कांग्रेस भले ही दिनों दिन कमजोर हो रही हो लेकिन उनके पास वकीलों की मजबूत टीम है… जो बड़े से बड़े मामलों में पार्टी नेताओं को राहत दिलवा ही देते हैं…
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मध्य प्रदेश: की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है, जहां भोपाल मध्य से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसमें उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित करने के निर्देश दिए गए थे। यह पूरा मामला भोपाल स्थित इंदिरा प्रियदर्शनी कॉलेज के संचालन में कथित फर्जी सेल डीड से जुड़ा हुआ है।
दरअसल, इस विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब इंदिरा प्रियदर्शनी कॉलेज की मान्यता को लेकर जांच की गई। कॉलेज का संचालन अमन एजुकेशन सोसाइटी द्वारा किया जाता है, जिसमें कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद सचिव के पद पर हैं। यह कॉलेज भोपाल के खानूगांव इलाके में स्थित है। मामले में आरोप लगाए गए थे कि कॉलेज के संचालन के लिए फर्जी दस्तावेजों के आधार पर एनओसी और मान्यता प्राप्त की गई थी।
इस पूरे मामले की शिकायत पूर्व विधायक ध्रुवनारायण सिंह द्वारा की गई थी। शिकायत के आधार पर उच्च शिक्षा विभाग ने जांच करवाई। जांच के बाद आयुक्त उच्च शिक्षा ने पाया कि अमन एजुकेशन सोसाइटी द्वारा कॉलेज संचालन के लिए प्रस्तुत किए गए कुछ दस्तावेज संदिग्ध हैं। जांच में यह भी कहा गया कि कथित रूप से कूटरचित दस्तावेजों के जरिए सेल डीड तैयार करवाई गई और उसे पंजीयन कार्यालय में दर्ज कराया गया।
जांच के आधार पर मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा विभाग ने 9 जून 2025 को इंदिरा प्रियदर्शनी कॉलेज की मान्यता निरस्त करने का आदेश जारी कर दिया। इसके बाद कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने इस आदेश को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक सख्त रुख अपनाया। अदालत ने भोपाल पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि आरिफ मसूद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। इसके साथ ही पुलिस महानिदेशक को पूरे मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का आदेश भी दिया गया। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में काफी चर्चा शुरू हो गई थी।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ आरिफ मसूद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट में उनकी ओर से वरिष्ठ वकील और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा ने पैरवी की। सुनवाई के दौरान उन्होंने अदालत को बताया कि हाईकोर्ट ने सरकार का पक्ष सुने बिना ही एफआईआर दर्ज करने और एसआईटी गठित करने का आदेश दे दिया, जो न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज से उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल चंदूरकर शामिल थे, ने मामले की सुनवाई के दौरान इस बात पर आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि जब तक राज्य सरकार का पक्ष सामने नहीं आ जाता, तब तक इस तरह का अंतरिम आदेश देना जरूरी नहीं था। कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट द्वारा दिए गए कड़े निर्देश पहली नजर में उचित नहीं लगते।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और आरिफ मसूद को बड़ी राहत मिल गई। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और एसआईटी गठित करने की प्रक्रिया पर रोक लग गई है।
इस फैसले को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना सभी पक्षों को सुने इस तरह के आदेश देना उचित नहीं है। वहीं विपक्षी दल इस पूरे मामले को लेकर सवाल उठाते रहे हैं और कॉलेज से जुड़े दस्तावेजों की जांच की मांग करते रहे हैं।
इंदिरा प्रियदर्शनी कॉलेज से जुड़ा यह विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, क्योंकि कॉलेज की मान्यता रद्द किए जाने का मामला और उससे जुड़े अन्य पहलू अभी भी कानूनी प्रक्रिया के दायरे में हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से फिलहाल कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद को बड़ी राहत जरूर मिल गई है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है और जांच से जुड़े तथ्य अदालत के सामने किस रूप में सामने आते हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस मामले ने एक नया मोड़ ले लिया है, जिसने मध्य प्रदेश की राजनीति और कानूनी हलकों में एक बार फिर बहस छेड़ दी है।
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