हिंदुस्तानियों के हित में प्रणाम! उदंत मार्त्तण्ड…

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हिंदी पत्रकारिता के 200 साल

हिंदुस्तानियों के हित में
प्रणाम! उदंत मार्त्तण्ड…

विजय मनोहर तिवारी ( कुलगुरु माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्विद्यालय )
कोई भी विश्वविद्यालय “केवल विद्यार्थियों के लिए’ है। हर सत्र को यादगार अनुभवों में एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय में ही नहीं बदला जाएगा तो यह काम कहाँ होगा? यह केवल डिग्री देने का निर्जीव ठिकाना नहीं है। उसके लिए सैकड़ों सरकारी और निजी विश्वविद्यालय हैं। मीडिया ठहरी हुई क्लासरूम टीचिंग से अधिक गतिशील न्यूजरूम के कामकाज का धड़कता हुआ विषय है। मुर्दा डिग्रियों के कब्रस्तान में मीडिया के पाठ्यक्रम फातिहा की तरह नहीं पढ़ाए जा सकते…

जनवरी में मेरा कोलकाता जाना हुआ। हिंदी के पहले समाचार पत्र “उदंत मार्त्तण्ड’ के 200 साल का प्रसंग मई में तय था। यह योजना थी कि मई में कोलकाता में ही दो दिन का स्मरण प्रसंग आयोजित किया जाए, जिसमें देश के शीर्षस्थ संपादकों के साथ “उदंत मार्त्तण्ड’ की जन्मभूमि को प्रणाम किया जाए। “प्रणाम उदंत मार्त्तण्ड’ का शीर्षक उपजा ही इसी विचार से था। भारतीय पत्रकारिता के अतीत के कुछ स्वर्णिम पृष्ठ पलटें जाएँ और तकनीक के साथ तेजी से फैलते आज के मीडिया के विषयों पर भी कुछ विमर्श हो।

दो सौ सालों के उपलब्ध महत्वपूर्ण अखबारों की एक प्रदर्शनी भी सजे और कुछ विशेष प्रकाशन भी किए जाएँ।

