Pannalal Shakya

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बीजेपी विधायक ने माता सीता को कहा “मौत का सामान”

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गुना में बीजेपी विधायक पन्नालाल शाक्य के रामायण और महाभारत के उदाहरणों पर दिए बयान से विवाद खड़ा हो गया। बीजेपी की महिला विधायक ने मंच से ही आपत्ति जताई।

बीजेपी विधायक पन्नालाल शाक्य एक बार फिर अपने बयान को लेकर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने रामायण और महाभारत के प्रसंगों का जिक्र करते हुए महिलाओं को लेकर ऐसा तर्क दिया, जिस पर बीजेपी के ही मंच पर विरोध की आवाज उठ गई। हालात यहां तक पहुंच गए कि बीजेपी की महिला विधायक प्रियंका पैंची ने मंच से ही शाक्य के बयान पर आपत्ति जता दी। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच मंच पर ही बहस देखने को मिली।

ये बीजेपी विधायक पन्नालाल शाक्य हैं, जो अपने भाषण में माता सीता से जुड़े प्रसंग को ‘मौत का सामान’ बताते हुए नजर आए। उन्होंने कहा कि युद्धों में पुरुष मारे गए, महिलाएं नहीं। जब बीजेपी की महिला विधायक प्रियंका पैंची ने मंच से ही उनके बयान पर आपत्ति जताई, तो शाक्य ने उन्हें बैठने के लिए कह दिया।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जो बीजेपी राम को लाने की बात करती है, क्या उसी के मंच से रामायण के पात्रों और माता सीता को लेकर इस तरह की बातें भी कही जाएंगी? और बीजेपी का संगठन आखिर विधायक के कितने बेतुके बयानों को माफ करेगा?

दरअसल, गुना के नानाखेड़ी मंडी परिसर में बलराम कृषि महोत्सव का कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी वर्चुअली जुड़े थे। मंच से किसानों और कृषि से जुड़े मुद्दों पर बात होनी थी, लेकिन बीजेपी विधायक पन्नालाल शाक्य के भाषण के बाद पूरा कार्यक्रम सियासी बहस का अखाड़ा बन गया।

अपने भाषण के दौरान पन्नालाल शाक्य ने रामायण से लेकर महाभारत और पृथ्वीराज चौहान-संयोगिता तक के उदाहरण गिनाए। रामायण के प्रसंग का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि रावण को समझाया गया था कि पराई स्त्री को लेकर आना ‘मौत का सामान’ लेकर आने जैसा है और उसे वापस कर देना चाहिए। लेकिन रावण नहीं माना और इसके बाद युद्ध हुआ, जिसमें पुरुषों का सर्वनाश हुआ।

इसके बाद शाक्य ने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि एक महिला यानी पांचाली के कारण करोड़ों पुरुष मारे गए।

अब यहीं से सवाल खड़ा होता है कि इतिहास की जटिल घटनाओं का पूरा जिम्मा महिलाओं के सिर डाल देना क्या इतना आसान है, विधायक जी?

क्योंकि इतिहास में युद्धों के पीछे सिर्फ एक व्यक्ति या एक महिला को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। सत्ता, महत्वाकांक्षा, बदला, राजनीति, राजवंशों की लड़ाई और वर्चस्व की चाह जैसे तमाम कारण इतिहास के बड़े युद्धों के पीछे रहे हैं। लेकिन विधायक पन्नालाल शाक्य की दलील सुनें तो ऐसा लगता है, जैसे इतिहास का पूरा हिसाब-किताब महिलाओं के नाम कर दिया गया हो।

और इसी बात पर बीजेपी की ही विधायक प्रियंका पैंची भड़क गईं। उन्होंने मंच से शाक्य के बयान पर आपत्ति जताई और इसे महिला विरोधी बताया। इसके बाद बीजेपी के मंच पर ही दोनों विधायकों के बीच बहस की स्थिति बन गई।

यानी मंच बीजेपी का था, कार्यक्रम किसानों का था, लेकिन चर्चा पहुंच गई महिलाओं और इतिहास की व्याख्या तक।

पन्नालाल शाक्य ने अपने बयान का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने बहुत किताबें पढ़ी हैं और उन्हें इतिहास की जानकारी है। लेकिन मामला सिर्फ किताबें पढ़ने तक नहीं रुका। शाक्य ने बीजेपी की महिला विधायक प्रियंका पैंची को बैठने के लिए तक कह दिया।

अब सवाल बीजेपी से है। एक तरफ पार्टी महिला सशक्तिकरण की बात करती है, महिलाओं की भागीदारी और सम्मान की बात करती है। दूसरी तरफ जब पार्टी के ही मंच पर एक महिला विधायक किसी बयान को महिला विरोधी बताकर सवाल उठाती हैं, तो पार्टी इस पूरे घटनाक्रम पर क्या कहेगी?

सवाल पन्नालाल शाक्य से भी है। इतिहास पढ़ना अच्छी बात है, इतिहास के प्रसंगों को समझना भी जरूरी है। लेकिन इतिहास की व्याख्या करते वक्त क्या सदियों पुरानी घटनाओं का पूरा दोष महिलाओं के सिर डाल देना सही है?

क्योंकि मामला सिर्फ एक बयान का नहीं है। मामला उस सोच का भी है, जिसमें सदियों पुरानी घटनाओं का बोझ महिलाओं के सिर डाल दिया जाता है। रामायण हो या महाभारत, इन प्रसंगों को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या युद्ध और विनाश जैसे जटिल ऐतिहासिक घटनाक्रमों के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?

आज बीजेपी के मंच पर विपक्ष की जरूरत ही नहीं पड़ी। अपनों ने ही सवाल दाग दिए। एक तरफ बीजेपी विधायक पन्नालाल शाक्य अपने तर्क पर कायम दिखाई दिए, तो दूसरी तरफ पार्टी की ही महिला विधायक प्रियंका पैंची ने उनके बयान पर आपत्ति जता दी।

अब देखना होगा कि यह सिर्फ मंच पर हुई बहस बनकर रह जाती है या फिर पन्नालाल शाक्य के बयान पर बीजेपी संगठन की ओर से भी कोई सियासी सफाई सामने आती है।

क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मंच पर किसने किसे बैठने के लिए कहा। बड़ा सवाल यह है कि सार्वजनिक मंच से महिलाओं और धार्मिक प्रसंगों को लेकर दिए गए ऐसे बयानों पर राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए?

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