होली के रंग में सियासी संकेत: क्या ‘मोहन मंत्रिमंडल’ में तय है बड़ा फेरबदल?
मध्यप्रदेश की राजनीति में होली के साथ-साथ बदलाव के रंग भी गहराने लगे हैं। गुड़ी पड़वा और हिंदू नववर्ष के आसपास मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव की अटकलें तेज हो गई हैं। बड़वानी में हुई प्रदेश की पहली कृषि कैबिनेट बैठक ने इन अटकलों को और हवा दे दी। बैठक से दो वरिष्ठ मंत्री प्रहलाद पटेल और कैलाश विजयवर्गीय नदारद रहे। उनकी गैरमौजूदगी ने यह संदेश दिया कि सरकार के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है।
तीन दिन पहले दिल्ली में हुई अहम बैठकों के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल बढ़ी है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल की अलग-अलग मुलाकातें हुईं। उसी दिन मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी शाह से मुलाकात की। तीनों नेताओं की एक ही दिन दिल्ली में मौजूदगी को सामान्य शिष्टाचार भेंट नहीं माना जा रहा। इसके तुरंत बाद कृषि कैबिनेट से दोनों मंत्रियों की दूरी ने यह संकेत दिया कि कुछ बड़ा राजनीतिक निर्णय आकार ले रहा है।
प्रहलाद पटेल पंचायत और ग्रामीण विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री हैं। कृषि से जुड़ी बैठक में उनकी मौजूदगी अपेक्षित थी। वहीं कैलाश विजयवर्गीय मालवा-निमाड़ क्षेत्र के बड़े नेता माने जाते हैं। निमाड़ में आयोजित बैठक से उनका अनुपस्थित रहना भी राजनीतिक संदेश दे गया। खास बात यह रही कि दोनों किसी अपरिहार्य सरकारी कार्य में व्यस्त नहीं थे। विजयवर्गीय बैठक के दौरान अलीराजपुर में भगोरिया मेले का आनंद लेते दिखाई दिए, जो बड़वानी से ज्यादा दूर नहीं है। प्रहलाद पटेल भी सामान्य राजनीतिक गतिविधियों में ही व्यस्त बताए गए।
भाजपा के भीतर चर्चा है कि संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल में इन दोनों नेताओं की भूमिका बदल सकती है। ऐसे में उनकी कैबिनेट से दूरी को संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। कैलाश विजयवर्गीय पहले भी कुछ कैबिनेट बैठकों से दूर रह चुके हैं। हालांकि तब उन्होंने महाराष्ट्र चुनाव में व्यस्तता का कारण बताया था, लेकिन इस बार ऐसा कोई कारण सामने नहीं आया।
पिछले कुछ समय से विजयवर्गीय अपनी ही सरकार के फैसलों पर असहमति जताते नजर आए हैं। इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी से मौत के मामले में उन्होंने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए। विधानसभा में दिए गए उनके जवाब पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी और उसे तथ्यहीन बताया। इसके बाद विजयवर्गीय ने अफसरों पर साजिश का आरोप लगाया और विभागीय अधिकारियों से नाराजगी जताई। बताया जाता है कि इस मुद्दे पर प्रशासनिक स्तर पर भी तनातनी देखी गई।
प्रहलाद पटेल सार्वजनिक रूप से उतने मुखर नहीं रहे, लेकिन उनके भी असंतोष की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में सुनाई देती रही हैं। कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि प्रदेश की सत्ता के भीतर समीकरण बदल रहे हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव अपने तरीके से टीम गठित करने के संकेत दे चुके हैं—‘मेरी कैबिनेट, मेरी मर्जी’ वाला संदेश अब खुलकर सामने आता दिख रहा है।
आने वाले दिनों में यदि मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल होता है तो यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि प्रदेश भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन का नया अध्याय भी साबित हो सकता है। फिलहाल होली के रंगों के बीच सियासी रंग और गहरे होते दिखाई दे रहे हैं।
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