मैंने इस उद्देश्य से कोलकाता में कई लोगों से बातचीत की और यह भी विचार किया कि ऐसा कोई आयोजन कोलकाता में कहाँ किया जा सकता है? बीते दशकों में पश्चिम बंगाल के राजनीतिक वातावरण, कानून-व्यवस्था के हालातों की जो खबरें शेष भारत में आईं, उसे देखते हुए मुझे बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ जब अधिकतर लोगों ने “प्रणाम उदंत मार्त्तण्ड’ के प्रस्तावित प्रसंग का स्वागत किया किंतु कोलकाता के संभावित संकट भी सामने रख दिए।
सबने लगभग एक स्वर में कहा कि किसी सरकारी सभागृह या प्रांगण में तो भूल ही जाइए कि दिल्ली या भोपाल या लखनऊ से आकर कोई ऐसा आयोजन कर सकता है। किसी होटल या निजी परिसर को ले भी लिया जाएगा तो यह सुनिश्चित है कि सारी तैयारियों के बीच दो दिन पहले अचानक आपको सूचना मिलेगी कि यह आयोजन अचानक रद्द किया जा रहा है। तीन महीने में चुनाव घोषित हो सकते हैं। मई तक चुनावी वातावरण तपेगा और इस बार आरपार का संघर्ष है। एक बांग्लाभाषी पत्रकार मित्र ने विनम्रता के साथ सुझाया कि उदंत मार्त्तण्ड को प्रणाम करने के लिए “इस मौसम में’ बंगाल आने से बचिए।
अगर आप पिछले 15 या 45 साल में पश्चिम बंगाल किसी अध्ययन या रिपोर्टिंग के लिए नहीं गए हैं तो आप समझ ही नहीं सकते कि यह राज्य किस ढलान पर अनियंत्रित गति से आगे चला गया था। वहाँ कानून-व्यवस्था कैसी थी, राजनीतिक कार्यकर्ताओं का व्यवहार कैसा था, अपराधी तत्वों का बोलबाला किस स्तर पर था, महिलाओं की कैसी दुर्गति थी, घुसपैठियों के आसपास होने के अनुभव क्या होते हैं। माँ, माटी और मानुष केवल पोस्टरों पर चमकने वाले तीन शब्द थे और पोरिबर्तन का नारा कितना खोखला साबित हुआ था।
वो भी तब जब एक मातृशक्ति सत्ता की शक्तिपीठ पर आसीन की गई थी। बंगाल लोकतंत्र के सपनों को चकनाचूर करने की एक प्रयोगशाला बन गया था। पाप के घड़े बंगाल में कब के भर चुके थे।
ऐसे नाजुक हालात में नाहक मुश्किल में पड़ने की बजाए हमने बेहतर समझा कि दूर से ही “उदंत मार्त्तण्ड’ और उसके संपादक पत्रकार पूर्वज युगलकिशोर शुक्ल को प्रणाम कर लिया जाए।
इसलिए भोपाल में ही “प्रणाम उदंत मार्त्तण्ड’ के आयोजन का निर्णय हुआ। 8, 9, 10 मई को विश्वविद्यालय की परिधि से बाहर भारत भवन में। केवल हिंदी समाचार पत्रों का ही नहीं, भारतीय भाषाओं के विस्तृत संसार का एक उत्सव प्रसंग। 9 कार्टूनिस्टों सहित आठ भाषाओं के 60 संपादक, पत्रकार, लेखक, अध्येता तीन दिन यहाँ जुटे।
इनमें प्रिंट, टीवी, डिजिटल मीडिया के जाने-माने चेहरे भी थे।
आमतौर पर ऐसे आयोजनों में मंचों पर कुछ वक्ता बोलते हैं और सामने बैठे श्रोता केवल सुनते हैं और उठकर घर चले जाते हैं। हर व्याख्यान, भाषण, उपदेश और प्रवचन में यही होता है, जिनकी देश में बाढ़ आई हुई है और कान पके हुए हैं। विद्वान वक्ताओं के साथ विश्वविद्यालय के ढाई सौ विद्यार्थियों और डेढ़ सौ अध्यापकों ने तीन दिन के इस आयोजन को पूरे भारत भवन को एक सक्रिय प्रयोगशाला में बदल दिया। हर कोई एक न एक क्रिया में था, केवल श्रोता नहीं था।
एक समूह कार्टूनिस्टों की कार्यशाला में “हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ पर कार्टून बनता हुआ देख रहा था। एक समूह ने न्यूजरूम बनाकर आठ पेज का अखबार हर दिन निकाला। एक समूह ने शाम होते ही टीवी बुलेटिन जारी किए। एक और उत्साही समूह ने अपने प्रायोगिक अखबार का डिजिटल संस्करण खड़ा कर दिया। लगभग सारे अतिथि विद्वानों के पॉडकास्ट रिकॉर्ड किए गए। हर दिन 12 घंटे का यह फील्ड रिपोर्टिंग और प्रोडक्शन का शानदार प्रयोग बन गया, जिसमें विद्यार्थियों ने नोट्स लिए, सवाल किए, इंटरव्यू रिकॉर्ड किए, तस्वीरें खिंचवाई और अखबार-टीवी-रेडियो के लिए कुछ न कुछ सामग्री तैयार की।
एक विद्यार्थी के ही भाव से तीनों दिन विद्यार्थियों के बीच मैं नीचे बैठा और मैंने भी प्रश्न किए।
दो विशेष पुस्तकों की लोकार्पण लायक चुनिंदा प्रतियाँ हमें प्राप्त हुईं। इनमें पहली है पूर्व विद्यार्थियों का अनुभव संग्रह-“माखन के लाल’ और दूसरी है एक कॉफी टेबल बुक-“कार्टून कथा।’ पहले सत्र में इनके लोकार्पण के तुरंत बाद अगले सभी सत्रों में इन्हीं पुस्तकों से अतिथियों का स्वागत-सम्मान हुआ। विश्वविद्यालय ने सामान्यत: फूलमाला, बुके और लकड़ी-लोहे के स्मृति चिन्ह देना बंद कर दिए हैं, जिन्हें बाहर से आए अतिथि होटलों और गेस्ट हाऊसों में ही फेंक जाते हैं।
