ड्रैगन ने चल दी है नई चाल, अब पानी से करेगा वार, भारत आखिर कैसे देगा जवाब?
चीन तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का निर्माण कर रहा है, जिसे मेडोग या मोतुओ हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के नाम से जाना जाता है। यह बांध यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनाया जा रहा है, जो भारत में ब्रह्मपुत्र कहलाती है और अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास स्थित है। बीजिंग 2033 तक इस बांध को चालू करने की योजना बना रहा है।
करीब 60 गीगावाट क्षमता वाली यह परियोजना पूरी होने पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना बन सकती है। इसकी अनुमानित लागत 137 अरब डॉलर से 170 अरब डॉलर के बीच है और इसमें यारलुंग त्सांगपो के विशाल मोड़ वाले क्षेत्र में पांच चरणों में जलविद्युत ढांचा विकसित करने की योजना है। यह रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील परियोजना LAC से महज 50
किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जिसने भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।
नेपाल त्रासदी के बाद अरुणाचल सीमा के पास बन रहे चीन के ‘मेदोग डैम’ को लेकर क्यों बढ़ी चिंता, पानी छोड़ा तो क्या करेगा भारत?
सबसे बड़ी चिंता इस इलाके की भूकंपीय स्थति को लेकर है। हिमालय दुनिया की सबसे ज्यादा भूकंप प्रभावित पर्वत श्रृंखला है, और जानकारों का कहना है कि इस नए सुपर-डैम से जुड़े जोखिम इसलिए बहुत बड़े हैं क्योंकि इसे हिमालय के भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील इलाके में बनाया जा रहा है, जहां भारतीय और यूरेशियन प्लेटें आपस में टकराती हैं।
हाल ही में नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी आपदा ने इस खतरे को और उजागर कर दिया है। भूकंप से आए लेंडस्लाइड के कारण आई बाढ़ ने नेपाल-तिब्बत सीमा पर 270 से ज्यादा लोगों की जान ले ली थी और सैकड़ों लोग लापता हो गए थे। इस घटना ने जानकारों और सुरक्षा विशेषज्ञों को उस विशालकाय बांध को लेकर आगाह किया है जो भारत की सीमा के ठीक बगल में बनाया जा रहा है।
भूगर्भीय अध्ययनों में भी इस इलाके को लेकर गंभीर चेतावनियां दी गई हैं। एक शोध पेपर में बांध बनाए जा रहे इलाके में गंभीर भूगर्भीय खतरों की बात कही गई है। वैज्ञानिकों ने बताया कि वहां की जमीन की बनावट ढीली है और चट्टानों व मिट्टी के बीच पकड़ कमजोर है, और चेतावनी दी कि अगर जमीन के अंदर मौजूद फॉल्ट में हलचल हुई तो यह सुपर डैम एक ‘वॉटर बम’ बन सकता है। यानी भूकंप या भूस्खलन की स्थिति में बांध के टूटने का खतरा बना रहेगा, जिससे नीचे की ओर बहने वाले पानी से भारी तबाही मच सकती है।
नदी के प्रवाह पर भी असर पड़ने की आशंका है। यारलुंग त्सांगपो नदी तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी के रूप में प्रवेश करती है, जो आगे चलकर असम में ब्रह्मपुत्र बन जाती है। अरुणाचल प्रदेश और असम में रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका, खेती और जल संसाधन इसी नदी पर निर्भर हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि नदी के ऊपरी हिस्से में इतने बड़े पैमाने पर बांध बनने से पानी के नेचुरल प्रवाह में बदलाव आ सकता है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और कृषि पर असर पड़ सकता है और निचले इलाकों में अचानक व गंभीर बाढ़ आने का खतरा भी बढ़ सकता है। इसके अलावा सूखे के मौसम में जल-प्रवाह में कमी की भी आशंका जताई जा रही है, जिससे पूर्वोत्तर भारत में जल संकट पैदा हो सकता है।
इस चुनौती से निपटने के लिए भारत ने भी अपनी रणनीतिक तैयारी तेज कर दी है। चीन की इस चाल के जवाब में भारत ने पूर्वोत्तर में 208 बांध बनाने की योजना पर काम शुरू किया है।
इसके अलावा भारत सरकार अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग और सियांग जिलों में ‘सियांग अपर मल्टीपरपज प्रोजेक्ट’ पर काम कर रही है, जिसकी उत्पादन क्षमता लगभग 11,000 मेगावाट होगी और यह एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक व बाढ़ नियंत्रण परियोजना होगी। इस परियोजना का मकसद अचानक आने वाली बाढ़ को नियंत्रित करना और जल-भंडारण की क्षमता तैयार करना है, ताकि चीन की ओर से अचानक पानी छोड़े जाने की स्थिति में भारत के पास बफर मौजूद रहे।
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