15 अगस्त को ही स्वतंत्रता दिवस क्यों चुना गया?
भारत की आज़ादी की कहानी सिर्फ़ एक तारीख़ की कहानी नहीं है, बल्कि यह लंबे संघर्ष, विश्वयुद्ध के बाद बदले हालात, राजनीतिक मजबूरियों और एक अंग्रेज़ अफ़सर की निजी भावना के आपस में गुंथ जाने की कहानी है, इसलिए इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे जाकर पूरी पृष्ठभूमि देखनी ज़रूरी है।
भारत में आज़ादी की माँग सदियों पुरानी थी, लेकिन इसे एक ठोस राजनीतिक शक्ल 1929 में मिली, जब कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने “पूर्ण स्वराज” यानी पूर्ण स्वतंत्रता की माँग रखी, और उसके बाद 1930 से लेकर आज़ादी मिलने तक कांग्रेस हर साल 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाती रही थी।
महात्मा गांधी, नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना आज़ाद जैसे नेताओं ने वर्षों तक अहिंसक आंदोलनों के ज़रिए अंग्रेज़ी हुकूमत की जड़ें हिलाईं, और 1942 में “भारत छोड़ो आंदोलन” ने इस संघर्ष को नई ऊँचाई दी, जिसने ब्रिटिश शासन की बुनियाद को गहरा झटका दिया।
इसी बीच सुभाष चंद्र बोस और उनकी आज़ाद हिंद फौज ने भी अलग रास्ते से अंग्रेज़ों को चुनौती दी, और दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जब आईएनए के सैनिकों पर मुक़दमे चले, तो पूरे देश में जबरदस्त गुस्सा फैला। इसके अलावा युद्ध के बाद नौसेना में हुए विद्रोह, मज़दूर आंदोलनों और सेना के भीतर बढ़ते असंतोष ने भी ब्रिटिश सरकार को यह एहसास करा दिया कि अब भारत को लंबे समय तक अपने नियंत्रण में रख पाना संभव नहीं रहा।
दूसरी तरफ़ इंग्लैंड की हालत भी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद बहुत ख़राब हो चुकी थी। युद्ध ने ब्रिटेन को आर्थिक रूप से तोड़ दिया था, उसका ख़ज़ाना ख़ाली हो चुका था, और तब की लेबर पार्टी सरकार को यह भी समझ आ गया था कि न तो उनके पास घर पर इतना जनसमर्थन बचा है और न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कॉलोनी बनाए रखने का समर्थन मिलेगा। भारत को नियंत्रित रखने के लिए जिन देसी सैनिक बलों पर वे निर्भर थे, उनकी वफ़ादारी पर भी अब भरोसा नहीं रह गया था।
इन्हीं हालात में फरवरी 1947 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने एक बड़ा एलान किया कि ब्रिटिश सरकार जून 1948 तक भारत को पूर्ण स्वशासन का अधिकार सौंप देगी। इसी लक्ष्य को अमल में लाने के लिए लॉर्ड लुइस माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय नियुक्त किया गया, और उन्हें साफ़ निर्देश था कि 30 जून 1948 तक हर हाल में सत्ता हस्तांतरण पूरा कर लिया जाए।
लेकिन जब माउंटबेटन मार्च 1947 में भारत पहुँचे, तो हालात उतने आसान नहीं निकले जितना ब्रिटेन में सोचा गया था। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच का टकराव लगातार बढ़ता जा रहा था, और मोहम्मद अली जिन्ना अलग मुस्लिम राष्ट्र “पाकिस्तान” बनाने की माँग पर अड़े हुए थे। माउंटबेटन ने गांधी और नेहरू से अच्छे रिश्ते बना लिए थे, लेकिन जिन्ना के साथ बातचीत उतनी आसान नहीं रही। पंजाब और बंगाल जैसे प्रांतों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क रही थी, और अंतरिम सरकार के भीतर भी लगातार खींचतान चल रही थी।
महज़ कुछ ही हफ्तों में माउंटबेटन को यह एहसास हो गया कि अगर सत्ता हस्तांतरण को जून 1948 तक टाला गया, तो अंतरिम सरकार का पूरी तरह गिर जाना तय है, और जितना इंतज़ार बढ़ेगा, दंगों में उतना ही ज़्यादा खून बहेगा। इसलिए उन्होंने बंटवारे को लगभग अपरिहार्य मानते हुए तेज़ी से फ़ैसला लेने का रास्ता चुना।
नतीजतन 3 जून 1947 को जो योजना सामने रखी गई, जिसे “माउंटबेटन प्लान” या “3 जून योजना” के नाम से जाना जाता है, उसमें सबसे अहम बात यही थी कि सत्ता हस्तांतरण की तारीख़ को जून 1948 से क़रीब दस महीने आगे खिसकाकर 15 अगस्त 1947 कर दिया गया, यानी अब पूरी प्रक्रिया के लिए महज़ लगभग दस हफ्ते ही बचे थे। इसी योजना में भारत के बंटवारे को स्वीकार किया गया, दोनों नए देशों को डोमिनियन का दर्जा देने, अपनी-अपनी संविधान सभा बनाने और रियासतों को भारत या पाकिस्तान में विलय का विकल्प देने जैसी बातें तय हुईं।
इस पूरी योजना को क़ानूनी रूप “भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947” के ज़रिए दिया गया, जिसे 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद से शाही स्वीकृति मिली, और इसी अधिनियम में यह तय हुआ कि 15 अगस्त 1947 से ब्रिटिश हुकूमत का भारत पर अधिकार पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।
अब सवाल यह उठता है कि इतनी सारी तारीख़ों में से ठीक 15 अगस्त ही क्यों चुनी गई। इसका आधिकारिक जवाब तो यही दिया गया कि हालात इतने ख़राब हो चुके थे कि जल्द से जल्द सत्ता हस्तांतरण ज़रूरी हो गया था, लेकिन बाद में यह भी सामने आया कि इस तारीख़ के पीछे माउंटबेटन का एक बेहद निजी और भावनात्मक कारण भी था।
दरअसल दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान माउंटबेटन दक्षिण-पूर्व एशिया कमान के सुप्रीम अलाइड कमांडर थे, और उन्होंने बर्मा अभियान की अगुआई की थी, जिसमें ब्रिटिश, भारतीय और अमेरिकी सैनिकों ने मिलकर जापान के क़ब्ज़े से बर्मा को आज़ाद कराने के लिए मोर्चा संभाला था।
15 अगस्त 1945 को ही जापान के सम्राट हिरोहितो ने एक रिकॉर्डेड रेडियो संदेश के ज़रिए मित्र देशों के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण की घोषणा की थी, और उस वक़्त जापान की हार का पूरा श्रेय माउंटबेटन को ही दिया गया था। यही वजह थी कि माउंटबेटन इस तारीख़ को अपने जीवन का सबसे शुभ और गौरवशाली दिन मानते थे।
लेखक लैरी कॉलिंस और डॉमिनिक लापिएर की मशहूर किताब “फ्रीडम एट मिडनाइट” के मुताबिक़, माउंटबेटन चाहते थे कि भारत की आज़ादी की तारीख़ ठीक उसी दिन पड़े जो उनकी ज़िंदगी के सबसे विजयी पलों में गिना जाता था, और उन्होंने जापान के पतन तथा एशिया में एक नए लोकतंत्र के उदय के बीच एक तरह की प्रतीकात्मक समानता भी महसूस की।
कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि माउंटबेटन जल्द से जल्द भारत का काम निपटाकर ब्रिटिश नौसेना में किसी बड़े पद पर लौटना चाहते थे, इसलिए भी उन्होंने प्रक्रिया को जल्दी पूरा करने पर ज़ोर दिया।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे मुश्किल और संवेदनशील हिस्सा था बंटवारे की सीमा-रेखा तय करना। इसके लिए ब्रिटिश वकील सिरिल रैडक्लिफ़ को ज़िम्मेदारी दी गई, जिन्होंने कभी भारत देखा तक नहीं था, और उन्हें पंजाब तथा बंगाल का बंटवारा करने के लिए महज़ पाँच हफ्तों का समय दिया गया।
हैरानी की बात यह है कि यह सीमा-रेखा यानी रैडक्लिफ़ लाइन आज़ादी के एलान के दो दिन बाद, यानी 17 अगस्त को सार्वजनिक की गई, ताकि तुरंत भड़कने वाली हिंसा को कुछ हद तक टाला जा सके। इसी दौरान सरदार पटेल और वी. पी. मेनन ने भारत की पाँच सौ से ज़्यादा रियासतों को भारत में विलय के लिए मनाने का बेहद कठिन काम भी बड़ी तेज़ी से पूरा किया।
इतने कम समय में इतना बड़ा प्रशासनिक और राजनीतिक बदलाव करना आसान नहीं था, और इसी वजह से आगे चलकर कई इतिहासकारों ने माउंटबेटन की इस जल्दबाज़ी की आलोचना भी की, यह कहते हुए कि तारीख़ इतनी जल्दी आगे खिसकाने से लाखों लोगों की जान गई और लगभग दो करोड़ लोग विस्थापित हुए। वहीं माउंटबेटन के समर्थकों का तर्क था कि पंजाब में हालात इतने बिगड़ चुके थे कि देरी करने का मतलब पूरे देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति होती।
एक दिलचस्प और कम जानी बात यह भी है कि क़ानूनी तौर पर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम में 15 अगस्त की तारीख़ भारत और पाकिस्तान, दोनों नए देशों के लिए तय की गई थी। लेकिन व्यावहारिक कारणों से माउंटबेटन ने 14 अगस्त की दोपहर को कराची जाकर पाकिस्तान के सत्ता हस्तांतरण का समारोह पूरा किया,
ताकि उसी रात दिल्ली लौटकर आधी रात को भारत की आज़ादी की रस्म भी निभा सकें। इसके अलावा 14 अगस्त 1947 इस्लामी कैलेंडर के रमज़ान महीने की 27वीं रात के भी बेहद क़रीब पड़ रहा था, जो मुसलमानों के लिए एक बेहद पवित्र रात मानी जाती है, और यही एक और वजह बनी कि आगे चलकर पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से 14 अगस्त को ही अपना स्वतंत्रता दिवस तय कर लिया।
भारत ने हालाँकि 15 अगस्त की तारीख़ को ही अपने राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस के रूप में बरकरार रखा, और ठीक इसी रात 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में अपना मशहूर भाषण “ट्रिस्ट विद डेस्टिनी” यानी “नियति से साक्षात्कार” दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि जब पूरी दुनिया सो रही होगी, तब भारत आज़ादी और जीवन की तरफ़ जागेगा।
इस तरह 15 अगस्त 1947 का दिन सिर्फ़ एक प्रशासनिक तारीख़ नहीं, बल्कि सैकड़ों वर्षों के संघर्ष, त्याग, उम्मीद और लाखों लोगों की क़ुर्बानी का प्रतीक बन गया, और यही वजह है कि आज भी हर साल इसी तारीख़ को भारत अपना स्वतंत्रता दिवस बड़े गर्व और उत्साह के साथ मनाता है।
आजादी के बाद भारत की राजनीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख आंदोलन की सूची!
You may also like
-
एन चंद्रशेखरन का टाटा संस चेयरमैन पद से इस्तीफा, फरवरी 2027 तक संभालेंगे जिम्मेदारी
-
आजादी के बाद भारत की राजनीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख आंदोलन की सूची!
-
कई कालखण्डों में समझिए… काँवड़ यात्रा का इतिहास
-
मायावती ने कहा मोहरा न बनें, अपने मुद्दों की लड़ाई खुद लड़ें
-
15 अगस्त को ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी स्कूलों का ‘सोशल ऑडिट’ करेगा CJP

