इन मंत्रियों के बच्चों की पढ़ाई का ताल्लुक विदेश से! जानिए पूरी लिस्ट…..
आप जाइए जंतर-मंतर, आप खाइए पुलिस के डंडे, आप तुड़वाइए अपनी हड्डियाँ, फुड़वाइए सिर, क्योंकि जिसके विरोध में आप सड़क पर उतरे हैं, उसे आपकी रत्ती भर भी परवाह नहीं है। आज चर्चा कुछ अलग है, कुछ खास है, क्योंकि आज देश की सरकार ने यह कहने का मौका दिया है—मजबूर किया है।
मेरा पूरे देश के नौजवानों से एक सवाल है कि सरकार को आपकी परवाह क्यों होनी चाहिए? उनके बच्चे तो विदेशों में पढ़ रहे हैं। भारत की शिक्षा व्यवस्था एकदम जर्जर हो चुकी हो, उनका इससे क्या वास्ता? यदि आपको भरोसा नहीं, तो लीजिए आज पेश हैं ये आँकड़े, जो आपकी आँखें खोलने का काम करेंगे। हमारा मकसद किसी को नीचा दिखाना या किसी की भावनाएँ आहत करना नहीं है। पॉलिटिक्सवाला का हमेशा सच से ताल्लुक रहा है। हम हमेशा सच्चाई के साथ अड़े और खड़े रहते हैं।
इस रिपोर्ट में- कैसे नेताओं को आपकी शिक्षा से कोई मतलब नहीं है, और क्यों मतलब नहीं है? इसी विषय पर बात….
इस रिपोर्ट में उन मंत्रियों की लिस्ट बनाई गई है, जिनके बच्चे विदेशों में पढ़ाई करते हैं या कर चुके हैं। हमें इससे भी कोई दिक्कत नहीं, लेकिन बात यहाँ आकर अटक जाती है कि आपके जिम्मे देश के बच्चों का भविष्य है और आप देश के भविष्य से ज्यादा अपने भविष्य को अहमियत दे रहे हैं। देश के बच्चे अच्छी शिक्षा और उन्नत व्यवस्था के लिए मोहताज हैं और आपके बच्चे मौज करें, यह देश के बच्चों को स्वीकार नहीं।
सबसे पहले बात करते हैं विदेश मंत्री एस. जयशंकर की। इनके बेटे अर्जुन जयशंकर ने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की।
नंबर दो पर हैं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, जिनकी पुत्री वांग्मयी पराकला ने नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के मेडिल स्कूल से मास्टर डिग्री हासिल की।
नंबर तीन पर बात आती है वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बेटे ध्रुव गोयल की, जिन्होंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट दोनों डिग्रियाँ पूरी कीं। उनकी बेटी राधिका गोयल ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की और बाद में सैन डिएगो यूनिवर्सिटी से पीएचडी की।
इसके बाद नंबर चार पर आते हैं रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव। उनके दोनों बच्चों, तान्या और राहुल ने ब्रिटेन में पढ़ाई की।
नंबर पाँच पर आते हैं, जो अपने आपको मामा की उपाधि दे चुके हैं, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान। उनके बड़े बेटे कार्तिकेय चौहान ने पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी से लॉ में मास्टर्स किया है, जबकि छोटे बेटे कुणाल चौहान ने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से अंडरग्रेजुएट डिग्री हासिल की।
बात करते हैं मंत्री जे. पी. नड्डा की। उनके बेटे हरीश नड्डा ने लंदन यूनिवर्सिटी से लॉ में मास्टर्स किया है।
सातवें नंबर पर हैं संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, जिनकी बेटी अनन्या राजे ने रोड आइलैंड स्कूल ऑफ़ डिज़ाइन से पढ़ाई की, जबकि बेटे महानार्यमन सिंधिया ने येल यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है।
नंबर आठ पर आते हैं संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू। उनके बड़े बेटे ब्रिटेन के एक विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हैं।
पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की बेटी सुहासिनी शेखावत ने ऑक्सफोर्ड से एडवांस्ड लीडरशिप में डिप्लोमा किया। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की बेटी ने पार्सन्स कॉलेज से डिग्री हासिल की।
अब आता है सबसे खास नाम, जो इन दिनों पूरे देश और लगभग विदेश में भी सुर्खियाँ बटोर रहा है—देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान। सोशल मीडिया पर यह आजकल छाया हुआ है कि उनकी बेटी नैमिषा हाल ही में एक अमेरिकी विश्वविद्यालय में पढ़ रही थीं। यही वजह है कि शिक्षा मंत्री होने के कारण यह मुद्दा ज्यादा गरमा-गरम है।
