भारत की कूटनीति एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गई है, जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर के एक बयान ने बवाल खड़ा कर दिया। ईरान-इजराइल तनाव और पाकिस्तान की संभावित मध्यस्थता को लेकर आयोजित सर्वदलीय बैठक में जयशंकर ने कहा कि भारत पाकिस्तान की तरह “दलाल देश” नहीं है।
उनका यह बयान सीधे तौर पर पाकिस्तान की भूमिका पर निशाना था, लेकिन इसके राजनीतिक और कूटनीतिक मायने देश के भीतर ही विवाद का कारण बन गए। बयान के सामने आते ही विपक्ष ने इसे भारत की स्थापित विदेश नीति के खिलाफ बताते हुए सवाल उठाने शुरू कर दिए।
विपक्ष का तर्क है कि अगर दो देशों के बीच मध्यस्थता को “दलाली” कहा जाता है, तो क्या अतीत में भारत द्वारा किए गए शांति प्रयास भी इसी श्रेणी में आएंगे?
कांग्रेस नेता जयराम रमेश और सुप्रिया श्रीनेत समेत कई नेताओं ने इस बयान को विरोधाभासी बताया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान शांति वार्ता की पहल की थी, तब उसे क्या कहा जाएगा?
क्या वह भी “दलाली” की श्रेणी में आता है? इस सवाल ने सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया है और बयान की व्याख्या को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
इस पूरे विवाद ने सोशल मीडिया पर भी जोर पकड़ लिया है, जहां जयशंकर के बयान की तीखी आलोचना की जा रही है। कई यूजर्स और राजनीतिक विश्लेषक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या विदेश मंत्री ने मध्यस्थता और दलाली के बीच के अंतर को नजरअंदाज कर दिया है।
शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पाकिस्तान को लेकर आलोचना अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन भारत की भूमिका को सीमित करना और खुद को शांति प्रक्रिया से अलग रखना एक रणनीतिक गलती हो सकती है।
वहीं, आरजेडी की प्रवक्ता प्रियंका भारती ने जयशंकर के पुराने बयान का हवाला देते हुए सवाल किया कि जब भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध में हस्तक्षेप की बात कही थी, तब वह क्या था?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती विदेश नीति और उसकी प्राथमिकताओं को भी उजागर करता है।
एक ओर भारत वैश्विक मंच पर खुद को एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में पेश करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर इस तरह के बयान उसकी उस छवि को प्रभावित कर सकते हैं।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार पाकिस्तान की भूमिका से उपजी कूटनीतिक असहजता को छिपाने के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रही है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक कूटनीति के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
जयशंकर के इस बयान ने भारत की विदेश नीति, उसकी कूटनीतिक रणनीति और वैश्विक भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार इस विवाद पर क्या सफाई देती है और क्या भविष्य में भारत शांति वार्ता और मध्यस्थता जैसे मुद्दों पर अपनी भूमिका को और स्पष्ट करेगा।
यह भी देखना अहम होगा कि क्या भारत खुद को केवल एक पक्ष तक सीमित रखता है या फिर वैश्विक स्तर पर सक्रिय मध्यस्थ के रूप में अपनी पहचान को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ता है।
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