AIWar

दुनिया के कारखाने-कारोबार फौजी सामान बनाने में जुटे..

Share Politics Wala News

दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : 6 मई 2026

-सुनील कुमार

दो-चार दिनों के भीतर यूक्रेन को खत्म कर देने के दावे के साथ रूस ने जो हमला किया था, उसे जंग में तब्दील हुए चार बरस हो चुके हैं। इसी तरह फिलीस्तीन के गाजा पर इजराइली हमले, लेबनान और ईरान पर इजराइली हमले, और सबसे ताजा, ईरान पर अमरीकी हमले को लंबा खिंचते देखा जा सकता है। इसी के साथ-साथ दुनिया में जंग का समान, और हथियार बनाने वाले कारखाने भी बढ़ते जा रहे हैं, और वे रात-दिन काम कर रहे हैं। फिर ट्रम्प की मेहरबानी से नाटो देशों का एक अलग मोर्चा खुल गया है।

उसने अमरीकी राष्ट्रपति का दूसरा कार्यकाल शुरू करते ही, या अधिक सही यह कहना होगा कि अपने चुनाव अभियान के दौरान ही नाटो देशों को यह साफ कह दिया था कि उनके हिस्से की फौजी तैयारियों पर अमरीका अब और खर्च नहीं करेगा। उसने साफ-साफ कहा कि नाटो सदस्य अपने देश की हिफाजत के लिए अमरीकी फौजों पर निर्भर न करें, और अपने बजट का अधिक बड़ा हिस्सा अपनी फौजी तैयारियों पर लगाएं।

इसका असर भी हुआ, ट्रम्प के तेवर देखकर, उसकी नाटो छोड़ देने की धमकी को देखकर, उसके नाटो-सदस्यों पर फौजी हमले की धमकी को देखकर योरप के नाटो सदस्य देशों ने अमरीका के बिना अपनी हिफाजत की तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसकी वजह से भी योरप के देशों में फौजी-कारखानों का काम बहुत बढ़ गया है। फिर घरेलू उत्पादन के अलावा योरप जिन देशों से फौजी सामान खरीदता है, उन देशों में भी हथियारों, और बाकी ऐसे सामानों के कारखाने लगातार चल रहे हैं।

एक तरफ योरप रूस के मुकाबले यूक्रेन को फौजी मदद देने के लिए बहुत से हथियार लगातार खरीद रहा है, दूसरी तरफ अमरीका इजराइल को देने के लिए, और ईरान पर बरसाने के लिए हथियार लगातार बनाते चल रहा है। जैसा कि हथियारों का मकसद होता है, हर हथियार तबाही लेकर आता है। उसकी कोई और उत्पादकता नहीं होती, और वह इंसानी जिंदगियों, शहरी या दूसरे किस्म के ढांचों, या दूसरे देश के हथियारों को तबाह ही करता है। मतलब यह कि हथियार और जंग की आर्थिक और सामाजिक उत्पादकता तबाही के अलावा और कुछ नहीं रहती।

आज रूस और अमरीका, ये दो महाशक्तियां अलग-अलग मोर्चों पर हथियार झोंक रही हैं, और बड़े पैमाने पर उन्हें बनाते भी चल रही हैं। तबाही के मकसद वाली यह उत्पादकता दुनिया के बाकी उत्पादक काम-धंधों को पीछे छोड़ रही है। आज अमरीका, इजराइल, और ईरान एक बहुत ही कमजोर किस्म का युद्धविराम मानकर चल रहे हैं, तो दुनिया यह जानती और मानती है कि ये देश अधिक से अधिक हथियारों के उत्पादन में लगे हुए हैं। दुनिया की आर्थिक गतिविधियां इंसानी जिंदगियों की तरफ से हटकर इंसानी मौतों की तरफ मुड़ गई हैं। इसका दुनिया में क्या असर पड़ेगा, इससे समझने के लिए अर्थशास्त्री होना जरूरी नहीं है।

दुनिया के ऐसे नजारे और माहौल के बीच एक और बात बिल्कुल साफ है कि जंग का अंदाज यूक्रेन से बिल्कुल बदल गया है। अब बाकी किस्म की फौज या हथियारों के मुकाबले ड्रोन इस जंग में सबसे अधिक कारगर और कामयाब हथियार साबित हुए हैं। अमरीका के सबसे महंगे फौजी विमानों, फौजी मिसाइलों, और बमों के मुकाबले ईरान ने मानो मिट्टी के मोल बनाए हुए ड्रोन, या सस्ती मिसाइलों से जो मुकाबला किया है, तो उससे ट्रम्प हक्का-बक्का भी हो गया है, और अपने ही देश को मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचा है। ऐसे में चूंकि ईरान और रूस के बीच गहरे रिश्ते हैं, तो खाड़ी के जिन देशों पर ईरान निशाना साध रहा है, उनमें से कुछ देश यूक्रेन से मदद ले रहे हैं, क्योंकि रूस के खिलाफ उसने अपने सस्ते ड्रोन की टेक्नॉलॉजी से इस महाशक्ति को एक किस्म से रोक ही दिया है।

