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नरेंद्र मोदी सरकार ने हाल ही में पाकिस्तान में आतंकी शिविरों पर भारत के सैन्य हमलों के बारे में राष्ट्र को संबोधित करने के लिए दो महिला अधिकारियों – सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी और वायु सेना की विंग कमांडर व्योमिका सिंह – को मंच दिया. विडंबना यह है कि कुछ साल पहले मोदी सरकार ने महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन (पीसी) देने का विरोध किया था.
इस ब्रीफिंग में दो महिला अधिकारियों को शामिल करने को एक रणनीतिक कदम के रूप में सराहा गया. पहलगाम हमले में मुख्य रूप से हिंदू पुरुषों को निशाना बनाए जाने के कारण ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम भी चर्चा में रहा, जिसकी कुछ लोगों ने पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा देने वाला कहकर आलोचना की.
दिलचस्प बात यह है कि 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारियों को पीसी प्रदान करने वाले अपने ऐतिहासिक फैसले में कर्नल सोफिया कुरैशी की उपलब्धियों को विशेष रूप से स्वीकार किया था. तब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक नोट में महिलाओं को शारीरिक रूप से अनुपयुक्त और पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला देते हुए स्थायी कमीशन का विरोध किया था.
17 फरवरी, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए इसे लैंगिक रूढ़िवादिता बताया और महिला अधिकारियों को पीसी देने का आदेश दिया. न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि महिलाओं की क्षमता पर आक्षेप लगाना न केवल महिलाओं, बल्कि सेना का भी अपमान है. उन्होंने कर्नल कुरैशी जैसी कई महिला अधिकारियों की अनुकरणीय सेवा पर प्रकाश डाला था, जिन्होंने कांगो में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
इसके बाद भी, महिला अधिकारियों के लिए पीसी की राह आसान नहीं थी. चिकित्सा आधार पर अयोग्य ठहराए जाने के खिलाफ महिला अधिकारियों ने याचिकाएँ दायर कीं. तब सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि 50 वर्षीय महिला अधिकारी से 30 वर्षीय पुरुष अधिकारी के फिटनेस स्तर की उम्मीद करना न्याय का उपहास होगा और सेना के शीर्ष नेतृत्व तथा नौकरशाही की सोच के अंतर को पाटने की आवश्यकता बताई थी.
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