MP Cabinet Expansion: मोहन कैबिनेट में फेरबदल की चर्चा तेज, किसकी कुर्सी रहेगी और किस पर गिरेगी गाज?
मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मंत्रिमंडल को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है। दिल्ली दौरे और पार्टी नेतृत्व के साथ बैठकों के बीच कैबिनेट में संभावित बदलाव को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
हालांकि, अभी तक किसी मंत्री को हटाने या नए चेहरों को शामिल करने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐसे में फिलहाल इसे सियासी अटकलों और संभावित फेरबदल की चर्चा के तौर पर ही देखा जा रहा है।
मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं को उस समय ज्यादा हवा मिली, जब जून में मुख्यमंत्री मोहन यादव के एक इंटरव्यू के हवाले से नए और युवा चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह दिए जाने की बात सामने आई। इसके बाद से ही बीजेपी के भीतर संभावित बदलाव को लेकर कई नामों की चर्चा शुरू हो गई।
मौजूदा राजनीतिक समीकरण में वरिष्ठ नेताओं कैलाश विजयवर्गीय और प्रह्लाद सिंह पटेल पर भी नजरें टिक गई हैं। जुलाई में कैलाश विजयवर्गीय के नाम से मुख्यमंत्री को भेजे गए एक कथित पत्र ने सियासी हलचल बढ़ा दी थी।
पत्र में इंदौर से जुड़े विकास कार्यों और कथित उपेक्षा का मुद्दा उठाए जाने की खबरें सामने आई थीं। हालांकि, विजयवर्गीय ने सार्वजनिक रूप से ऐसे पत्र की जानकारी होने से इनकार कर दिया था।
दूसरी तरफ प्रह्लाद सिंह पटेल भी लंबे समय से मध्य प्रदेश सरकार के अहम चेहरों में शामिल हैं। फरवरी में मुख्यमंत्री मोहन यादव के साथ-साथ विजयवर्गीय और पटेल की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी थी।
हालांकि, इन बैठकों को लेकर मंत्रिमंडल में बदलाव का कोई आधिकारिक संकेत सामने नहीं आया है।
संभावित विस्तार में कई वरिष्ठ और अनुभवी बीजेपी नेताओं के नाम भी चर्चा में बताए जा रहे हैं। इनमें गोपाल भार्गव, अर्चना चिटनिस, मालिनी गौड़, शैलेंद्र कुमार जैन और प्रदीप लारिया जैसे नाम शामिल हैं।
वहीं सिंधिया समर्थक खेमे से बृजेंद्र सिंह यादव और पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह की संभावित वापसी की चर्चाएं भी सियासी हलकों में सुनाई दे रही हैं। दूसरी ओर कुछ मौजूदा मंत्रियों के प्रदर्शन को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन किसी के नाम पर अंतिम फैसला होने की पुष्टि नहीं हुई है।
दरअसल, मध्य प्रदेश में मंत्रिमंडल के आकार की संवैधानिक सीमा को देखते हुए नए चेहरों की एंट्री के साथ राजनीतिक संतुलन साधना बड़ी चुनौती होगी। इसलिए अगर विस्तार होता है तो यह केवल खाली पद भरने की कवायद नहीं होगी, बल्कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, संगठनात्मक समीकरण और आगामी चुनावी रणनीति को ध्यान में रखकर भी बदलाव किए जा सकते हैं।
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