवां सैंपल किसी न किसी रूप में मिलावटी, घटिया या असुरक्षित पाया गया। यह सिर्फ लैब में जांचे गए नमूनों की बात है, जबकि देश में लाखों छोटी दुकानों और ठेलों की जांच कभी होती ही नहीं।
संसद की एक स्थायी समिति ने यह भी बताया कि देशभर में हुई निरीक्षणों में से सिर्फ दो प्रतिशत मामलों में ही गड़बड़ी दर्ज की गई, जो अपने आप में एक चिंताजनक संकेत है। इतना कम प्रतिशत असली सुरक्षा को नहीं, बल्कि जांच की कमज़ोरी और कम निगरानी को दिखाता है। जब जांच ही पर्याप्त नहीं हो रही,
तो असल मिलावट का स्तर सरकारी आंकड़ों से भी कहीं ज़्यादा होने की आशंका है।
देश में खाद्य जांच के लिए ज़रूरी प्रयोगशालाओं की भारी कमी है, और जो लैब मौजूद हैं उनमें से कई के पास तो जांच करने के लिए उचित मानक तय करने वाले या फिर उचित जांच करने की पूरी क्षमता तक नहीं है।
नतीजा यह है कि दूध, पनीर, मसाले, खाने का तेल और यहां तक कि अंडों में भी मिलावट या हानिकारक चीजें मिलने की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं। हाल के महीनों में अंडों में एक प्रतिबंधित एंटीबायोटिक अवशेष मिलने की खबर आई थी,
जो बताता है कि मिलावट अब सिर्फ पानी मिलाने या रंग डालने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह एक संगठित और रासायनिक स्तर की समस्या बन चुकी है।
बच्चों पर सीधा असर
इस पूरी समस्या की सबसे कमज़ोर कड़ी बच्चे हैं। स्कूलों के बाहर लगने वाले ठेलों पर तला हुआ, तीखा और रंग-बिरंगा जंक फूड बच्चों को सबसे ज़्यादा लुभाता है।
इनमें इस्तेमाल होने वाले सस्ते और अस्वीकृत रंग, बार-बार गर्म किया गया तेल और नमक-चीनी की अधिक मात्रा बच्चों के शरीर पर लंबे समय में गहरा असर डालती है। महाराष्ट्र सरकार को हाल ही में स्कूलों के आसपास कैफीन से भरपूर एनर्जी ड्रिंक्स की बिक्री पर रोक लगानी पड़ी,
क्योंकि इनसे बच्चों में तेज़ धड़कन, बेचैनी और अत्यधिक सक्रियता जैसी समस्याएं देखी गईं। यह एक उदाहरण भर है, जबकि असल में स्कूलों के आसपास बिकने वाला ज़्यादातर पैकेज्ड और तला-भुना खाना बच्चों की सेहत के लिए उपयुक्त नहीं होता।
बचपन में बनी खाने की गलत आदतें आगे चलकर मोटापे, डायबिटीज़ और दिल की बीमारियों की नींव रख देती हैं।
सेहत पर बड़ा खतरा
स्ट्रीट फूड और फास्ट फूड में इस्तेमाल होने वाला तेल अक्सर एक ही दिन में कई बार गर्म किया जाता है। बार-बार गर्म किए गए तेल में ट्रांस-फैट और एक्रिलामाइड जैसे हानिकारक तत्व बनते हैं, जिनका सीधा संबंध हृदय रोग और कुछ तरह के कैंसर से जोड़ा गया है।
इसके अलावा साफ-सफाई की कमी, बासी सामग्री का दोबारा इस्तेमाल और खुले में रखा गया खाना पेट के संक्रमण, टाइफाइड और फूड पॉइज़निंग जैसी बीमारियों को जन्म देता है।
मिलावटी दूध, पनीर और मसालों में मिलने वाले रसायन लीवर और किडनी पर असर डाल सकते हैं। यह समस्या सिर्फ कभी-कभार बीमार पड़ने की नहीं है, बल्कि रोज़ाना ऐसा खाना खाने वाले लाखों लोगों के लिए एक धीमे ज़हर की तरह काम करती है,
जिसका असर सालों बाद गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आता है।
पर्यावरण पर भी बोझ
स्ट्रीट फूड और फास्ट फूड का असर सिर्फ सेहत तक सीमित नहीं है, इसका सीधा नुकसान पर्यावरण को भी होता है। ज़्यादातर ठेलों और छोटी दुकानों पर खाना प्लास्टिक की थैलियों, थर्मोकोल की प्लेटों और प्लास्टिक के चम्मच-कप में परोसा जाता है,
जो इस्तेमाल के तुरंत बाद कूड़े में चला जाता है और सालों तक मिट्टी में नहीं घुलता। बचा हुआ इस्तेमाल किया गया तेल अक्सर नालियों में बहा दिया जाता है, जिससे पानी की निकासी व्यवस्था बाधित होती है और जल स्रोत प्रदूषित होते हैं।
खाने-पीने की चीज़ों की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाला बहुस्तरीय प्लास्टिक अक्सर रीसायकल भी नहीं हो पाता। इसके अलावा बड़ी मात्रा में बचा हुआ या फेंका गया खाना कूड़े के ढेर बढ़ाता है, जो सड़कर मीथेन जैसी हानिकारक गैसें छोड़ता है।
यानी एक तरफ यह हमारी सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है, तो दूसरी तरफ शहरों के कूड़ा प्रबंधन और पर्यावरण पर भी लगातार बोझ बढ़ा रहा है।
तो समाधान क्या है
इसका मतलब यह नहीं कि स्ट्रीट फूड या फास्ट फूड को पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। लाखों परिवारों की रोज़ी-रोटी इसी व्यापार से चलती है, और सस्ता, सुलभ खाना करोड़ों मेहनतकश लोगों की ज़रूरत भी है। असली समाधान है नियमों को सख्ती से लागू करना,
न कि दुकानें बंद करना। इसके लिए ज़्यादा जांच लैब बनाना, हर राज्य में पर्याप्त फूड सेफ्टी अधिकारियों की नियुक्ति करना, और सड़क विक्रेताओं को ट्रेनिंग देना ज़रूरी है ताकि वे साफ-सफाई और सही तेल के इस्तेमाल जैसी बुनियादी बातें समझ सकें।
FSSAI ने हाल में सड़क विक्रेताओं के पंजीकरण को आसान बनाने और पैकेज्ड खाने पर चेतावनी लेबल लगाने जैसे कदम उठाए भी हैं, लेकिन इन्हें ज़मीन पर सख्ती से लागू करना अभी बाकी है।
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