पेश है साहित्य का संसार…संपूर्ण सिंह कालरा…उर्फ गुलजार।
उम्र के सफर का 92वां साल पूरा
संपूर्ण भारतीय सिनेमा और उर्दू-हिंदी साहित्य में गुलज़ार एक ऐसा नाम है, जो महज़ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक अहसास है, एक मुकम्मल दौर है और एक जीवन दर्शन का नाम। उनका जीवन, उनकी शायरी, उनकी फ़िल्में और उनका समूचा वजूद शब्दों और ख़ामोशियों के बीच बुना गया एक ऐसा ताना-बाना है, जिसने करोड़ों दिलों को छूने का काम किया है।
जब वे अपने जीवन और अपनी इस रूहानी यात्रा पर नज़र डालते हैं, तो वे अपनी पैदाइश और शुरूआती दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि 18 अगस्त 1934 को अविभाजित भारत के झेलम ज़िले के दीना गाँव में उनका जन्म हुआ था, जहाँ की मिट्टी की सौंधी महक आज भी उनके फेफड़ों में सांस लेती है।
बचपन में ही माँ का साया उठ जाना और फिर 1947 के विभाजन की उस वीभत्स त्रासदी को अपनी खुली आँखों से देखना उनके लिए एक ऐसा न भूलने वाला ज़ख़्म बन गया, जिसने उनके भीतर के संवेदनशील इंसान को उम्र भर के लिए शायर बना दिया। वे अक्सर इस दर्द को बयान करते हुए कहते हैं,
“ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा,
काफ़िला साथ और सफ़र तन्हा”
यह विभाजन का ही दर्द था जिसने उनसे उनका घर, उनकी गलियाँ और उनकी दीना की माटी छीन ली, मगर बदले में उन्हें शब्दों का एक ऐसा अथाह समंदर दे दिया जिसमें वे ताउम्र तैरते रहे।
विभाजन के बाद दिल्ली के शरणार्थी शिविरों और तंग गलियों से होते हुए जब वे मुंबई पहुँचे, तो ज़िंदगी कोई मखमली सेज नहीं थी। परिवार का पेट पालने और अपने वजूद को बचाए रखने के लिए उन्होंने बोरीवली के एक गैरेज में मोटर कार पेंटर के रूप में काम करना शुरू किया।
उस रंग-रोगन की गंध और गाड़ियों के धुएँ के बीच भी उनका दिल सिर्फ़ शायरी और किताबों के लिए धड़कता था। वे दिन भर गाड़ियों पर रंग चढ़ाते और रात को अपनी डायरी के पन्नों पर अपनी तन्हाई और ख़्वाबों को उकेरते थे। वे उस दौर को याद करते हुए कहते हैं कि
“हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते,
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते”
गैरेज की उस मशक़्क़त ने उन्हें ज़िंदगी की ज़मीनी हक़ीक़त और आम इंसान की बेबसी को बेहद क़रीब से महसूस करना सिखाया, जिसने आगे चलकर उनकी नज़्मों और गीतों को एक अलग गहराई बख़्शी।
गैरेज में काम करने के दौरान ही वे प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से जुड़े और वहीं उनकी मुलाकात शैलेंद्र, बिमल रॉय और हेमंत कुमार जैसी महान हस्तियों से हुई। बिमल रॉय की पारखी नज़र ने इस दुबले-पतले, ख़ामोश से नौजवान के भीतर छिपे हुए रचनात्मक महासागर को पहचान लिया और फ़िल्म ‘बंदिनी’ (1963) के लिए उनसे पहला गीत लिखवाया।
जब गुलज़ार साहब उस दौर को याद करते हैं तो कहते हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि वे फ़िल्मों में गीत लिखेंगे, मगर बिमल दा का स्नेह उन्हें इस दुनिया में ले आया और उनका पहला ही गीत “मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दे दे” भारतीय फ़िल्मी संगीत के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय बन गया।
इसके बाद तो जैसे गीतों का एक ऐसा कारवां शुरू हुआ जिसने भारतीय सिनेमा के संगीत की परिभाषा ही बदलकर रख दी। वे फ़िल्मी गीतों को महज़ तुकबंदी नहीं मानते थे, बल्कि उनके लिए गीत दिल की गहराइयों को छूने का एक ज़रिया थे।
“मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है” जैसे गीत में उन्होंने बिखरे हुए रिश्तों, पुरानी यादों, गीली मेहंदी की महक और कतरी हुई रातों को जिस तरह सामान की तरह लौटाने की बात की, उसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया और उन्हें इसके लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से भी नवाज़ा गया।
इसी तरह “आनंद” फ़िल्म का गीत “ज़िंदगी कैसी है पहेली, हाय कभी तो हँसाए, कभी ये रुलाए” या “घरौंदा” का “दो दीवाने शहर में, रात में या दोपहर में” जैसे न जाने कितने ही नगमों ने हर उम्र के इंसान को जीना और महसूस करना सिखाया।
गुलज़ार साहब की पहचान सिर्फ़ एक गीतकार तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने निर्देशक की कुर्सी संभालकर भारतीय सिनेमा को ऐसे शाहकार दिए जो आज भी क्लासिक माने जाते हैं। ‘मेरे अपने’, ‘परिचय’, ‘कोशिश’, ‘अंधी’, ‘मौसम’, ‘इजाज़त’, ‘नमकीन’, ‘लेकिन’ और ‘माचिस’ जैसी फ़िल्मों के ज़रिये उन्होंने समाज के संवेदनशील, पेचीदा और मानवीय रिश्तों को बड़े पर्दे पर बेहद नफ़ासत के साथ पेश किया।
‘कोशिश’ में मूक-बधिर जोड़े के संघर्ष और प्रेम की कहानी हो या ‘अंधी’ में राजनीति और व्यक्तिगत रिश्तों की कशमकश, या फिर ‘माचिस’ में पंजाब के भटके हुए युवाओं का दर्द हर जगह उनकी संवेदनशीलता सिर चढ़कर बोली।
वे अपनी निर्देशकीय यात्रा पर बात करते हुए कहते हैं कि कैमरा उनके लिए महज़ एक यंत्र नहीं था, बल्कि वह उनकी शायरी का ही एक विस्तार था, जहाँ वे संवादों से ज़्यादा ख़ामोशी और आँखों की भाषा से बात करते थे। उनकी फ़िल्मों में संवाद भी शायरी की तरह बहते थे, जैसे फ़िल्म ‘इजाज़त’ में उनका यह मशहूर शेर
“एक सो सोलह चाँद की रातें,
एक तुम्हारे काँधे का तिल” आज भी मोहब्बत करने वालों की ज़ुबान पर रवाँ है।
साहित्य और शायरी की दुनिया में गुलज़ार साहब का योगदान अद्वितीय है। उन्होंने उर्दू शायरी को एक नई दिशा दी और ‘त्रिवेणी’ नामक एक बिल्कुल नए काव्य-रूप का आविष्कार किया, जो तीन पंक्तियों की एक ऐसी कविता होती है जिसमें पहली दो पंक्तियाँ एक दृश्य उभारती हैं और तीसरी पंक्ति उसमें एक नया अर्थ या गहरा मोड़ दे देती है।
उनकी नज़्मों में चाँद, पेड़, धूप, ख़ामोशी, चाय की प्याली और गुज़रता हुआ वक़्त ऐसे पात्र बनकर उभरते हैं जो पाठक से सीधे बातें करते हैं। उनकी नज़्मों में समय की गति और उसकी नज़ाकत को महसूस किया जा सकता है, जैसे वे लिखते हैं,
“वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,
इसकी आदत भी आदमी सी है”
या फिर रात के सन्नाटे को उकेरते हुए कहते हैं-
“शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आप की कमी सी है।”
उनकी गज़लें और शेर ज़िंदगी के दर्शन, बिछड़ने के ग़म, मुलाक़ातों की ख़ुशी और अकेलेपन की कड़वाहट को बड़ी सादगी से बयान करते हैं। वे अपने इस अंदाज़-ए-बयाँ के बारे में कहते हैं कि शायरी कोई दिमाग़ का खेल नहीं बल्कि दिल की धड़कनों का लेखा-जोखा है, तभी तो वे लिखते हैं,
“हाथों की लकीरों पे मत जा ऐ ग़ालिब,
नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते”
और
“हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुशबू,
हाथ से छू के इसे रिश्ते का इल्ज़ाम न दो।”
बच्चों के लिए उनका लेखन भी उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का एक बेहद ख़ूबसूरत पहलू है।
‘जंगल जंगल बात चली है पता चला है, चड्डी पहन के फूल खिला है’ जैसे कालजयी गीत से लेकर ‘लकीरें’, ‘अलिस इन वंडरलैंड’ और बच्चों की अनगिनत कहानियाँ और नज़्में इस बात का सबूत हैं कि उनके भीतर का बच्चा आज भी उतना ही मासूम और ज़िंदा है। उनका मानना है कि बच्चों के लिए लिखना सबसे कठिन काम है क्योंकि इसके लिए आपको अपनी उम्र के तमाम तजुर्बों को भूलकर एक बच्चे की निश्छल आँखों से दुनिया को देखना पड़ता है।
गुलज़ार साहब के इस अद्वितीय उम्र के सफर को दुनिया भर में सराहा गया और उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण, दादा साहब फाल्के पुरस्कार, 5 राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, 22 फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार और फ़िल्म ‘स्लमडॉग मिलेनियर’ के गीत “जय हो” के लिए ऑस्कर तथा ग्रैमी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इतने बड़े-बड़े सम्मान हासिल करने के बावजूद वे आज भी उसी सादगी के साथ सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने, अपने हाथों में कलम थामे, बांद्रा के अपने घर ‘बोस्वियाना’ में पन्नों पर शब्द उकेरते हुए नज़र आते हैं।
वे अपनी इस पूरी जीवन विरासत को समेटते हुए अक्सर कहते हैं कि यह सब उनका नहीं, बल्कि उन अनुभवों, उन यादों और उन लोगों का है जो उनकी ज़िंदगी में आए और चले गए, और वे तो बस उन सभी यादों को सफ़ेद काग़ज़ पर उकेरने वाले एक ज़रिया मात्र हैं। उनकी यह जीवन-गाथा हर उस इंसान के लिए एक प्रेरणा है जो सपनों को सच करने का हौसला रखता है, और उनके शब्द ताउम्र आने वाली पीढ़ियों के दिलों में मोहब्बत, दर्द और उम्मीद की रोशनी जगाते रहेंगे, क्योंकि वे खुद अपनी ज़िंदगी को इस एक शेर में मुकम्मल कर देते हैं:
“ज़िंदगी क्या है जानने के लिए, ज़िंदा रहना बहुत ज़रूरी है,
और आज तक कोई ज़िंदा न रहा, ज़िंदगी को मुकम्मल जानने के लिए।“
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