अब बात विपक्ष की—विपक्ष के नेताओं के बच्चों को लेकर केंद्रीय मंत्रियों जैसी कोई एक व्यवस्थित और सत्यापित रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। लेकिन बात सबकी की जाएगी। सच जो है, उसे साफ-सुथरा दिखाया जाएगा। अब बात करते हैं कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की। उनकी स्वयं की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय यानी विदेश में हुई है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले ने मुंबई के जय हिंद कॉलेज से स्नातक करने के बाद अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले में जल प्रदूषण विषय पर स्टडी की है।
वहीं, समाजवादी पार्टी के संस्थापक दिवंगत मुलायम सिंह यादव के बेटे और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिडनी से पर्यावरण इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री प्राप्त की।
अब एक सवाल मैं आप लोगों के लिए छोड़ जाता हूँ। सवाल बहुत ही सामान्य-सा है कि यदि विपक्ष आज देश के युवाओं के साथ सच्चे मन से खड़ा हुआ है, अपने आपको सच्चा और आज के युवाओं का हितैषी बताता है, तो अपने क्षेत्र में, अपनी कन्सटिटुएन्सी में बताए कि उनके द्वारा शिक्षा में सुधार के लिए मौजूदा सरकार से हटकर देश के बच्चों के लिए क्या कदम उठाए गए हैं? अगर नहीं बता पाए, तो ढोंग मत कीजिए, स्टूडेंट्स का इस्तेमाल मत कीजिए।
देखिए, असल बात यह है कि नेता/मंत्री अपने बच्चों को विदेश इसलिए भेजते हैं या वे खुद जाते हैं क्योंकि उन्हें खुद अपनी बनाई व्यवस्था पर भरोसा नहीं है। जब आपको भरोसा नहीं है, तो यह ज़ाहिर-सी बात है कि आम आदमी आप पर कैसे यकीन करे। भारत की शिक्षा व्यवस्था की हालत क्या है, यदि आपने आँखों पर पट्टी नहीं बांधी है, तो आप देख पा रहे होंगे।
आम आदमी फीस भर-भर के परेशान है, सरकारी स्कूल जर्जर हो चुके हैं। पढ़-लिखकर भी बच्चे रोजगार के लिए भटक रहे हैं। मतलब, अभी इस समय शिक्षा की जो स्थिति है, वह किसी से छिपी नहीं है और इस जर्जर हो चुकी व्यवस्था पर युवाओं का गुस्सा जायज है।
कॉर्पोरेट में भी स्थिति अलग नहीं है। अंबानी, अदाणी, महिंद्रा, गोदरेज, बिड़ला… लगभग सभी बड़े कारोबारी परिवार अपने बच्चों को दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में भेजते हैं।
सिनेमा को देखिए। सैफ अली खान, सारा अली खान, इब्राहिम अली खान, आर्यन खान, सुहाना खान, अमिताभ बच्चन के नाती-नातिन, रणबीर कपूर, वरुण धवन, रणवीर सिंह—विदेशी शिक्षा या प्रशिक्षण इनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
मीडिया में भी स्थिति अलग नहीं है। संजय पुगलिया, मधु त्रेहन, अर्नब गोस्वामी, करण थापर, बरखा दत्त, वीर सांघवी और अरुण शौरी जैसे प्रभावशाली लोगों के परिवारों में भी विदेशी शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाता है।
अब ज़रा अपने शहर के शीर्ष 100 प्रभावशाली लोगों की सूची बनाइए। कितने लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों, सरकारी मेडिकल कॉलेजों या उसी शिक्षा व्यवस्था में भेज रहे हैं, जिसकी सार्वजनिक मंचों से प्रशंसा की जाती है? शायद बहुत कम। यही भारत का सबसे बड़ा शैक्षिक विरोधाभास है।
एक भारत वह है, जिसके बच्चे कोटा, मुखर्जी नगर, इंदौर और पटना में वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। दूसरा भारत वह है, जिसके बच्चों के लिए हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड, येल, स्टैनफोर्ड, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के दरवाज़े खुले रहते हैं। विदेश में पढ़ना गलत नहीं है। गलत तब लगता है, जब देश का प्रभावशाली वर्ग अपनी निजी पसंद में एक रास्ता चुनता है और सार्वजनिक विमर्श में दूसरे रास्ते की वकालत करता है।
सवाल यह नहीं है कि लोग अपने बच्चों को विदेश क्यों भेजते हैं। सवाल यह है कि— क्या हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था बना पाए हैं, जिस पर देश के सबसे प्रभावशाली लोग भी उतना ही भरोसा करते हों, जितना वे भाषणों में जताते हैं? और यदि नहीं, तो फिर इस व्यवस्था को बदलने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसकी है?
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