अब इस पूरे जंगी कारोबार के एक और पहलू को देखने की जरूरत है। आज परंपरागत हथियारों से ऊपर उठकर ड्रोन, रोबट, और एआई का इस्तेमाल खुलकर हो रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ अमरीका जैसे देश में फौजी हथियार बनाने के लिए बहुत सारे स्टार्टअप सरकार से ठेके पा रहे हैं। वे सस्ते ड्रोन बनाने से लेकर, लेजर-हथियारों पर काम कर रहे हैं, और एआई का बड़ा इस्तेमाल कर रहे हैं। अमरीकी सरकार इन सबको ऐसे अलग-अलग हथियार बनाने के बड़े-बड़े ठेके देकर अधिक तैयारी कर रही है।

दिलचस्प बात यह है कि एंथ्रोपिक नाम की जिस कंपनी ने अपने सबसे ताकतवर एआई मॉडल का उपयोग जंग में करने देने से मनाही कर दी, उसे अमरीकी सरकार ने फौजी ठेकों से बाहर भी कर दिया है। इस तरह आज पश्चिमी दुनिया के अधिकतर देश अपनी फौजी तैयारियों पर अधिक पूंजीनिवेश कर रहे हैं, अधिक हमलों के लिए अपनी फौजों को अधिक लैस कर रहे हैं, और नए-नए हथियारों की तरफ बढ़ भी रहे हैं। आज दुनिया में एआई के बाद फौजी-उद्योग सबसे अधिक तेजी से बढऩे वाला कारोबार बन गया है। अब न सिर्फ अब तक प्रचलित हथियारों का अंधाधुंध उत्पादन हो रहा है, बल्कि नई टेक्नॉलॉजी के आविष्कार, और उसके विकास पर भी अनुपातहीन पैसा जा रहा है।

हमारे नियमित पाठकों को यह पता होगा कि हम लंबे समय से यह बात कहते आ रहे हैं कि आने वाले जंग हथियारों के बजाय साइबर-जंग होंगे, और एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते दो देश एक-दूसरे की सारी की सारी डिजिटल, साइबिर, ऑनलाइन, व्यवस्था को खत्म करने का काम करेंगे। अब दुनिया में यह साफ होते चल रहा है कि एआई के इस्तेमाल से कोई देश, या कोई समूह ऐसा काम अधिक आसानी से कर सकेंगे। जब एक कमरे में बैठे कुछ लोग कम्प्यूटरों और एआई के इस्तेमाल से दूसरे देश की रोजाना की जिंदगी, उसकी अर्थव्यवस्था, सबको आसानी से खत्म कर सकेंगे,

तो फिर किसी सरहद या मोर्चे पर बमवर्षक विमानों या जहाजों से, मिसाइलों और ड्रोन से हमले क्यों किए जाएंगे? एआई और कम्प्यूटर से ज्यादा सस्ता और क्या रहेगा? आज जब एक अमरीकी कंपनी अपने खुद के विकसित एआई मॉडल से सहमी हुई है कि उसकी विनाशकारी ताकत इतनी अधिक है कि गलत हाथों में पडक़र वह दुनिया को तबाह कर सकता है, तो यह मानना निहायत नासमझी की बात होगी कि अब तक अमरीकी सरकार किसी न किसी कंपनी से अब तक ऐसी ताकत हासिल नहीं कर चुकी होगी।

अब दुनिया में परंपरागत हथियारों की जंग को देख लिया है कि एक महाशक्ति रूस चार बरस बाद भी यूक्रेन को खत्म करने के करीब भी नहीं है, इधर अमरीका ईरान को अब तक दो दर्जन बार अलग-अलग अल्टीमेटम दे चुका है, और खुद ही यूटर्न ले-लेकर चकरघिन्नी बना हुआ है। हथियारों की जंग शुरू करना आसान रहता है, उसे निभाना और जारी रखना बड़ा मुश्किल रहता है। इस एक बात को देखते हुए भी हमारा यह मानना है कि दुनिया में आज फौजी इस्तेमाल के लायक एआई पर घोषित या अघोषित रूप से बहुत बड़ा पूंजीनिवेश हो चुका होगा,

क्योंकि महाशक्तियां ही नहीं, दूसरे देशों को भी यह हथियार अधिक सस्ता लगेगा, और अधिक कारगर भी रहेगा। पल भर में एक कमरे में बैठे-बैठे किसी दुश्मन देश में पूरी बिजली ठप्प, पूरा फोन-इंटरनेट ठप्प, बैंकिंग बंद, ट्रैफिक सिग्नल और एयर ट्रैफिक कंट्रोल बंद, मोबाइल ऐप, और भुगतान के बाकी तरीके बंद, किसी देश को गृहयुद्ध में झोंकने के लिए इससे अधिक कुछ तो नहीं लगता है। इसलिए अब दुनिया उत्पादक-उत्पादकता से बिल्कुल अलग, गैरउत्पादक जंगी-कारोबार की तरफ मुड़ चुकी है, और जाहिर तौर पर इसकी मार दुनिया के सबसे गरीब पर सबसे अधिक होगी, जैसी कि ईरान पर अमरीकी-इजराइली हमले से पड़ी है। आज पेट्रोल-डीजल, गैस के अलावा दुनिया भर में खाद का जो संकट आया हुआ है, वह सीधे-सीधे अनाज की कमी और भूख तक ले जाने वाला है। जंग के कारोबार को भूख से मौत से कुछ लेना-देना नहीं रहता।

यह भी पढ़ें- हिंदुस्तानियों के हित में प्रणाम! उदंत मार्त्तण्ड…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *