Xi Jinping India Visit

Xi Jinping India Visit

भारत-चीन रिश्तों में नई सुगबुगाहट, अमेरिका पर भी नजर

Share Politics Wala News

BRICS सम्मेलन से पहले भारत-चीन संबंधों में नई हलचल है। व्यापार घाटे, चीनी निवेश और अमेरिका के साथ आर्थिक रिश्तों के बीच भारत की रणनीति अहम होगी।

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग का भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब भारत, चीन और अमेरिका के बीच आर्थिक रिश्तों को लेकर दुनिया की नजर बनी हुई है। करीब सात साल बाद शी चिनफिंग भारत पहुंच रहे हैं। इसके कुछ ही समय बाद उनकी अमेरिका यात्रा भी प्रस्तावित है।

ऐसे में दोनों देशों के साथ चीन के बदलते रिश्तों को लेकर भारत के सामने आर्थिक स्तर पर कई महत्वपूर्ण सवाल हैं।

भारत इस बार BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और सम्मेलन के जरिए निवेश, तकनीक, ऊर्जा और व्यापार से जुड़े सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। भारत की अध्यक्षता के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में कई योजनाओं और समझौतों पर काम हुआ है।

इनमें वैश्विक सप्लाई चेन को मजबूत करने, स्टार्टअप सहयोग बढ़ाने, सीमा शुल्क व्यवस्था में सुधार और ऊर्जा क्षेत्र में नई तकनीक को बढ़ावा देने जैसी पहल शामिल हैं।

हालांकि, BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन योजनाओं को जमीन पर उतारने की है। संगठन ने वित्तीय सहयोग के लिए कई संस्थागत व्यवस्थाएं तैयार की हैं, लेकिन उत्पादन और औद्योगिक निवेश को बढ़ाने के मामले में अभी काफी संभावनाएं बाकी हैं।

भारत और चीन के आर्थिक संबंध इस पूरे समीकरण में खास महत्व रखते हैं। चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है। भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर से अधिक हो गया है।

इस घाटे का बड़ा हिस्सा मशीनरी और औद्योगिक उपकरणों से जुड़ा है, जिनका भारत में अभी बड़े पैमाने पर उत्पादन नहीं हो पा रहा है।

इसी वजह से भारत ने चीनी निवेश के मामले में अपनी नीति में कुछ बदलाव किए हैं। कुछ क्षेत्रों में ऐसी विदेशी कंपनियों और निवेशकों के लिए रास्ता आसान किया गया है, जहां चीनी हिस्सेदारी सीमित हो और भारतीय साझेदारों की प्रमुख भूमिका बनी रहे।

इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट और सौर ऊर्जा से जुड़े उत्पादन जैसे क्षेत्रों में भी निवेश प्रस्तावों को तेजी से मंजूरी देने पर जोर दिया जा रहा है।

हालांकि, निवेश की अनुमति मिलना ही पर्याप्त नहीं है। उद्योगों को जरूरी मशीनरी, तकनीकी जानकारी और विशेषज्ञ कर्मचारियों की भी जरूरत होती है। चीन से भारत आने वाले कुछ औद्योगिक उपकरणों को लेकर हाल में देरी की खबरों ने इस चुनौती को फिर सामने ला दिया है।

इससे साफ है कि भारत में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए केवल पैसा नहीं, बल्कि तकनीक और जरूरी उपकरणों की उपलब्धता भी जरूरी है।

दूसरी ओर अमेरिका की नजर भी भारत और चीन के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग पर है। अमेरिका की चिंता इस बात को लेकर है कि कहीं चीन में बने सामान को किसी दूसरे देश में मामूली बदलाव या असेंबलिंग के बाद उस देश का उत्पाद बताकर अमेरिकी बाजार में न भेजा जाए।

भारत को भी इस तरह के संभावित व्यापारिक रास्तों पर नजर रखने वाले देशों में शामिल किया गया है, हालांकि किसी भारतीय कंपनी पर सीधे तौर पर आरोप नहीं लगाया गया है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि वह चीन से जरूरी निवेश और तकनीक हासिल करे, लेकिन साथ ही अपने घरेलू उद्योग और स्थानीय सप्लाई चेन को भी मजबूत बनाए। सौर ऊर्जा इसका एक बड़ा उदाहरण है।

भारत सोलर मॉड्यूल उत्पादन में दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल हो चुका है और अब उत्पादन के लिए जरूरी शुरुआती स्तर के कंपोनेंट बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है। इस क्षेत्र में चीन के पास लंबे समय से तकनीकी अनुभव है।

इसी तरह भारतीय कंपनियों और चीनी कंपनियों के बीच संयुक्त उपक्रम भी एक रास्ता हो सकते हैं। ऐसे समझौतों से भारत को तकनीक, पूंजी और उत्पादन का अनुभव मिल सकता है।

लेकिन इसका फायदा तभी ज्यादा होगा, जब स्थानीय कंपनियों को सप्लाई चेन से जोड़ा जाए, भारतीय कर्मचारियों को प्रशिक्षण मिले और छोटे उद्योगों को भी इसका लाभ पहुंचे।

भारत के लिए मौजूदा परिस्थितियों में चीन और अमेरिका में से किसी एक को चुनना जरूरी नहीं है। दोनों के साथ आर्थिक संबंधों को अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से आगे बढ़ाया जा सकता है।

असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि भारत में आने वाला निवेश देश के भीतर उत्पादन, रोजगार, तकनीकी क्षमता और स्थानीय उद्योगों को मजबूत करे।

भारत-चीन और भारत-अमेरिका के बीच बदलते आर्थिक रिश्ते यह संकेत देते हैं कि बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से पूरी तरह दूरी बनाने के बजाय अपने हितों के अनुसार संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रही हैं।

भारत के लिए BRICS की अध्यक्षता का सबसे बड़ा अवसर यही हो सकता है कि वह विदेशी निवेश और वैश्विक सहयोग का इस्तेमाल देश में ऐसी औद्योगिक क्षमता तैयार करने के लिए करे, जो भविष्य में सप्लाई चेन संकट और अंतरराष्ट्रीय तनाव जैसी परिस्थितियों में अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखे

यह भी पढ़ें: 

मोदी-पुतिन-जिनपिंग की तिकड़म कर पाएगी डॉलर की बादशाहत कम!?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *