bhopal-princely-state-merger-1947-1949.jpg

bhopal-princely-state-merger-1947-1949.jpg

आजाद भारत में भोपाल रियासत के पौने दो साल

Share Politics Wala News

भोपाल रियासत की कहानी 1947 से 1949 तक के इन पौने दो सालों में जितने मोड़ों से गुज़री, उतने मोड़ शायद ही किसी और रियासत की कहानी में मिलें, इसलिए इसे कड़ी-दर-कड़ी, तारीख़-दर-तारीख़ समझना ज़रूरी है ताकि पूरी तस्वीर साफ़ हो सके।

14 अगस्त 1947 विलय का पहला हस्ताक्षर, फिर भी सत्ता नवाब के हाथ में

भोपाल के इतिहास पर शोध कर रहे इतिहासकार शाहनवाज़ ख़ान के मुताबिक़, नवाब हमीदुल्लाह खान ने भारत की औपचारिक आज़ादी से ठीक एक दिन पहले, 14 अगस्त 1947 की रात ठीक आठ बजकर पंद्रह मिनट पर “इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन” पर हस्ताक्षर कर दिए थे, यानी काग़ज़ों पर भोपाल उसी वक़्त भारतीय संघ का हिस्सा बन चुकी थी, और यह दस्तावेज़ उन्होंने नेशनल आर्काइव से हासिल कर अपनी किताब में भी छापा है।

लेकिन इस विलय पत्र के साथ ही एक “स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट” यानी यथास्थिति समझौता भी हुआ, जिसके तहत जब तक सत्ता का पूरा प्रशासनिक हस्तांतरण नहीं हो जाता, तब तक नवाब हमीदुल्लाह ही रियासत के संवैधानिक प्रमुख बने रहेंगे, यानी काग़ज़ों पर विलय हो जाने के बावजूद ज़मीन पर सत्ता पूरी तरह नवाब के ही हाथ में रही।

भोपाल की इतिहासकार पूजा सक्सेना के अनुसार नवाब हमीदुल्लाह ने यह हस्ताक्षर बड़ी अनिच्छा से किए थे, क्योंकि वे रियासत पर अपना प्रशासनिक नियंत्रण छोड़ना ही नहीं चाहते थे। इसी दौरान 26 अगस्त 1947 को नवाब ने सार्वजनिक तौर पर भारत में विलय की घोषणा भी कर दी, लेकिन भीतर ही भीतर वे रियासत को स्वतंत्र बनाए रखने की उम्मीद पाले हुए थे।

काग़ज़ पर विलय, हक़ीक़त में अलगाव

1947 के आख़िर से लेकर 1948 की शुरुआत तक भोपाल एक अजीब दोहरी स्थिति में रही। हैदराबाद की तरह ही यहाँ भी स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट के सहारे नवाब प्रशासन पर अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश करते रहे, ठीक वैसे ही जैसे उस दौर की कई और बड़ी रियासतें हैदराबाद, कश्मीर, त्रावणकोर भी पूर्ण विलय टालने की जुगत में लगी थीं।

यह भी कहा जाता है कि आज़ादी के दो साल बाद तक भोपाल में तिरंगा भी नहीं फहराया जा सका, जो इस बात का सीधा सबूत है कि 14 अगस्त के हस्ताक्षर के बावजूद असल सत्ता-हस्तांतरण अटका हुआ था। मार्च 1948 में नवाब हमीदुल्लाह ने अपने रुख़ को और स्पष्ट करते हुए भोपाल को एक पूर्णतः स्वतंत्र रियासत घोषित कर दिया। यह क़दम विलय की दिशा से बिल्कुल उलट था और इसने भोपाल की जनता में गहरी बेचैनी पैदा कर दी।

मई 1948 नई सरकार का गठन

इसके तुरंत बाद मई 1948 में नवाब ने भोपाल की अपनी अलग सरकार का ऐलान कर दिया और चतुरनारायण मालवीय को रियासत का प्रधानमंत्री नियुक्त किया। लेकिन यह सरकार ज़्यादा दिन टिक नहीं पाई, क्योंकि जनता के बीच विलीनीकरण की माँग को लेकर विद्रोह शुरू हो चुका था, और हालात को भांपते हुए ख़ुद चतुरनारायण मालवीय ने पाला बदल लिया और वे भी विलय के पक्ष में जा खड़े हुए, जिससे नवाब का यह प्रयोग बुरी तरह कमज़ोर पड़ गया।

जनआंदोलन की शुरुआत

भोपाल में यह जन-आंदोलन कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि यह उस बड़े “प्रजामंडल आंदोलन” की एक कड़ी थी जो 1920 के दशक से ही देशी रियासतों की जनता को ज़िम्मेदार और लोकतांत्रिक सरकार दिलाने के लिए चल रहा था, और जिसका मक़सद यह था कि जिस तरह ब्रिटिश भारत को आज़ादी मिली, वैसे ही देसी रियासतों की प्रजा को भी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आज़ादी मिले, क्योंकि ये रियासतें भी भारत का ही अभिन्न हिस्सा थीं।

भोपाल में इस आंदोलन की अगुवाई भाई रतन कुमार, ठाकुर लाल सिंह, रामचरण राय, प्रोफ़ेसर (और आगे चलकर भारत के राष्ट्रपति बने) डॉ. शंकरदयाल शर्मा जैसे नेताओं ने की। डॉ. शंकरदयाल शर्मा का भोपाल से गहरा नाता था उनका जन्म भी भोपाल में ही हुआ था, और वे इससे पहले 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी हिस्सा लेकर भोपाल की अदालत से जेल की सज़ा भुगत चुके थे, इसलिए भोपाल के विलय आंदोलन में उतरना उनके लिए स्वाभाविक ही था।

अक्टूबर 1948 नवाब हज पर रवाना

इसी बीच अक्टूबर 1948 में नवाब हमीदुल्लाह हज करने रवाना हो गए, यानी जिस समय भोपाल में विलय को लेकर तनाव लगातार बढ़ रहा था, ठीक उसी नाज़ुक मोड़ पर रियासत का शासक कुछ समय के लिए देश से बाहर चला गया, जिसने आंदोलनकारियों को और खुला मैदान दे दिया।

दिसंबर 1948 में भोपाल में विलय की माँग को लेकर बड़े पैमाने पर सार्वजनिक प्रदर्शन शुरू हो गए, और नवाब प्रशासन ने इन प्रदर्शनों को कुचलने के लिए बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार करना शुरू कर दिया। डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने भी इसी महीने भोपाल के भारत में विलय के विरुद्ध नवाब के रुख़ के ख़िलाफ़ एक बड़ा सामाजिक आंदोलन चलाया, जिसकी वजह से आगे चलकर उन्हें भी गिरफ़्तार होना पड़ा।

23 जनवरी 1949 डॉ. शंकरदयाल शर्मा की गिरफ़्तारी

आंदोलन के चरम पर पहुँचने के दौरान 23 जनवरी 1949 को डॉ. शंकरदयाल शर्मा को गिरफ़्तार कर लिया गया और उन्हें आठ महीने क़ैद की सज़ा सुनाई गई। लेकिन जनता के भारी दबाव और लगातार बढ़ते विरोध के आगे नवाब को उनकी सज़ा पूरी होने से पहले ही उन्हें रिहा करना पड़ा, जो इस बात का साफ़ संकेत था कि जनआंदोलन अब इतना मज़बूत हो चुका था कि प्रशासन उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था।

सरदार पटेल का हस्तक्षेप

जब भोपाल में जन-आंदोलन बेक़ाबू होता दिखा, तो भारत के तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने सीधे हस्तक्षेप करते हुए नवाब हमीदुल्लाह को स्पष्ट संदेश भिजवाया कि भोपाल अब स्वतंत्र रियासत के रूप में जारी नहीं रह सकता, उसे मध्य भारत में शामिल होना ही होगा। पटेल का यह रुख़ केवल भोपाल तक सीमित नहीं था, बल्कि वे उसी दौर में हैदराबाद जैसी रियासतों को भी सैन्य कार्रवाई तक की चेतावनी दे रहे थे, इसलिए भोपाल के लिए भी उनका इशारा साफ़ था कि टालमटोल अब और नहीं चलेगी।

आख़िरकार विलीनीकरण पत्र पर हस्ताक्षर

सरदार पटेल के लगातार दबाव और भोपाल की जनता के मज़बूत आंदोलन के आगे आख़िरकार नवाब हमीदुल्लाह को झुकना पड़ा, और 30 अप्रैल 1949 को उन्होंने विलीनीकरण के दस्तावेज़ पर औपचारिक हस्ताक्षर कर दिए, जिससे भोपाल राज्य के भारत में पूर्ण विलय का रास्ता साफ़ हो गया।

सत्ता का पूर्ण हस्तांतरण और तिरंगे का फहराना

आख़िरकार 1 जून 1949 को भोपाल औपचारिक रूप से भारतीय संघ का हिस्सा बनी, और भारत सरकार के रियासत विभाग के सचिव को ख़ुद भोपाल भेजकर सत्ता का प्रशासनिक हस्तांतरण पूरा कराया गया, और उसी दिन पहली बार भोपाल में तिरंगा फहराया गया, जो 226 साल पुराने नवाबी शासन के आधिकारिक अंत का प्रतीक बना।

इतिहासकार शाहनवाज़ ख़ान इस तारीख़ को लेकर एक बारीक़ स्पष्टीकरण भी देते हैं उनके मुताबिक़ 1 जून 1949 को असल में “सत्ता का हस्तांतरण” हुआ था, न कि “भारतीय संघ में विलय”, क्योंकि विलय तो क़ानूनी तौर पर 1947 में ही हो चुका था, और मर्जर एग्रीमेंट में साफ़ लिखा है कि इस दिन भोपाल प्रशासन ने भारत सरकार को सत्ता सौंपी।

बाद के वर्षों में डॉ. शंकरदयाल शर्मा की भूमिका

भोपाल के विलय के बाद डॉ. शंकरदयाल शर्मा का राजनीतिक क़द लगातार बढ़ता गया वे 1950 से 1952 तक भोपाल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे, इसके बाद भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री (1952-1956) और फिर कैबिनेट मंत्री (1956-1967) भी बने, और आगे चलकर वे भारत के उपराष्ट्रपति और फिर नवें राष्ट्रपति के पद तक पहुँचे।

यानी जिस शख़्स ने भोपाल की जेल में क़ैद काटी, वही आगे चलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुँचा।

इस तरह भोपाल की कहानी 14 अगस्त 1947 की रात एक काग़ज़ी हस्ताक्षर से शुरू होकर, स्वतंत्र रियासत की घोषणा, अलग सरकार के गठन, जनआंदोलन, गिरफ़्तारियों, सरदार पटेल के दबाव से होते हुए, 1 जून 1949 को पूर्ण सत्ता-हस्तांतरण पर जाकर पूरी होती है।

यह पौने दो साल की यह यात्रा दिखाती है कि भारत की आज़ादी सिर्फ़ एक तारीख़ की घटना नहीं थी, बल्कि यह देश के हर कोने में, हर रियासत में अलग रफ़्तार और अलग तरीक़े से घटित होने वाली एक लंबी, उलझी हुई और कहीं-कहीं ख़ूनी भी रही प्रक्रिया थी

यह भी पढ़ें:

15 अगस्त को ही स्वतंत्रता दिवस क्यों चुना गया?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *