85 विधायक और 12 लोकसभा सांसद, 4 राज्यसभा सांसद, केंद्र सरकार की एक चाबी उनसे पास भी है फिर नीतीश आखिर दबाव में क्यों हैं?
नीतीश का बीजेपी के सामने झुकना समझ से परे है. ऐसा लगता है कि भाजपा के पास उनकी कोई दुखती रग है, या फिर नीतीश के करीबियों ने अपने स्वार्थ के लिए भाजपा से समझौता कर लिया है.”
नि’हत्थे नीतीश !
नीतीश कुमार के बिहार छोड़ राज्यसभा जाने के फैसले ने पहली नजर में चौंकाया। एक सीएम जो पूरे वक्त कुर्सी के लिए पलटी मारता रहा आज कुर्सी की तरफ पीठ करके खड़ा हो गया। ये आसानी से गले नहीं उतरता। दरअसल इस राजनीतिक युद्ध में भाजपा के सामने नीतीश निहत्थे हो गए। उनके अपने नेता भाजपा के खेल में शामिल हो गए और दिल्ली ने उनकी दुखती रग पकड़ ली। 20 साल तक लालू नीतीश को हथियार डालने को मजबूर करने वाला
नेता आज निहत्था, सबसे किनारे खड़ा है।
ये साफ़ किया कि भाजपा ने पहले नीतीश को
पटना। दिल्ली। होली का रंग और खुमारी अभी उतरी भी नहीं थी कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट करके अपनी तरफ से यह साफ कर दिया कि वे राज्यसभा जा रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वे अब बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। हमेशा अपने पलटीमार फैसलों से चौकाने वाले नीतीश कुमार ने इस बार तो पलटी नहीं शीर्षासन ही कर दिया। अब तक मुख्यमंत्री पद के लिए किसी भी स्तर पर समझौते को तत्पर नीतीश ने इस बार मुख्यमंत्री
पद छोड़ने की अभिलाषा जताई।
अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा कि वे इसलिए राज्यसभा जा रहे हैं, क्योंकि अब तक उन्होंने तीन सदनों- लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद का प्रतिनिधित्व किया है. इस चौथे और उच्च सदन में जाने की उनकी अभिलाषा शेष थी, इसलिए वे वहां जा रहे हैं। नीतीश कुमार पहले भी ऐसी इच्छा जाहिर करते रहे हैं , हालांकि अब यह सोशल मीडिया पोस्ट बिहार की जनता के लिए उनका आधिकारिक स्पष्टीकरण है। मगर सवाल यह है कि महज तीन महीने पहले बंपर जीत हासिल कर दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार, जिनकी पार्टी के पास 85 विधायक, 12 लोकसभा और चार राज्यसभा सांसद हैं,
जिनके सहारे केंद्र की सरकार भी चल रही है। उन्होंने अचानक बिहार की सत्ता छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला क्यों लिया?
माना जाता है कि बिहार ही नहीं, केंद्र की सत्ता की चाबी भी उनके पास है। अपनी जाति के अलावा उन्हें राज्य की 36 फीसदी अतिपिछड़ी जातियों और 50 फीसदी महिलाओं का अपार समर्थन प्राप्त है. क्या यह महज राज्यसभा जाने की उनकी ‘अभिलाषा’ भर थी या इसके पीछे कोई और कहानी भी है? बिहार में राजनीति के जानकारों को उनके स्पष्टीकरण के बावजूद यह कहानी इसलिए असहज लग रही है, क्योंकि महज दो दिन पहले तक उनके राज्यसभा जाने की कोई चर्चा नहीं थी होली के एक दिन पहले तक सबकुछ तय हो चुका था। जनता दल यू की तरफ से दो नाम पक्के हैं. पहला रामनाथ ठाकुर, जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेटे हैं और पिछले दो टर्म से राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वे केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं.
दूसरा नाम खुद नीतीश कुमार के बेटे निशांत का था। उनके एक-सवा साल से राजनीति में आने और अपने पिता की विरासत संभालने की चर्चा थी। पिछले दिनों इन चर्चाओं को तब और बल मिला जब नीतीश के करीबी दो मंत्रियों, श्रवण कुमार और अशोक कुमार चौधरी ने मीडिया के सामने पुष्टि कर दी कि इस होली के बाद निशांत का राजनीति में आना तय हो गया है। मगर तीन मार्च के तीसरे पहर सीएम हाउस का माहौल बदलने लगा। जद यू की राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची आने में देर होने लगी और अंदरखाने से खबर मिली कि भाजपा ने संदेश भेजा है कि नीतीश जी को अब कुर्सी छोड़ देनी चाहिए।
भाजपा से मिले संदेश के बाद नीतीश असहज हो गए थे। यह तय था कि भाजपा और जद यू के बीच सत्ता का हस्तांतरण होगा, मगर इस तरह अचानक होगा, इसके लिए वे मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। ऐसे में उम्मीदवार की घोषणा की जगह यह मंथन शुरू हो गया कि आगे की रणनीति क्या हो. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा से बीच का रास्ता निकालने के लिए कहा गया।
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से बात करके अगले दिन (होली के दिन, 4 मार्च को) जब संजय कुमार झा नीतीश से मिलने पहुंचे, तो मुख्यमंत्री इस बात के लिए सहमत हो गए कि निशांत के बदले वे खुद राज्यसभा जाएंगे और निशांत को जल्द पार्टी और सरकार में भूमिका दी जाएगी। मगर खबर यह भी थी कि नीतीश इस फैसले से बहुत खुश नहीं हैं। उनके करीबी भी अचानक हुए इस फैसले को लेकर सहज नहीं हो पा रहे थे. .
जैसे ही जनता दल के नेताओं को पता चला कि नीतीश को राज्यसभा भेजे जाने का फैसला हो चुका है, पार्टी का एक धड़ा उदास नजर आने लगा। देर शाम तक जब सीएम हाउस में पार्टी के सीनियर नेता सत्ता हस्तांतरण की शर्तों को अपनी तरफ से फाइनल कर रहे थे, पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता उनके आवास के आगे जुटने लगे। धीरे-धीरे हवा में ये आरोप तैरने लगे कि नीतीश के कुछ करीबी नेताओं ने अपने फायदे के लिए पार्टी और बिहार का सौदा कर लिया है। पार्टी कार्यकर्ता संजय झा और ललन सिंह के खिलाफ नारे लगाने लगे। नाराज कार्यकर्ताओं नेदफ्तर में तोड़फोड़ तक कर दी है.
विजय चौधरी जैसे नीतीश के करीबी नेताओं ने जरूर यह कहकर माहौल को शांत करने की कोशिश की कि जो कुछ हो रहा है, नीतीश जी की मर्जी से हो रहा है। मगर जमीनी कार्यकर्ताओं ने इस पर भरोसा नहीं किया। खासतौर पर जब यह खबर आई कि गृह मंत्री अमित शाह इस मौके पर बिहार आ रहे हैं और वे जदयू नेताओं से भी मिलेंगे, तो कार्यकर्ताओं ने इसे भाजपा के दबाव के रूप में देखा.
क्या पहले से तय था सत्ता का हस्तांतरण
ऐसा कहा जा रहा है कि BJP और JDU के बीच काफी पहले से यह समझ थी कि चुनाव के बाद बिहार में दोनों दलों के बीच सत्ता का हस्तांतरण होगा. यह सहज तरीके से होगा, ताकि मतदाताओं को ऐसा न लगे कि उनके साथ कोई धोखा हुआ है। सूत्रों के मुताबिक चुनावी नतीजों के आने के ठीक बाद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने नीतीश के करीबी नेताओं को बुलाकर संदेश दे दिया था कि नीतीश अब अपने बिगड़ते स्वास्थ्य की वजह से मुख्यमंत्री के रूप में लंबी पारी नहीं खेल पाएंगे। इस पर उन नेताओं ने कहा था कि चुनाव नीतीश के चेहरे पर ही जीता गया है, ऐसे में अभी उन्हें हटाकर किसी और को सीएम बनाना ठीक नहीं रहेगा. लेकिन भाजपा अब और इंतजार करने के मूड में नहीं थी, इसलिए यह फैसला हुआ।
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