#POliticswala Desk
दिल्ली। बीबीसी की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, मध्य-पूर्व के इस भीषण संघर्ष में पाकिस्तान की मध्यस्थ की भूमिका ने दुनिया के कई देशों को हैरान कर दिया है. हालांकि, बारीकी से देखने पर यह इतना भी चौंकाने वाला नहीं लगता. इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख, फील्ड मार्शल असीम मुनीर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच के निजी समीकरण हैं. ट्रंप अक्सर मुनीर को अपना “पसंदीदा” फील्ड मार्शल कहते हैं और सार्वजनिक रूप से यह मान चुके हैं कि मुनीर ईरान को “बाकी लोगों से बेहतर” समझते हैं.
पाकिस्तान और ईरान के बीच लगभग 900 किलोमीटर लंबी सीमा साझा होती है और दोनों देशों के बीच गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं, जिसे पाकिस्तान “भाईचारे वाला” रिश्ता बताता है. गौर करने वाली बात यह भी है कि पाकिस्तान की ज़मीन पर कोई अमेरिकी एयरबेस नहीं है और खाड़ी के अन्य मध्यस्थों के विपरीत, पाकिस्तान अब तक इस युद्ध में सीधे तौर पर नहीं घसीटा गया है.
अमेरिका और ईरान के बीच शांति बहाल होना पाकिस्तान के अपने हित में भी है. हालांकि, विशेषज्ञों ने इस पर सवाल भी उठाए हैं कि जो देश खुद अफगानिस्तान और भारत जैसे पड़ोसियों के साथ तनाव में उलझा हो, वह शांतिदूत की भूमिका कैसे निभा सकता है. पिछले साल ही भारत के साथ तनाव के कारण परमाणु टकराव का डर पैदा हो गया था और फिलहाल पाकिस्तान अफगानिस्तान में बमबारी कर रहा है.
इसके बावजूद, पाकिस्तान इस समय एक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है. वह दोनों पक्षों के बीच संदेश भेज रहा है, मुस्लिम देशों के विदेश मंत्रियों की मेजबानी कर रहा है और कूटनीतिक फोन कॉल्स के ज़रिए सक्रिय है.
खोने के लिए बहुत कुछ
अटलांटिक काउंसिल के सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन ने बीबीसी को बताया कि मध्य-पूर्व के बाहर पाकिस्तान शायद ऐसा देश है जिसका इस जंग में बहुत कुछ दांव पर लगा है. पाकिस्तान अपनी तेल ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जिसका बड़ा हिस्सा ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ से होकर आता है.
ईरान द्वारा इस रास्ते को प्रभावी ढंग से बंद किए जाने का असर पाकिस्तान पर दिखने लगा है. मार्च की शुरुआत में ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 20% की वृद्धि की गई और ईंधन बचाने के लिए सरकारी कर्मचारियों के लिए चार दिन का कार्य सप्ताह लागू कर दिया गया है.
कराची के आईबीए में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर फरहान सिद्दीकी का कहना है कि यदि युद्ध जारी रहा, तो पाकिस्तान पर आर्थिक दबाव बेतहाशा बढ़ जाएगा.
इसके अलावा, सुरक्षा संबंधी चुनौतियां भी कम नहीं हैं. सितंबर 2025 में पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता किया था, जिसके तहत किसी भी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा. सवाल यह है कि यदि सऊदी अरब युद्ध में शामिल होता है, तो क्या पाकिस्तान को भी कूदना पड़ेगा. प्रोफेसर सिद्दीकी के अनुसार, यदि पाकिस्तान सऊदी अरब की ओर से जंग में शामिल होता है, तो उसकी पूरी पश्चिमी सीमा असुरक्षित हो जाएगी.
पाकिस्तान पहले से ही अफगानिस्तान के साथ “पूर्ण युद्ध” जैसी स्थिति में है. इसके साथ ही घरेलू स्तर पर जनभावनाओं का भी दबाव है. ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत के बाद पाकिस्तान में उग्र विरोध प्रदर्शन हुए थे. अमेरिका में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी का कहना है कि पाकिस्तान की जनता का झुकाव पूरी तरह ईरान के पक्ष में है और नीति निर्माता इस बात को लेकर बेहद संवेदनशील हैं.
कूटनीतिक साख और जोखिम
मलीहा लोधी के अनुसार, यह एक “हाई-स्टेक” डिप्लोमेसी है, जिसमें जोखिम बड़े हैं तो इनाम भी बड़ा है. यदि पाकिस्तान सफल होता है, तो वह वैश्विक कूटनीति के शिखर पर पहुंच जाएगा. पाकिस्तान ने ट्रंप को खुश करने के लिए भी कई कदम उठाए हैं, जैसे 2025 के भारत-पाकिस्तान संकट के दौरान ट्रंप के हस्तक्षेप के लिए उनका नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करना. कुगेलमैन का कहना है कि पाकिस्तान ने ट्रंप की तारीफ करके वाशिंगटन में अपनी स्थिति मज़बूत की है. पाकिस्तान की सबसे बड़ी ताकत यह है कि ईरान उसे इजरायल समर्थक या कट्टर अमेरिका समर्थक के रूप में नहीं देखता.
हालांकि, इस मध्यस्थता के विफल होने का खतरा भी बना हुआ है. कुगेलमैन चेतावनी देते हैं कि यदि दोनों पक्ष और अधिक ताकत के साथ युद्ध शुरू कर देते हैं, तो पाकिस्तान पर “नादान” होने के आरोप लग सकते हैं. फिलहाल पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार चीन के दौरे पर हैं, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की गहरी खाई को देखते हुए किसी ठोस समझौते की उम्मीद फिलहाल कम ही नज़र आती है.
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