हम किताबों से स्वागत करते हैं, वही स्मृति चिन्ह हैं। अपने ही मंचों पर शॉल, श्रीफल, स्मृति चिन्ह अपने ही हाथों स्वीकार करने की परंपरा भी अब विविध भारती के भूले-बिसरे गीत हैं। इस विश्वविद्यालय का कुलगुरु बहुत जरूरी होने पर मंच का स्पर्श करता है, वह दूर पीछे कहीं विद्यार्थियों के बीच बैठकर सुनना ज्यादा पसंद करता है। वह जानता है कि एक दिन जिस पदनाम के आगे पूर्व लग जाए, वह उसका वास्तविक परिचय नहीं है।
विश्वविद्यालय की 36 वर्ष की यात्रा में पिछले 9 महीनों में दो प्रसंग ऐतिहासिक हुए। अगस्त में दादा माखनलाल चतुर्वेदी अपने 50 एकड़ के परिसर के ह्दय में एक भव्य प्रतिमा में प्रतिष्ठित हुए और दूसरा हिंदी के पहले समाचार पत्र का 200 साल का यह प्रसंग। यह सुयोग तीन साल पहले या तीन साल बाद भी आ सकता था। तब भी कोई न कोई इसे मनाता ही। मगर जब यह अवसर आना था, नियति ने थोड़े समय के लिए इस विश्वविद्यालय के गर्भगृह में सेवा-चाकरी के लिए मुझे चुना।
इसे मैं युगलकिशोर शुक्ल और माखनलाल चतुर्वेदी का ही आशीर्वाद कहूँगा।
कोई भी विश्वविद्यालय केवल विद्यार्थियों के लिए है। हर सत्र को यादगार अनुभवों में एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय में ही नहीं बदला जाएगा तो यह काम कहाँ होगा? यह केवल डिग्री देने का ठिकाना नहीं है। उसके लिए सैकड़ों सरकारी और निजी विश्वविद्यालय हैं। मीडिया ठहरी हुई क्लासरूम टीचिंग से अधिक गतिशील न्यूजरूम के कामकाज का विषय है। डिग्रियों के कब्रस्तान में मीडिया के पाठ्यक्रम फातिहा की तरह नहीं पढ़ाए जा सकते।
200 पहले छपे और केवल 79 अंकों में ही बंद हो गए हिंदी के एक महान अखबार के दूरदर्शी संपादक ने पहले ही अंक के पहले पृष्ठ की पहली ही पंक्ति में भारत में सामग्री के प्रकाशन-प्रसारण का लक्ष्य स्पष्ट कर दिया था-“हिंदुस्तानियों के हित के हेत।’ यही पाँच शब्द तीनों दिन “प्रणाम उदंत मार्त्तण्ड’ का मूलमंत्र बने। तीनों दिन भारत केंद्रित विषयों पर तीन विचारोत्तेजक सत्रों में आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण, राज्यसभा के उपसभापति हम सबके प्रिय संपादक आदरणीय हरिवंश और प्रसिद्ध निर्देशक-अभिनेता डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के प्रेरक संवाद हुए।
हमने विजयदत्त श्रीधर की तीन खंडों में आई पुस्तक “समग्र भारतीय पत्रकारिता’ के बहाने पत्रकारिता के स्वर्णिम पृष्ठ भी टटोले और पीटीआई के प्रत्यूष रंजन के साथ तकनीक के बढ़ते प्रभाव की चिंताएँ भी रेखांकित कीं। अमिताभ अग्निहोत्री ने आम आदमी की भाषा का महत्व बताया तो हर्षवर्धन त्रिपाठी, नगमा, सईद अंसारी, प्रतीक त्रिवेदी और बृजेशकुमार सिंह जैसे जाने-पहचाने चेहरों ने आज के समय की जरूरतों का ध्यान दिलाया। विष्णु प्रकाश त्रिपाठी, उदय माहूरकर, राजेंद्र शर्मा, प्रफुल्ल केतकर, शैलेष पांडे, हितेश शंकर, डॉ. कृपाशंकर चौबे, शरद गुप्ता, विकास मिश्र, प्रवीण शर्मा, उदयकुमार, अनुज खरे, राशिद किदवई, सलमान रावी, जयंती रंगनाथन और सी. जयशंकर बाबु जैसे अनुभव संपन्न अध्येता  विद्वानों ने मीडिया की मुश्किलों का फलक खोला और समाधान के संकेत दिए
मध्यप्रदेश के प्रतिष्ठित पत्रकारों ने इस विमर्श में आकर अपनी सहभागिता दर्ज कराई। कार्टून कला को हाशिए से भी बाहर जाता हुआ देख रहे शीर्षस्थ कार्टूनिस्टों ने भारत भवन के प्रांगण को पहली बार देश के ख्यातनाम कार्टूनिस्टों की रचनाओं से सुसज्जित देखा और कैनवास पर रेखाएँ खींची। यह एक यज्ञ में अर्पित हरेक की आहुतियाँ थीं। दिल्ली, सागर और इंदौर के अनेक मित्र आमंत्रण पत्र की प्रतीक्षा किए बिना ही आए।
कोलकाता लौटते हैं। थोक के भाव मुस्लिम वोटरों से एकतरफा तय होने वाली 90 से अधिक सीटों और बाकी पर सियासी मजहबी माफिया मकड़जाल को देखते हुए लगता नहीं था कि बंगाल का ऊँट किस करवट बैठेगा-कटेगा मगर बदलाव की विकट बेचैनी से भरे एक समाज को मैंने जनवरी की यात्रा में देखा। 2010 के बाद मैं आठ बार बंगाल गया हूँ। केवल कोलकाता में नहीं, कोने-कोने में। एक पंक्ति में जान लीजिए कि सियासी-सामाजिक-आर्थिक-आपराधिक-मजहबी लिहाज से वह भारत का एक और राज्य नहीं रह गया है। इसलिए दूर रहकर कुछ भी कहने के पहले किसी दिवास्वप्न में मत रहिए।
घर में कूड़े की अभी-अभी हुई सफाई का मतलब यह कतई नहीं है कि दोपहर तक कचरा फिर नहीं आ जाएगा मगर यह स्वीकार करना ही होगा कि घर के सब लोगों ने मिलकर सुबह-सुबह कूड़ा साफ करके बाहर कर दिया है!

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