सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर ऑनलाइन कंटेंट हटाने के आंकड़ों ने नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ साइबर सुरक्षा और कानून व्यवस्था की बात है, तो दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते नियंत्रण को लेकर चिंता भी गहराती जा रही है।
देश में डिजिटल स्पेस पर नियंत्रण को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। गृह मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, एक साल के भीतर 1 लाख से अधिक ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक कराया गया। यह कार्रवाई सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत की गई, जिसमें औसतन हर दिन करीब 290 टेकडाउन नोटिस जारी किए गए।
यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ती गतिविधियों के बीच सरकार निगरानी और नियंत्रण को लेकर ज्यादा सक्रिय नजर आ रही है। 13 मार्च 2024 को Indian Cyber Crime Coordination Centre को विशेष अधिकार दिए गए थे, जिसके तहत वह संदिग्ध कंटेंट को चिन्हित कर सीधे हटाने के निर्देश दे सकता है। इसके बाद 31 मार्च 2025 तक कुल 1,11,185 ऑनलाइन पोस्ट, वीडियो या अन्य सामग्री को हटाया गया।
कानूनी ढांचे की बात करें तो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 इस पूरे मामले का केंद्र है। यह प्रावधान सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर्स द्वारा डाले गए कंटेंट के लिए सीमित जिम्मेदारी देता है। लेकिन धारा 79(3)(b) के तहत यदि सरकार या उसकी एजेंसियां किसी कंटेंट को हटाने का निर्देश देती हैं और प्लेटफॉर्म ऐसा नहीं करते, तो उन्हें कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती। यही वह आधार है, जिसके जरिए टेकडाउन नोटिस की प्रक्रिया तेज हुई है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अदालत या संबंधित एजेंसी के निर्देश मिलने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को तीन घंटे के भीतर कंटेंट हटाना अनिवार्य है। इस प्रक्रिया के लिए ‘सहयोग’ पोर्टल का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके जरिए देशभर की कानून प्रवर्तन एजेंसियां सीधे नोटिस भेज सकती हैं।
हालांकि, इन कार्रवाइयों को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ मामलों में हटाए गए कंटेंट में सरकार और उसके मंत्रियों से जुड़ी आलोचनात्मक सामग्री भी शामिल थी। इसी संदर्भ में X को भी कई टेकडाउन नोटिस जारी किए गए थे। इस प्लेटफॉर्म ने इन प्रावधानों को अदालत में चुनौती दी, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
इसी बीच, सरकार का तर्क है कि यह कदम केवल साइबर अपराध, फेक न्यूज और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े खतरों को रोकने के लिए उठाए गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में साइबर हमलों और ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में तेजी आई है। CERT-In के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में देशभर में लगभग 29 लाख से अधिक साइबर सुरक्षा घटनाएं दर्ज की गईं, जो अब तक की सबसे अधिक संख्या है।
यानी एक तरफ जहां डिजिटल खतरों का दायरा बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार की सख्ती भी उसी अनुपात में बढ़ती दिख रही है। लेकिन सवाल यह है कि इस संतुलन को कैसे बनाए रखा जाए? क्या सुरक्षा के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है, या फिर यह कदम डिजिटल व्यवस्था को सुरक्षित बनाने के लिए जरूरी है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति दोहरे प्रभाव को दर्शाती है। एक ओर सरकार साइबर अपराधों से निपटने के लिए मजबूत तंत्र बना रही है, वहीं दूसरी ओर पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर चिंताएं भी बढ़ रही हैं। क्योंकि जब कंटेंट हटाने के फैसले बड़ी संख्या में और तेजी से लिए जाते हैं, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि उनके पीछे के मानदंड कितने स्पष्ट और निष्पक्ष हैं।
इस पूरे घटनाक्रम से तीन बड़े संकेत मिलते हैं। पहला, डिजिटल स्पेस अब पूरी तरह से नियंत्रण और निगरानी के दायरे में आ चुका है। दूसरा, सरकारें टेक्नोलॉजी के माध्यम से कानून व्यवस्था को सख्ती से लागू करने की दिशा में बढ़ रही हैं। और तीसरा, इस प्रक्रिया में नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर नई बहस खड़ी हो रही है।
सरकार इसे सुरक्षा और व्यवस्था का जरूरी कदम बता रही है, लेकिन यह मुद्दा केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह उस बदलते डिजिटल भारत की तस्वीर है, जहां सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
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