नरोत्तम मिश्रा ने किसे कहा दुश्मन- मैं दोस्ती और दुश्मनी दोनों याद रखता हूं!
मध्य प्रदेश की राजनीति में बयान तो बहुत आते हैं, लेकिन कुछ बयान अपने साथ कई गंभीर सवाल छोड़ जाते हैं। इन दिनों दतिया की राजनीति में एक ही चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है। मंच से सरेआम दी गई एक चेतावनी ने न सिर्फ प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
मैं भूलने वाला प्राणी नहीं हूं, मैं दोस्ती और दुश्मनी दोनों याद रखता हूं।
यह बात किसी फिल्मी विलेन या हीरो ने नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा ने मंच से दतिया के पुलिस अधीक्षक (SP) को संबोधित करते हुए कही है। यह कोई बंद कमरे की बातचीत नहीं थी, बल्कि एक सार्वजनिक मंच से जिले के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी को सीधे तौर पर दी गई नसीहत या कहें कि चेतावनी थी।
टिकट कटने से लेकर सड़कों पर बवाल तक
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। दतिया उपचुनाव में जब भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटा, तो उनके समर्थक सड़कों पर उतर आए थे। हाईवे जाम किए गए, उग्र प्रदर्शन हुए और स्थिति को नियंत्रण में लेने के लिए पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी। कई समर्थकों को हिरासत में लिया गया, जिसके बाद दतिया का राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया था।
अब उसी दतिया में, पूर्व गृह मंत्री का मंच से एसपी को यह कहना कि “मैं दोस्ती और दुश्मनी दोनों याद रखता हूं”, सीधे तौर पर उसी पुलिसिया कार्रवाई से जोड़कर देखा जा रहा है।
सवाल जो इस बयान ने खड़े किए
जब कोई आम नेता या कार्यकर्ता ऐसी बात कहता है, तो उसका असर सीमित होता है। लेकिन जब यह बात प्रदेश का वह पूर्व गृह मंत्री कहे, जिसने सालों तक खुद पुलिस विभाग की कमान संभाली हो, तब इस बयान के मायने पूरी तरह बदल जाते हैं। यहाँ कुछ बड़े सवाल खड़े होते हैं:
क्या यह सिर्फ समर्थकों को साधने की कोशिश है?
क्या नरोत्तम मिश्रा इस बयान के जरिए अपने समर्थकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि टिकट कटने के बावजूद दतिया की राजनीति में उनका दबदबा और प्रभाव रत्ती भर भी कम नहीं हुआ है?
क्या यह सीधे तौर पर प्रशासन को राजनीतिक संदेश है?
दतिया में हुई कार्रवाई से क्या पूर्व गृह मंत्री वाकई इतने नाराज हैं कि उन्होंने मंच से ही अपनी नाराजगी को सार्वजनिक करने में गुरेज नहीं किया?
अधिकार और आदेश का संतुलन कहाँ है?
एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या पूर्व गृह मंत्री को यह मालूम नहीं कि पुलिस बल किसके इशारे और नियमों के तहत काम करता है? आदेशदाता कौन होता है? ऐसे में एसपी जैसी जिम्मेदार कुर्सी पर बैठे अधिकारी को सार्वजनिक रूप से इस तरह टारगेट करना कहाँ तक जायज है?
लोकतंत्र और प्रशासनिक साख पर प्रहार
सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी कद्दावर नेता द्वारा एसपी को इस तरह ‘दोस्ती और दुश्मनी’ याद रखने की बात कहना एक स्वस्थ राजनीतिक परंपरा है?
यह बयान सिर्फ एक व्यक्तिगत नाराजगी या राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह सत्ता, राजनीति और ब्यूरोक्रेसी (प्रशासन) के बीच के रिश्तों की मर्यादा पर भी एक बड़ा प्रहार है। जब कानून व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों को राजनीतिक मंचों से इस तरह के संदेश दिए जाएंगे, तो प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है।
फिलहाल, दतिया के एसपी तक पूर्व गृह मंत्री का यह ‘दोस्ती और दुश्मनी’ वाला संदेश पहुंच चुका है। अब देखना यह होगा कि इस सियासी बयान की गूंज भोपाल के गलियारों से लेकर दतिया की जमीन पर कितनी दूर तक सुनाई देती है और आने वाले दिनों में इसके क्या राजनीतिक परिणाम निकलते हैं।
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