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मनु के मन में स्त्री क्या है?

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मनु के मन में स्त्री क्या है?

मनुस्मृति भारतीय समाज की सबसे प्रभावशाली धर्मशास्त्रीय रचनाओं में से एक रही है, जिसका प्रभाव सदियों तक विवाह, संपत्ति, पारिवारिक ढांचे और सामाजिक व्यवहार पर पड़ा। परंतु जब इसके मूल श्लोकों को संस्कृत मूल के साथ बारीकी से पढ़ा जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि यह ग्रंथ स्त्रियों को स्वतंत्र, समान और सम्मानजनक स्थान देने के बजाय उन्हें आजीवन पुरुष-नियंत्रण, अधीनता और संदेह की दृष्टि से देखता है।

आजीवन पराधीनता का स्पष्ट विधान मनुस्मृति के अध्याय 9 का श्लोक 3 इस ग्रंथ की स्त्री-दृष्टि को सबसे स्पष्ट रूप से उजागर करता है! जिसको लेकर इस समय भारतीय राजनीति में खूब तर्क-कुतर्क की झीना-झपटी चल रही है। विवादित श्लोक कुछ इस प्रकार हैं-

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥ (9.3)

अर्थ भी समझ लीजिए। कौमारे (बचपन में) पिता रक्षा करता है, यौवने (यौवन में) भर्ता यानी पति रक्षा करता है, स्थविरे (वृद्धावस्था में) पुत्र रक्षा करते हैं। न स्त्री स्वातन्त्र्यम् अर्हति, अर्थात स्त्री स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं है।

यह पंक्ति केवल एक कथन मात्र नहीं बल्कि एक विधान यानी कानून की भाषा में लिखी गई है। “अर्हति” शब्द का अर्थ ही योग्य होना/अधिकारी होना है, इसलिए इसे टालना कठिन है कि स्त्री को किसी भी उम्र में स्वतंत्र इकाई के रूप में मान्यता नहीं दी गई।

यह कोई अपवाद-श्लोक नहीं है। अध्याय 5 का श्लोक 148 भी लगभग यही बात दोहराता है

बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने। पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम्॥ (5.148)

मतलब बाल्ये (बचपन में) पितुः वशे (पिता के वश/अधीन) रहे, यौवन में पाणिग्राहस्य यानी जिसने पाणिग्रहण किया (पति) के अधीन, भर्तरि प्रेते (पति के मरने पर) पुत्रों के अधीन, स्त्री कभी स्वतंत्रता का भजन यानी उपभोग न करे। दो अलग-अलग अध्यायों में एक ही विचार की पुनरावृत्ति यह दर्शाती है कि यह मनु के मूल दृष्टिकोण का आकस्मिक उल्लेख नहीं, बल्कि एक सुसंगत सैद्धांतिक स्थिति है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर, जो स्वयं भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माता थे, ने इसी आधार पर लिखा कि मनु स्त्रियों के प्रति शूद्रों से अधिक कोमल नहीं थे, और उन्होंने स्त्रियों के बारे में एक निम्न धारणा से अपनी बात आरंभ की।

मनुस्मृति में स्त्री को केवल अधीन ही नहीं, बल्कि स्वभावतः अविश्वसनीय भी चित्रित किया गया है। संबंधित श्लोक का सार कुछ इस प्रकार है की

इह नराणां दूषणम् एषः नारीणां स्वभावः। अतः अर्थात् विपश्चितः प्रमदासु न प्रमाद्यन्ति॥

यहां (इस संसार में) पुरुषों को दूषित करना (बहकाना) ही नारियों का स्वभाव है। मतलब विद्वान (विपश्चितः) पुरुष स्त्रियों (प्रमदासु) के प्रति असावधान (प्रमाद) नहीं रहते। यह श्लोक स्त्री को एक स्वतंत्र नैतिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि एक संभावित खतरे के रूप में प्रस्तुत करता है।

मानो स्त्री का अस्तित्व ही पुरुष की सतर्कता की मांग करता है। ‘दूषण’ शब्द पर विवाद ज़रूर है, कुछ टीकाकार इसे केवल ‘आकर्षण’ पढ़ते हैं। परंतु “प्रमाद्यन्ति” (असावधान न होना) जैसी चेतावनी-भाषा यह दिखाती है कि मूल भाव संदेह का ही है, प्रशंसा का नहीं।

इसके अलावा मानुस्मृति के ही अध्याय 9 के दूसरे श्लोक में यह और अच्छे से स्पष्ट होता है

दिवा रात्रौ च नार्यः स्वैः स्वामिभिः अस्वतंत्राः रक्ष्याः। रक्षेद् विषयासक्तां हि क्षिप्रं स्वेष्वधिकारिषु॥ (9.2, भावार्थ)

अर्थ है- दिन-रात स्त्री को अपने परिवार के पुरुषों (स्वामिभिः) की निगरानी में असहाय/अस्वतंत्र रूप में रखा जाना चाहिए, और यदि वह इंद्रिय-सुखों में लिप्त दिखे तो शीघ्र नियंत्रण में लाया जाना चाहिए। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि स्त्री की गतिविधियों और इच्छाओं पर निरंतर नियंत्रण रखना परिवार के पुरुषों का कर्तव्य माना गया है। मानो स्त्री स्वयं अपने आचरण का उत्तरदायित्व नहीं संभाल सकती।

आगे और ज्यादा डिवेटेबल श्लोक है जो पेश कर रहा हूँ

मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्लोक 46 (न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते…) में उल्लेख है कि किसी स्त्री को बेचने या त्याग देने देने पर भी वह अपने पति के स्वामित्व या पत्नी-भाव से मुक्त नहीं होती। यानी पति द्वारा बेचे जाने या त्यागे जाने के बाद भी शास्त्रानुसार उसका वैवाहिक संबंध समाप्त नहीं माना जाता था।

आर्थिक असमानता के बारे में मनु ने क्या लिखा है आइए यह भी जान लीजिए

मनुस्मृति में स्त्री-पुरुष के बीच आर्थिक अधिकारों में भी स्पष्ट भेद किया गया है। ग्रंथ पुरुषों के लिए धन प्राप्ति के सात वैध साधन गिनाता है। उत्तराधिकार, अन्वेषण, विजय, निवेश, कर्म, ग्रहण और पूर्वजों का संपत्ति। जबकि स्त्रियों के लिए केवल छह साधन ही मान्य किए गए हैं। यह अंतर आकस्मिक नहीं है; यह दिखाता है कि ग्रंथ ने आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में भी स्त्री को पुरुष से एक कदम पीछे रखा है।

पुत्री,पत्नी,माता या कन्या,युवा,व्रुद्धा किसी भी स्वरुप में नारी स्वतंत्र नही होनी चाहिए.

मनुस्मृतिः अध्याय-9 श्लोक-2 से 6 तक पढ़ेंगे तो आप जानेंगे की पति पत्नी को छोड सकता हैं, सुद यानी गिरवी रख सकता हैं, बेच सकता हैं, लेकिन स्त्री को इस प्रकार के अधिकार नही हैं. किसी भी स्थिती में, विवाह के बाद, पत्नी सदैव पत्नी ही रहती हैं.

मनुस्मृतिः अध्याय-9 श्लोक संख्या 45 उठाकर देखिए जिसमें संपति और मिलकियत के अधिकार और दावो के लिए, शूद्र की स्त्रियाँ भी दास हैं, स्त्री को संपति रखने का कोई अधिकार नही हैं, स्त्री की संपति का मलिक उसका पति,पूत्र, या पिता हैं।

प्रतीकात्मक सम्मान बनाम व्यावहारिक अधीनता

आलोचकों का यह भी तर्क है कि मनुस्मृति में मिलने वाले स्त्री-सम्मान संबंधी श्लोक व्यवहार में स्त्री को कोई वास्तविक अधिकार नहीं देते। अध्याय 3 का प्रसिद्ध श्लोक पढ़ता हूँ जिससे आप समझ पाएंगे।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥ (3.56)

अर्थ- जहां नारियों की पूजा होती है, वहां देवता प्रसन्न होकर निवास करते हैं। जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां किए गए सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।

यह भाषा सुंदर और सम्मानजनक प्रतीत होती है, परंतु आलोचक बताते हैं कि यही ग्रंथ, कुछ ही अध्याय आगे-पीछे, 9.3 और 5.148 जैसे श्लोकों में स्त्री की स्वतंत्रता को पूर्णतः नकार देता है। पूजा या सम्मान यहां प्रतीकात्मक स्तर पर रहता है, जबकि वास्तविक कानूनी और सामाजिक अधिकार संपत्ति, स्वतंत्र निर्णय, गतिविधि की स्वतंत्रता लगातार पुरुष-संरक्षकों के हाथ में ही रहते हैं। इसी अंतर्विरोध को कुछ विद्वान आदर्शीकरण के आवरण में नियंत्रण कहते हैं।

पांडुलिपि-भिन्नता का तर्क

यह सच है कि मनुस्मृति की पचास से अधिक पांडुलिपियां उपलब्ध हैं, जो आपस में भिन्न हैं, और कुछ परंपरावादी विद्वान स्त्री-विरोधी श्लोकों को बाद के प्रक्षेप (मिलावट) बताकर खारिज करते हैं।

परंतु आलोचकों का तर्क है कि यह स्पष्टीकरण अपर्याप्त है, क्योंकि 9.3 और 5.148 दो अलग-अलग अध्यायों में स्वतंत्रता-निषेध का विचार बार-बार दोहराया गया है।

पैट्रिक ओलिवेल जैसे आधुनिक समालोचनात्मक-संस्करण विशेषज्ञों के शोध से भी पता चलता है कि परंपरागत रूप से प्रामाणिक मानी जाने वाली कोलकाता-कुल्लूक भट्ट प्रति की ऐतिहासिक विश्वसनीयता ही संदिग्ध है।

इसलिए यह मिलावट है का तर्क चुनिंदा ढंग से केवल असुविधाजनक श्लोकों पर लागू करना वैज्ञानिक दृष्टि से कमजोर माना जाता है।

तथ्यों और मूल श्लोकों के आधार पर देखें तो मनुस्मृति में स्त्री को जीवन के हर चरण में पुरुष-नियंत्रण के अधीन रखा गया है (9.3, 5.148), उसके स्वभाव को संदेह की दृष्टि से देखा गया है, उसकी गतिविधियों पर निरंतर निगरानी को उचित ठहराया गया है (9.2), और आर्थिक अधिकारों में उसे पुरुष से कम स्थान दिया गया है।

प्रतीकात्मक सम्मान के श्लोक (3.56) इस असमानता को छिपा नहीं पाते, क्योंकि वास्तविक अधिकार और स्वायत्तता लगातार पुरुष-संरक्षकों के हाथ में ही रहती है। यही कारण है कि आधुनिक विचारकों ने मनुस्मृति को स्त्री-असमानता और पितृसत्तात्मक उत्पीड़न का प्रतीक माना और इसका खुला विरोध किया।

मनुस्मृति का एक और विवादित श्लोक है, जिसमें पत्नी-प्रतिस्थापन की बात कही गई है।

श्लोक

वन्ध्याष्टमेऽधिवेद्याब्दे दशमे तु मृतप्रजा। एकादशे स्त्रीजननी सद्यस्त्वप्रियवादिनी॥ मनुस्मृति 9.81

अर्थ: बांझ पत्नी को आठवें वर्ष, जिसकी संतान मर जाए उसे दसवें वर्ष, जो केवल पुत्रियां जने उसे ग्यारहवें वर्ष, और कटु-वचन बोलने वाली को तुरंत दूसरी पत्नी लाकर प्रतिस्थापित किया जा सकता है। मतलब उसकी जगह दूसरी स्त्री बिहाई जा सकती है। 

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