गडकरी की ‘चुनौती’ और कोर्ट का फैसला: E-20 पेट्रोल से खराब हुई 20 लाख की गाड़ी, कंज्यूमर कोर्ट ने कहा—”या तो नई कार दो या पूरे पैसे लौटाओ”
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी अपने बेबाक अंदाज और आत्मविश्वास के लिए जाने जाते हैं। कुछ समय पहले उन्होंने एक मंच से बड़े दावे के साथ चुनौती दी थी: “देश में एक भी ऐसी गाड़ी दिखा दीजिए जो E-20 पेट्रोल के इस्तेमाल से खराब हुई हो।
गडकरी साहब ने जब यह चुनौती दी थी, तब पूरा देश सुन रहा था। लेकिन अब देश को इस चुनौती का जवाब भी मिल गया है। अब सिर्फ एक प्रभावित गाड़ी ही सामने नहीं आई है, बल्कि देश की एक उपभोक्ता अदालत (कंज्यूमर कोर्ट) ने इस पर अपना ऐतिहासिक फैसला भी सुना दिया है। कोर्ट ने साफ तौर पर ऑटोमोबाइल कंपनी को आदेश दिया है कि या तो ग्राहक को बिल्कुल नई गाड़ी दी जाए, अन्यथा गाड़ी की पूरी कीमत (20 लाख रुपये से अधिक) ब्याज सहित वापस लौटाई जाए।
रायपुर का वह मामला, जिसने खोल दी दावों की पोल
यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का है। रायपुर के रहने वाले डॉ. प्रेमराज देबता ने जून 2024 में करीब 20 लाख रुपये की लागत से मारुति ग्रैंड विटारा (स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड) खरीदी थी। डॉ. देबता का रोज का सफर लगभग 150 से 200 किलोमीटर का था। देश में E-20 ईंधन (20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) को बढ़ावा दिए जाने की नीति के बीच उन्होंने इस आधुनिक गाड़ी पर भरोसा जताया था।
लेकिन महज पांच महीने बाद ही इस चमचमाती गाड़ी ने दम तोड़ना शुरू कर दिया:
शुरुआती खराबी: सबसे पहले कार के डैशबोर्ड पर ‘इंजन मालफंक्शन’ का अलर्ट आया और गाड़ी अचानक बंद हो गई।
कंपनी के बहाने: सर्विस सेंटर ने कभी पेट्रोल की गुणवत्ता को जिम्मेदार ठहराया, तो कभी फ्यूल टैंक की सफाई की। बाद में ग्राहक को बताया गया कि गाड़ी का इंजन पूरी तरह बदलना पड़ेगा, जिसमें करीब 5 लाख 30 हजार रुपये का खर्च आएगा।
दही जैसी सफेद परत: इंजन बदलने के बाद भी समस्या का अंत नहीं हुआ। गाड़ी दोबारा बंद हो गई। जब तकनीकी जांच की गई, तो पता चला कि कार के फ्यूल टैंक और इंजन के हिस्सों में ‘दही’ जैसी गाढ़ी सफेद परत जम गई थी, जो इथेनॉल के केमिकल रिएक्शन के कारण बनी थी।
आखिरकार परेशान होकर डॉ. देबता ने कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कंज्यूमर कोर्ट का सख्त रुख और ऐतिहासिक आदेश
जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (कंज्यूमर कोर्ट) ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से माना कि ग्राहक को ऐसी गाड़ी बेची गई जो व्यावहारिक रूप से E-20 ईंधन (पेट्रोल) के अनुकूल नहीं थी।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा
ऑटोमोबाइल कंपनी 45 दिनों के भीतर पीड़ित ग्राहक को उसी मॉडल की नई ‘E-20 कम्पैटिबल’ गाड़ी उपलब्ध कराए। यदि ऐसा संभव नहीं होता है, तो कंपनी ग्राहक को गाड़ी की पूरी कीमत (करीब 20.5 लाख रुपये) और उस पर लगने वाले अन्य कानूनी व मानसिक प्रताड़ना के हर्जाने का भुगतान करे।”
क्या बिना तैयारी के लागू हुआ E-20?
केंद्र सरकार देश में E-20 पेट्रोल को ईंधन के भविष्य के रूप में पेश कर रही है। इसके पीछे तर्क दिए जाते हैं कि इससे देश की तेल आयात पर निर्भरता घटेगी, किसानों को फायदा होगा और पर्यावरण स्वच्छ रहेगा। ये सभी तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन यहाँ कुछ बुनियादी और तीखे सवाल खड़े होते हैं:
तैयारी किसकी और जिम्मेदारी किसकी?: क्या सरकार और ऑटोमोबाइल कंपनियों ने यह सुनिश्चित किया कि सड़कों पर दौड़ रही हर गाड़ी इस नए ईंधन के रासायनिक प्रभाव को झेलने के लिए तैयार है?
सफेद परत का सच: इथेनॉल हवा से नमी (पानी) सोखता है, जिसके कारण गाड़ियों के फ्यूल सिस्टम में सफेद चिपचिपा पदार्थ बनने लगता है। इस तकनीकी खामी की भरपाई कौन करेगा?
आम आदमी की जेब पर डाका: यदि किसी नीति के ट्रायल और एरर (प्रयोगों) का हर्जाना देश के आम उपभोक्ता को अपनी मेहनत की कमाई से 5-5 लाख रुपये का इंजन बदलवाकर चुकाना पड़े, तो ऐसी नीतियों की पारदर्शिता पर सवाल उठना लाजिमी है।
गडकरी जी, अब जवाब का इंतजार है!
नितिन गडकरी जी ने जिस “एक सबूत” का इंतजार करने की बात कही थी, वह सबूत अब देश के सामने है। यह सिर्फ किसी नाराज ग्राहक का सोशल मीडिया पोस्ट नहीं, बल्कि देश की एक अदालत द्वारा प्रमाणित किया गया सच है।
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