राम मंदिर चंदा चोरी मामला, क्या विपक्ष सवाल भी न पूछे?

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अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला अब और तूल पकड़ चुका है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस मामले की नई-नई परतें खुलती नजर आ रही हैं।

विपक्ष ने इस पूरी घटना को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं और जवाब मांगे हैं। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सवालों का जवाब देने के बजाय सरकार राजनीतिक प्रतिक्रिया देने में अधिक रुचि दिखा रही है।

अब सवाल यह है कि आखिर विपक्ष का काम क्या है? क्या विपक्ष अब सवाल-जवाब भी न करे? लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका ही सरकार से जवाब मांगने और जनता के मुद्दों को उठाने की होती है। अगर सरकार के कार्यकाल में करोड़ों रुपये के चंदे में कथित गड़बड़ी या चोरी का मामला सामने आता है, तो विपक्ष का सवाल पूछना स्वाभाविक माना जाएगा।

आमतौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब विपक्ष आरोप लगाता है, तब सरकार तथ्यों और जांच के आधार पर जवाब देकर स्थिति स्पष्ट करती है। लेकिन इस मामले में विपक्ष का कहना है कि अब तक ऐसे सवालों के स्पष्ट उत्तर सामने नहीं आए हैं। इसी कारण यह विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है।

कुछ आलोचकों का यह भी मानना है कि सरकार इस मामले में किसी राजनीतिक विरोधी दल के व्यक्ति के नाम सामने आने का इंतजार कर रही है, ताकि पूरे विवाद का राजनीतिक जवाब दिया जा सके। हालांकि, यह केवल राजनीतिक आरोप हैं और जांच पूरी होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

लेकिन एक बात तय है कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस मामले में जनता जवाब चाहती है। मंदिर निर्माण के लिए देशभर से लोगों ने विश्वास के साथ योगदान दिया था। ऐसे में यदि उस धन के दुरुपयोग या चोरी के आरोप सामने आते हैं, तो लोगों का सवाल पूछना स्वाभाविक है। विश्वास एक बार टूट जाए तो उसे दोबारा स्थापित करने में वर्षों लग जाते हैं।

इस पूरे मामले में एक और बात चर्चा का विषय बनी हुई है। कई संत, महंत और महामंडलेश्वर अब तक इस मुद्दे पर खुलकर कुछ बोलते नजर नहीं आए हैं। श्रद्धालुओं के एक वर्ग का मानना है कि जब मामला करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास से जुड़ा है, तब धार्मिक नेतृत्व को भी अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए

फिलहाल सभी की नजर जांच पर टिकी हुई है। जनता जानना चाहती है कि आखिर इस मामले में जिम्मेदार कौन है और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी। क्योंकि यह केवल पैसों का मामला नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों के विश्वास और भावनाओं से जुड़ा प्रश्न भी है।

अब देखना यह होगा कि जांच एजेंसियां क्या निष्कर्ष निकालती हैं और सरकार जनता के सवालों का जवाब किस प्रकार देती है।

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